ETV Bharat / state

मंदिर ही नहीं देवताओं के सामान बनाने के लिए भी हैं कड़े नियम, परिवार से दूर दिन भर भूखे रहकर कारीगर करते हैं काम

कारीगरों ने बताया कि मंदिर और देवताओं का सामान तैयार करने के लिए कठिन देव नियमों का पालन करना होता है.

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
देवताओं के सामान तैयार करने के लिए कड़े नियम (ETV Bharat GFX)
author img

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : November 5, 2025 at 8:56 PM IST

7 Min Read
Choose ETV Bharat

बाल कृष्ण शर्मा की रिपोर्ट

कुल्लू: हिमाचल प्रदेश जहां अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए देश दुनिया में मशहूर है तो वहीं यहां की देव संस्कृति भी अपने आप में अनूठी है. एक ओर कुल्लू जिले में हर साल आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में जहां सैकड़ों देवी-देवता ढालपुर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं, तो वहीं दूसरी ओर इस अनूठी देव संस्कृति को देखने के लिए देश-विदेश से सैलानी भी यहां पहुंचते हैं. खास बात यह है कि देव रथ के मोहरे और अन्य प्रतीक चिन्ह बनाने के लिए कारीगर को कई कठिन देव नियमों का पालन करना पड़ता है.

देवताओं के सामान तैयार करने के लिए कड़े नियम

देवी देवताओं के रथ, उनके साथ ढोल नगाड़े बजाते हुए लोग और देवता के प्रतीक चिन्ह उठाकर भक्त ढालपुर मैदान में 7 दिनों तक रहते हैं. इस दौरान पूरा ढालपुर मैदान भक्तिमय हो उठता है. इस पावन अवसर पर देवी-देवताओं के रथ, प्रतीक चिन्हों को देखकर लोगों के मन में भी श्रद्धा भर आती है. लेकिन, रथ यात्रा और देवी-देवताओं की प्रतिमा को अंतिम रूप देने तक कारीगरों को कठिन देव तप भी करना होता है. आज हम आपको इन्हीं नियमों के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं.

देवताओं के सामान बनाने के लिए भी हैं कड़े नियम (ETV Bharat)

पूजा-पाठ के बाद शाम तक खाली पेट काम करते हैं कारीगर

देव नियमों के अनुसार, देवताओं के सामान तैयार करने वाला कारीगर इन सभी प्रत्येक साजो सामान को बनाते समय न तो अपने घर जा सकता है और न ही वह अन्य लोगों के साथ मिलजुल सकता है. इतना ही नहीं सुबह पूजा-पाठ करने के बाद खाली पेट ही उसे शाम तक यह सामान तैयार करने होते हैं. इतने कठिन नियमों के बावजूद भी कारीगर अपनी प्राचीन कला से देवी-देवताओं के मोहरे, धड़छ, शांगल, घंटी सहित अन्य देव कार्य में प्रयोग होने वाले सामान को तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
देव सामान बनाने वाले कारीगरों के लिए नियम (ETV Bharat GFX)

सामान बनाते वक्त कारीगर पालन करते हैं देव नियम

कुल्लू जिला मुख्यालय ढालपुर में एक ओर जहां हस्तकला और हथकरघा के उत्पाद ग्राहकों को मिल रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर घाटी की समृद्ध देव परंपरा से संबंधित साजो सामान भी यहां लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं. इन साजो सामान के बिना न तो देवी देवताओं की पूजा-अर्चना होती है और न ही इन सामान के बिना देव नीति पूरी होती है. ऐसे में कारीगर इन सामान को बनाते समय देव नियमों का भी विधिवत रूप से पालन करते हैं.

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
कारीगरों के लिए देव नियम (ETV Bharat)

इतना ही नहीं कई बार देवता के सामान तैयार करने के समय कारीगर को भूखा भी रहना पड़ता है और कई बार उन्हें अपने घर से भी बाहर रहना पड़ता है. कारीगरों के तप की वजह से देवताओं के सामान में एक अलग ही रूप नजर आता है. ढालपुर में इन दिनों देवता के धड़छ, सांगल, मोहरे, घंटी सहित अन्य साजो सामान मिल रहे हैं. देव समाज से जुड़े लोग भी इनकी इनकी खरीदारी कर रहे हैं.

