पति की शहादत के बाद लेफ्टिनेंट कर्नल बनीं रविंदरजीत रंधावा, 18 माह की बेटी को संभालते हुए शुरू की देशसेवा, उम्र बनी बाधा, लेकिन नहीं टूटा हौसला
शहीद मेजर सुखविंदर जीत सिंह की शहादत के बाद उनकी पत्नी ने हिम्मत नहीं हारी. अपनी बेटी को संभालते हुए उन्होंने देश सेवा की.

Published : August 14, 2026 at 3:54 PM IST
चंडीगढ़: 15 अगस्त सिर्फ आजादी का जश्न नहीं, बल्कि उन लोगों को याद करने का अवसर भी है जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व देश के लिए न्योछावर किया है. ऐसे लोगों में लेफ्टिनेंट कर्नल रविंदरजीत रंधावा भी हैं. 17 जून साल 1997 को महज 27 साल की उम्र में उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई. उनकी गोद में सिर्फ 18 महीने की बेटी थी और सामने पति की शहादत की खबर थी. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ईटीवी भारत ने लेफ्टिनेंट कर्नल रविंदरजीत रंधावा से खास बातचीत की और उनके संघर्षरत सफर के बारे में जानकारी ली.
अनंतनाग में शहीद हुए मेजर सुखविंदर जीत सिंह: ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान रविंदरजीत ने कहा कि, "मेरे के पति मेजर सुखविंदर जीत सिंह रंधावा जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में आतंकवादी हमले में शहीद हो गए थे. घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और आतंकियों का मुकाबला करते हुए दो आतंकियों को मार गिराया. देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने पर उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया."

पति की वर्दी ने दी नई राह: लेफ्टिनेंट कर्नल रविंदरजीत रंधावा ने आगे कहा कि, "पति की शहादत के बाद मेरे सामने बेटी की परवरिश और अपनी जिंदगी बड़ी चुनौती जैसी थी. हालांकि मैंने खुद को केवल शहीद की पत्नी की पहचान तक सीमित नहीं रखा. मैंने सेना की वर्दी पहनकर उसी रास्ते पर चलने का फैसला किया, जिस पर मेरे पति देश की सेवा करते हुए शहीद हुए थे."
उम्र बनी बाधा, लेकिन हौसला नहीं टूटा: रविंदरजीत ने आगे कहा कि, "सेना में प्रवेश के लिए निर्धारित उम्र सीमा मैं पार कर चुकीं थी. यही कारण है कि मेरे सामने कई चुनौतियां थी. इसके बावजूद मैंने प्रयास जारी रखा. परिवार का साथ मिला और विशेष अनुमति की प्रक्रिया आगे बढ़ी. आखिरकार मेरे लिए सेना में अधिकारी बनने का रास्ता खुला. दिसंबर साल 1997 में मैंने एसएसबी पास किया और मार्च 1998 में चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी पहुंचीं."
1998 में बनीं सेना की अधिकारी: रविंदरजीत ने बताया कि सितंबर 1998 में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद रविंदरजीत ने भारतीय सेना में कमीशन हासिल किया. वह शहीद सैनिक की विधवा के रूप में सेना में अधिकारी बनने वाली शुरुआती ऐतिहासिक मिसालों में शामिल हुईं. उनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं थी, बल्कि पति की अधूरी रह गई देशसेवा को अपने तरीके से आगे बढ़ाने का संकल्प भी था.

पति की पहचान के साथ अपनी पहचान बनाई: रविंदरजीत को आयुध कोर में कमीशन मिला. सेना में उन्होंने लगातार आगे बढ़ते हुए लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक सफर तय किया. उन्होंने सैन्य जीवन के साथ कई चुनौतीपूर्ण गतिविधियों में भी हिस्सा लिया. स्कूबा डाइविंग से लेकर मैराथन और लद्दाख जैसे कठिन इलाकों में दौड़ तक उन्होंने अपनी क्षमता और जज्बे का परिचय दिया.
वर्दी में ग्रहण किया पति का कीर्ति चक्र: अप्रैल 1998 में रविंदरजीत ने अपने पति की ओर से कीर्ति चक्र ग्रहण किया. यह क्षण भावनाओं से भरा हुआ था. जिस वर्दी में उनके पति ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था, उसी वर्दी में उनकी पत्नी सम्मान ग्रहण कर रही थीं. यह दृश्य उनके व्यक्तिगत दुख और राष्ट्रीय कर्तव्य के बीच बने गहरे रिश्ते को सामने लाता है.
18 महीने की बेटी बनी संघर्ष की साथी: जब पिता शहीद हुए, तब सिमरन सिर्फ 18 महीने की थीं. पिता की यादें उनके पास बहुत कम थीं, लेकिन उनकी मां ने उन्हें हमेशा उनके पिता की बहादुरी और देशसेवा की कहानी सुनाई. रविंदरजीत ने एक मां के रूप में बेटी को संभाला और दूसरी ओर खुद को सैन्य जीवन की कठिन चुनौतियों के लिए तैयार किया.

बेटी ने किताब में लिखा मां का संघर्ष: सिमरन ने 2022 में प्रकाशित अपनी किताब "Cost of Warठ में अपने बचपन और मां के संघर्ष को व्यक्तिगत अनुभवों के साथ सामने रखा. उन्होंने बचपन की उन यादों को भी साझा किया, जिनमें वह खिलौने वाले फोन से अपने पिता को फोन करने की कोशिश करती थीं. यह प्रसंग बताता है कि किसी सैनिक की शहादत का असर केवल सीमा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार की अगली पीढ़ी के जीवन में भी लंबे समय तक मौजूद रहता है. सिमरन की किताब में युद्ध के उस पहलू को सामने रखा गया है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. उनके अनुभवों में यह भाव उभरता है कि जंग सिर्फ सीमा पर नहीं लड़ी जाती, उसका असर घरों के अंदर भी लंबे समय तक रहता है. एक सैनिक के जाने के बाद परिवार को जिस भावनात्मक और व्यावहारिक संघर्ष से गुजरना पड़ता है, रविंदरजीत और उनकी बेटी की कहानी उसका उदाहरण है.
दुख को कमजोरी नहीं बनने दिया: रविंदरजीत रंधावा की कहानी का सबसे मजबूत पहलू यही है कि उन्होंने पति की शहादत के दर्द को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने अपनी बेटी को संभाला, अपने डर का सामना किया और व्यवस्था की सीमाओं के बावजूद सेना में प्रवेश का रास्ता बनाया. उनकी जिंदगी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ इच्छाशक्ति इंसान को नई दिशा दे सकती है.
रविंदरजीत रंधावा का सफर एक शहीद की पत्नी से शुरू होकर खुद सेना की अधिकारी बनने तक पहुंचा. उन्होंने पति की शहादत से मिली पहचान को अपनी अंतिम पहचान नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी अलग पहचान बनाई. लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचना उनके अनुशासन, मेहनत और साहस की कहानी है. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उनका जीवन उन तमाम परिवारों को याद करने का मौका देता है, जो देश की रक्षा करने वाले सैनिकों के पीछे खड़े रहते हैं और उनके बलिदान की कीमत अपने जीवन से चुकाते हैं.

