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नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सीएम को लिखा पत्र, प्रशांत कुमार को जेएसएससी अध्यक्ष पद से हटाने की मांग

बाबूलाल मरांडी ने सीएम को पत्र लिखकर प्रशांत कुमार को जेएसएससी अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की है. भुवन किशोर झा की रिपोर्ट.

Babulal Targeted Prashant Kumar
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी. (फोटो-ईटीवी भारत)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : August 26, 2026 at 7:16 PM IST

3 Min Read
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रांचीः जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षा को लेकर चल रहे छात्रों के आंदोलन के बीच झारखंड कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष प्रशांत कुमार को हटाने की मांग तेज हो गई है. नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर परीक्षा सुधार समिति से JSSC के प्रभारी अध्यक्ष प्रशांत कुमार को तत्काल हटाने और उनकी भूमिका की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है.

पत्र के माध्यम से बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि सुधार समिति व्यवस्था को शुद्ध करने के लिए बनाई गई है, संदिग्ध भूमिका वाले अधिकारियों को संरक्षण देने के लिए नहीं. यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता चाहती है, तो उसे सबसे पहले इस घोर विरोधाभासी निर्णय को वापस लेकर स्वच्छ, पारदर्शी और ईमानदार सदस्यों को शामिल करना चाहिए.

नेता प्रतिपक्ष के द्वारा मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्र में कहा गया है कि झारखंड की भर्ती परीक्षाओं में सामने आई गंभीर अनियमितताओं के बाद सरकार द्वारा परीक्षा सुधार समिति का गठन किया गया है, लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और आपतिजनक है कि फरवरी 2024 JSSC अध्यक्ष पद पर आसीन वित्त सचिव प्रशांत कुमार को ही इस समिति में शामिल कर दिया गया है.

सितंबर 2024 की विवादित JSSC-CGL परीक्षा उनके ही कार्यकाल में आयोजित हुई थी, जिसे रद्द करना पड़ा. साथ ही JSSC कार्यालय में छापेमारी हुई. आयोग के सचिव से पूछताछ हुई और पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा. ऐसे में जिस अधिकारी के कार्यकाल और प्रशासनिक भूमिका की स्वतंत्र निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उसे ही व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी देना स्पष्ट रूप से हितों का टकराव है.

प्रशांत कुमार की कार्यशैली पर उठाए सवाल

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने अपने पत्र के माध्यम से प्रशांत कुमार के प्रशासनिक आचरण और कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि प्रशांत कुमार वित्त सचिव रहते हुए राज्य के खातों में हजारों करोड़ रुपये के अंतर पर विभाग द्वारा स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया. जल संसाधन विभाग से जुड़े एक मामले में झारखंड उच्च न्यायालय ने अदालत को गुमराह करने और आदेश का पालन नहीं करने पर उनपर जुर्माना भी लगाया था.

इसके बावजूद उन्हें परीक्षा सुधार समिति में रखना सरकार की मंशा को संदेहास्पद बनाता है. यह निर्णय इतना स्पष्ट रूप से अनुचित है कि इसे देखने के लिए आंखों की भी आवश्यकता नहीं है. जिस अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए, उसी को सुधारक बनाना ठीक वैसा ही है जैसे दूध की रखवाली बिल्ली को सौंप देना.

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