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मणिकर्ण घाटी की वासुकी झील में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, प्रदेश की 4 बड़ी झीलों में बाढ़ की शीघ्र मिलेगी जानकारी

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा.

वासुकी झील में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम
वासुकी झील में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : February 12, 2026 at 7:12 PM IST

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कुल्लू: हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में आए मौसम के बदलाव के चलते ग्लेशियर तेजी से पिघलना शुरू हो गए हैं. ऐसे में पहाड़ी पर बनी झीलों के पानी में भी अचानक वृद्धि हो सकती है. अचानक वृद्धि के चलते नदी-नालों में भी बाढ़ आने का खतरा पैदा हो सकता है. इन सभी खतरों को ध्यान में देखते हुए अब सभी ऊंचाई वाली प्रमुख झीलों में प्रदेश सरकार के द्वारा अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है.

इसी कड़ी में जिला कुल्लू की मणिकर्ण घाटी के वासुकी झील में भी प्रशासन द्वारा अब अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी की जा रही है. इससे पहले लाहौल घाटी की घेपन झील में भी प्रशासन द्वारा यह कार्य शुरू किया गया है. वही, किन्नौर और रामपुर में भी सरकार के द्वारा झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाएगा. ताकि गर्मियों में अगर ग्लेशियर पिघल कर झील का पानी अनियंत्रित होता है तो इसके बारे में तुरंत प्रशासन को जानकारी मिल सके.

कुल्लू के अतिरिक्त उपायुक्त अश्वनी कुमार ने बताया, 'पार्वती घाटी की वासुकी झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा. क्योंकि राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण द्वारा इस खतरे की सूची में चिन्हित किया गया है. घाटी में पहाड़ों पर अब बर्फ पिघल रही है और सर्दी भी कम हो रही है. ऐसे में अगले महीने से वासुकी झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का काम शुरू कर दिया जाएगा'.

हिमाचल की ऊंचाई वाली झीलों पर पहली बार इस तरह का कार्य किया जा रहा हैं. इस कार्य के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने प्रदेश की चार उच्च जोखिम वाली झीलों को चिह्नित किया है. जहां यह आधुनिक प्रणाली स्थापित होगी. इन झीलों में कुल्लू जिला की पार्वती घाटी स्थित वासुकी झील (खीरगंगा) शामिल है, जो समुद्र तल से 14,770 फीट की ऊंचाई पर है और करीब 12.49 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है. उसके अलावा लाहौल-स्पीति जिला की गिपांग (घेपन) झील भिन्न लगभग 13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित है और 92.09 हेक्टेयर क्षेत्रफल के साथ उसका तेजी से विस्तार हो रहा है.

वही, तीसरी झील किन्नौर जिला की सांगला घाटी में 15,465 फीट ऊंचाई पर बनी बास्पा झील है और उसका क्षेत्रफल 18.88 हेक्टेयर है. वही, चौथी झील सतलुज बेसिन के काशंग गाड़ क्षेत्र में 14,025 फीट की ऊंचाई पर स्थित कालका झील है. 27.89 हेक्टेयर में फैली इस झील भी खतरे की श्रेणी में है. इन चारों झीलों के फटने की स्थिति में पानी सीधे चंद्रा, पार्वती और सतलुज नदियों में उतरेगा, जिससे निचले क्षेत्रों में भारी तबाही की आशंका है.

जिला कुल्लू प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार घाटी में अब जल्द ही इसका काम शुरू किया जाएगा. क्योंकि अब घाटी में सर्दी कम होती जा रही है. यह सिस्टम सेटेलाइट पर आधारित होगा और इन सभी झील में अचानक जलस्तर, ग्लेशियर टूटने या असामान्य हलचल की स्थिति में पहले ही अलर्ट जारी करेगा. जिससे प्रदेश में मौसम विभाग और जिला प्रशासन को तत्काल सूचना मिलेगी. ताकि राहत एवं बचाव की तैयारी समय रहते की जा सकेगी.

विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. जिससे इन झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है. अगर समय रहते निगरानी और नियंत्रण के उपाय नहीं किए गए तो हिमालयी क्षेत्र में अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं.

राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण के द्वारा हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लॉफ) जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत 195 उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों को चिह्नित किया है. पहले यह संख्या पहले 56 थी, जिसे अब बाद में बढ़ाया गया है. देश में लगभग 7,500 से अधिक हिमनद झीलें हैं. जिनमें से 195 को संभावित खतरे के रूप में चिह्नित किया गया है. ये झीलें मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में हैं.

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