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सर्पदंश के इलाज में जागरूकता की कमी: अलवर में 76 PHC पर एंटी स्नेक वेनम टीका, फिर भी झाड़-फूंक में उलझ रहे लोग

अलवर के जिला अस्पताल में डेढ़ साल में सर्पदंश के 377 मामले आए, जिनमें करीब 6 मौतें हुईं.

snakebite cases in Alwar
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय (ETV Bharat Alwar)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : September 1, 2026 at 5:55 PM IST

3 Min Read
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अलवर: ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा सुविधा के टोटे की शिकायत के बीच सर्पदंश के मामले में हकीकत उलट है. स्वास्थ्य विभाग ने 76 पीएचसी पर एंटी स्नेक वेनम (जहर विरोधी टीका) उपलब्ध कराया है, लेकिन जागरूकता की कमी से लोग पीएचसी के बजाय झाड़-फूंक में उलझते हैं या सीधे जिला अस्पताल पहुंचते हैं, जिससे जिला अस्पताल पर भार बढ़ा है और इलाज में देरी से जान को खतरा होता है. जिले में हर साल झाड़-फूंक में उलझ कर जान जोखिम में डालने के सैकड़ों मामले आते हैं.

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. योगेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि जिले में स्वास्थ्य विभाग ने ग्रामीण स्तर पर ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एंटी स्नेक वेनम सुविधा दी है, क्योंकि घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा होती हैं. खेत में काम या जंगल में लकड़ी-चारा लाने के दौरान सांप डस लेते हैं, तुरंत उपचार जरूरी होता है, देरी से जहर तेजी से फैलता है और जान जा सकती है.

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जिला अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी( पीएमओ) डॉ. प्रवीण शर्मा ने बताया कि डेढ़ साल में अस्पताल में सर्पदंश के 377 मामले आए, जिनमें करीब 6 मौतें हुईं. यहां अलवर के साथ हरियाणा के मेवात, भरतपुर, डीग, सीकरी, पहाड़ी सहित आसपास के क्षेत्रों के मरीज आते हैं. मरीजों के लिए राउंड द क्लॉक चिकित्सकों की ड्यूटी लगाई गई है. सरकार ने शुरुआती उपचार के लिए पीएचसी स्तर पर वेनम उपलब्ध कराया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पहले झाड़-फूंक कराई जाती है, हालत बिगड़ने पर अस्पताल लाया जाता है. इससे इमरजेंसी पर अतिरिक्त दबाव और मरीज के लिए जोखिम बढ़ता है.

सर्पदंश के बाद एक घंटा महत्वपूर्ण: सीएमएचओ डॉ. शर्मा ने बताया कि सांप के डंसने के बाद एक घंटा पीड़ित के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है. समय पर उपचार जरूरी है, लेकिन कई बार लोग पहले तांत्रिक के पास जाते हैं, जहां चीरा लगाना, जहर चूसना, रस्सी से कसकर बांधना या घरेलू नुस्खों में समय गंवा दिया जाता है और हालत बिगड़ने पर अस्पताल भागते हैं. देरी से जान को खतरा होता है.

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बारिश में बढ़ जाता है खतरा: बारिश में ग्रामीण क्षेत्रों में खतरा बढ़ जाता है. पानी बिलों में भरने से सांप सुरक्षित जगह की तलाश में बाहर निकलते हैं और खेत, झाड़ियां, लकड़ी-भूसे के ढेर, घरों के आसपास के सामान और अंधेरे स्थानों में छिप जाते हैं, जिससे किसान, मजदूर और रात में बाहर निकलने वालों को जोखिम बढ़ जाता है.