नौकरी नहीं.. मां का सपना चुना, इंदु ने बदल दी ग्रामीण महिलाओं की तकदीर
ये कहानी है इंदु की, जिन्होंने अपनी नौकरी की जगह मां के सपने को चुना और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : December 19, 2025 at 5:05 PM IST
|Updated : December 19, 2025 at 5:12 PM IST
शिमला: कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहां फैसला सिर्फ अपनी नौकरी या भविष्य का नहीं, बल्कि परिवार, समाज और जिम्मेदारी का होता है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के बंजार क्षेत्र के छोटे से गांव कलहेली की इंदु संधु के सामने भी ऐसा ही मुश्किल दौर आया. एक ओर पंचकूला की निजी कंपनी में सुरक्षित और अच्छी नौकरी थी, तो दूसरी ओर मां का अधूरा सपना और गांव की महिलाओं की जिम्मेदारी. लेकिन इंदु ने दिल की सुनी और वह रास्ता चुना, जिसने न सिर्फ उनकी पहचान बदली, बल्कि दर्जनों ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बना दिया.
संधु स्वयं सहायता समूह की नींव वर्ष 2020 में इंदु की मां ने रखी थी. उनका सपना था कि गांव की महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों, पारंपरिक हिमाचली वस्त्रों को नई पहचान मिले और रोजगार के लिए किसी को गांव छोड़कर बाहर न जाना पड़े. शुरुआत में समूह से कुछ महिलाएं जुड़ीं और पारंपरिक कपड़ों व हस्तशिल्प का काम शुरू हुआ. लेकिन वर्ष 2022 में मां के निधन के बाद परिवार के साथ-साथ स्वयं सहायता समूह के सामने भी मुश्किल दौर आ गया.
नौकरी और जिम्मेदारी के बीच फैसला
उस समय इंदु बी-फार्मा की पढ़ाई पूरी कर पंचकूला की एक निजी कंपनी में पिछले करीब पांच साल से नौकरी कर रही थीं. उनके छोटे भाई अमन बीबीए के छात्र थे. पिता सेना से सेवानिवृत्त हैं और वर्तमान में लारजी परियोजना में कार्यरत हैं. मां के जाने के बाद स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं के सामने रोजी-रोटी का सवाल खड़ा हो गया. समूह बंद होने की कगार पर था. ऐसे में इंदु के सामने सबसे बड़ा सवाल था- नौकरी जारी रखें या मां के सपने को संभालें.
'त्याग नहीं, यह मेरा चयन था'
इंदु कहती हैं कि नौकरी छोड़ने का फैसला आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे त्याग नहीं बल्कि अपना चयन माना. उन्होंने स्वयं सहायता समूह की कमान संभाली और एक नई शुरुआत की. बचपन से मां को काम करते देखती आई थीं, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उन्हें यह सब जिम्मेदारी खुद निभानी पड़ेगी. उत्पादन, डिजाइन, कच्चा माल, बाजार और बिक्री.. हर पहलू को उन्होंने नए सिरे से समझा. सबसे पहले उन्होंने समूह से जुड़ी 18 महिलाओं को भरोसा दिलाया कि किसी भी कीमत पर उनका रोजगार प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा.
भाई-बहन की जोड़ी बनी ताकत
इंदु के फैसले में उनके भाई अमन भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे. पढ़ाई के साथ-साथ अमन ने उत्पादन और प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली।.दोनों भाई-बहन ने तय किया कि यह समूह सिर्फ चलाया नहीं जाएगा, बल्कि आगे बढ़ाया जाएगा. मेहनत और निरंतर प्रयास का नतीजा यह रहा कि तीन साल बाद आज संधु स्वयं सहायता समूह कुल्लू जिले की पहचान बनता जा रहा है.
पारंपरिक वस्त्रों को मिला नया रूप
आज समूह स्थानीय पारंपरिक वस्त्रों से बने सदरी, कोट, गर्म सूट, शॉल, टोपी और कढ़ाई से तैयार वॉल फ्रेम तैयार कर रहा है. ये उत्पाद सिर्फ गांव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे हिमाचल में पसंद किए जा रहे हैं. गांव कलहेली में समूह की अपनी दुकान है, जहां ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए गए सभी उत्पाद उपलब्ध हैं. खास बात यह है कि इनमें जीआई टैग प्राप्त कच्चे माल का उपयोग किया जा रहा है.
सरकारी योजनाओं से मिला सहारा
संधु स्वयं सहायता समूह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ा हुआ है. सरस मेला, हस्तशिल्प मेले और ट्रेड फेयर में स्टॉल लगाकर समूह अपने उत्पादों को आम लोगों तक पहुंचा रहा है. इंदु और अमन मानते हैं कि सरकारी सहयोग और योजनाओं के बिना यह विस्तार संभव नहीं था.
परंपरा और आधुनिकता का संगम
इंदु बताती हैं कि पारंपरिक हिमाचली वस्त्र हमारी संस्कृति की पहचान हैं, लेकिन युवा पीढ़ी उनसे दूर होती जा रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए समूह ने पारंपरिक डिजाइनों को मॉडर्न टच के साथ तैयार करना शुरू किया, ताकि नई पीढ़ी भी इन्हें अपनाए. अमन के अनुसार, इंदु मार्केटिंग और ब्रांडिंग संभालती हैं, जबकि वे उत्पादन और प्रबंधन का काम देखते हैं. उनका लक्ष्य भविष्य में और अधिक ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ना है.
मां के सपनों से बनी पहचान
यह कहानी सिर्फ एक स्वयं सहायता समूह की सफलता की नहीं है, बल्कि उस मां के सपने की है, जिसे उसके बच्चों ने अपनी मेहनत और संकल्प से जिंदा रखा. इंदु और अमन आज जो कुछ भी कर रहे हैं, वह मां के अधूरे सपनों को पूरा करने की कोशिश है. इस सफर में मेहनत के साथ-साथ सरकार की योजनाएं भी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई हैं.
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