आजादी के 78 साल बाद भी लातेहार के इस गांव में नहीं है कोई भी सुविधा, ग्रामीण लगा रहे गुहार
लातेहार के गवालखाड़ गांव में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं पहुंच पाई है. पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य जैसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है.


Published : July 1, 2026 at 5:28 PM IST
लातेहार: आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी लातेहार जिले में एक ऐसा गांव है, जहां आज तक बुनियादी सुविधाएं भी नहीं पहुंच पाई हैं. जिला मुख्यालय से लगभग 110 किलोमीटर और महुआडांड़ अनुमंडल मुख्यालय से मात्र 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गवालखाड़ गांव तक ना सड़क पहुंच पाई, ना पीने का पानी पहुंच पाया, ना बिजली पहुंच पाई, ना शिक्षा और ना ही चिकित्सा व्यवस्था ही बहाल हो सकी.
दरअसल, गवालखाड़ पूरी तरह आदिवासी और आदिम जनजाति बहुल गांव है. लगभग 50 परिवार के इस गांव में 400 से अधिक लोग निवास करते हैं. परंतु गांव का दुर्भाग्य यह है कि जब पूरी दुनिया डिजिटल युग के चकाचौंध में पहुंच चुकी है, इस दौर में भी यह गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है.
अत्याधुनिक सुविधाओं की तो बात ही अलग है, यहां सड़क और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है. गांव में ना बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल है और ना ही बिजली की रोशनी. मोबाइल का नेटवर्क भी यहां तक नहीं पहुंचा.
चिकित्सा सुविधा तो यहां दूर की बात है. प्रखंड और अनुमंडल मुख्यालय से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के बाद भी यहां के ग्रामीणों को प्रखंड मुख्यालय तक आने में 4 घंटे लग जाते हैं. ग्रामीणों को लगभग 6 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है. इस 6 किलोमीटर के रास्ते की स्थिति ऐसी है कि यहां चारपहिया वाहन और मोटरसाइकिल से जाना तो दूर, पैदल चलना भी कठिन होता है.
यदि कोई गांव में बीमार पड़ जाता है तो ग्रामीण उसे कंधे पर ढोकर अस्पताल पहुंचाते हैं. कई लोग तो बीमारी की स्थिति में इलाज के अभाव में मौत के मुंह में भी चले जाते हैं. स्थानीय ग्रामीण केदार नगेसिया ने बताया कि सड़क के अभाव में अस्पताल नहीं पहुंच पाने की स्थिति में कई लोगों की जान चली गई है.

पानी के लिए जंगल का चुआं ही सहारा
गांव में रहने वाले ग्रामीणों को पीने के लिए गांव से दूर जंगल में स्थित एक चुआं ही एकमात्र सहारा है. स्थानीय ग्रामीण सीता कोरबा ने बताया कि गांव में पानी की बड़ी समस्या है. ना यहां चापाकल है और ना ही नल जल योजना के तहत ग्रामीणों के घर में पानी पहुंचाया गया है. एक जल मीनार लगा था, पर ग्रामीणों के घर-घर पानी नहीं पहुंच पाया.
उन्होंने बताया कि गांव में एक कुआं भी नहीं है. जंगल में स्थित प्राकृतिक चुआं से ही पूरे गांव के ग्रामीण और जानवर पानी पीते हैं. बरसात के दिनों में पानी काफी गंदा हो जाता है तो बीमारी का भी डर लगा रहता है. उन्होंने बताया कि गांव में रोजगार के लिए भी कोई साधन नहीं है. यहां के ग्रामीण सिर्फ खेती पर ही निर्भर हैं. सरकार की कोई भी रोजगार योजना यहां नहीं चलती है.

गांव में शिक्षा की भी नहीं है कोई व्यवस्था
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि गांव में बच्चों की शिक्षा के लिए भी किसी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है. बच्चों को गांव से दूर स्थित स्कूल में पढ़ने के लिए जाना पड़ता है. बरसात के दिनों में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है.
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में आज तक बिजली भी नहीं पहुंची है. रात होते ही पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है. ग्रामीणों के घर में ढिबरी जलाना भी मुश्किल होता है तो बच्चों की पढ़ाई कहां से होगी?
ग्रामीणों का कहना है कि आज तक इस गांव में कभी भी कोई बड़ी गाड़ी नहीं पहुंच पाई है. मोटरसाइकिल वाले कभी-कभी गांव में पहुंचते हैं. हालांकि, गांव की सड़के इतनी खराब हैं कि इस पर मोटरसाइकिल चलाना भी खतरे से खाली नहीं होता. मजबूरी में बच्चों को पैदल ही स्कूल जाना पड़ता है. पूरे बरसात तक बच्चे पढ़ाई से वंचित रहते हैं.

गांव तक सड़क बनने का सपना
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यहां उनकी पीढ़ियां गुजर गईं, परंतु आज तक गांव में सड़क तथा अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाई. उनका एकमात्र सपना है कि अपने जीते जी वह गांव तक पहुंचने के लिए कम से कम एक सड़क देख लें.
वन भूमि होने के कारण हो रही है परेशानी
इस संबंध में विधायक प्रतिनिधि इफ्तिखार अहमद ने बताया कि विधायक रामचंद्र सिंह ने गांव के विकास के लिए प्रस्ताव विभाग को भेज दिया है. हालांकि, गांव तक जाने के लिए जो सड़क है, वह पूरी तरह वन भूमि में है. वन भूमि में होने के कारण पक्की सड़क बनाने में परेशानी हो रही है.
वही प्रखंड विकास पदाधिकारी संतोष बैठा ने कहा कि गांव में सड़क तथा अन्य समस्याओं की जानकारी है. वन भूमि होने के कारण पक्की सड़क का निर्माण नहीं हो पा रहा है. कच्ची सड़क है, गांव तक पहुंचने के लिए पैदल ही चलना पड़ता है. वह खुद भी कई बार इस गांव में गए हैं. उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन का प्रयास है कि गांव में सुविधाएं बहाल हो.
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