मंदिर में ही देव सामान बनाते हैं कारीगर

देवता के रथ के निर्माण में जो मोहरे बनाए जाते हैं, वह अधिकतर पीतल, कांसा के बनाए जाते हैं. कई देवी देवताओं के मोहरे सोने और चांदी से भी निर्मित किए जाते हैं. ऐसे में जब भी यह कार्य शुरू किया जाता है तो कारीगरों को मंदिर में ही बुलाया जाता है. मंदिर में देवता के गुर के द्वारा देव वाणी की जाती है और किस तरह से यह सामान तैयार करना है, उसके बारे में भी कारीगरों को निर्देश दिए जाते हैं. सामान बनाने के लिए कारीगरों को करीब तीन माह से छह माह तक मंदिर में ही रहना पड़ता है.

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
देवताओं के सामान तैयार करने के लिए कड़े नियम (ETV Bharat)

इस दौरान न तो वह मांसाहार और न ही किसी प्रकार के नशीली पदार्थों का सेवन कर सकता है. देवताओं के सामान बनाने वाले कारीगर इस दौरान बिल्कुल एकांत जीवन जीते हैं. इस दौरान कारीगर किसी से मुलाकात भी नहीं करते हैं. सुबह स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद कारीगर सबसे पहले देवता की पूजा-अर्चना करते हैं और उसके बाद देव नियमों के अनुसार खाली पेट रहकर शाम तक इन मोहरा, घंटी, धड़छ, शागल सहित अन्य देवता के प्रतीक चिन्ह का निर्माण करते हैं.

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
कठिन देव नियम का पालन कर कारीगर बनाते हैं मोहरे (ETV Bharat)

घर पर भी देव सामान बनाने के दौरान देव नियम का पालन

कारीगरों का कहना है कि, "देवता के मंदिर निर्माण के अलावा जो भी अन्य सामान तैयार करते हैं. उन्हें भी देव नियमों के अनुसार ही तैयार करना पड़ता है. चाहे वह उस सामान को अपने घर में ही तैयार कर रहे हों, घर में भी जब भी देवी देवताओं के यह साजो सामान बनाए जाते हैं तो उस दौरान भी हमें खाली पेट ही काम शुरू करना पड़ता है. बस अंतर यह है कि इस दौरान हम शाम के वक्त अपने घर में रहते हैं, जबकि बाकी सभी नियमों का पालन घर पर भी करना पड़ता है. कई बार लोग देवी-देवताओं के प्रतीक चिन्ह भी हमसे ले जाते हैं और उसे बाद में देव नियमों के अनुसार प्रतिष्ठित कर मंदिर में स्थापित करते हैं. इसलिए इन सभी प्रतीक चिन्ह के निर्माण के दौरान हमें इन सभी बातों का खास ख्याल रखना पड़ता है."

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
कठिन तप कर कारीगर तैयार करते हैं प्रतिमा (ETV Bharat)

पूजा-अर्चना के बाद देवता से अनुमति लेते हैं कारीगर

कारीगर टेक सिंह कहते हैं, "यह सभी सामान मंदिर में आवश्यक होते हैं और देवता का रथ जब भी अपने क्षेत्र की परिक्रमा पर निकलता है तो यह सामान भी होना जरूरी है. ऐसे में इन सामान को बनाते समय हमें खाली पेट ही काम करना होता है. सुबह के समय पहले पूजा-अर्चना करते हैं. उसके बाद देवता से यह सब सामान बनाने की अनुमति ली जाती है. जब तक सामान बनाने का काम शाम तक पूर्ण नहीं हो जाता है, तब तक पानी भी नहीं पी सकते हैं. आज भी देवताओं के इन सामान को बनाते समय इन सभी बातों का विशेष ध्यान रखते हैं."

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
देवताओं के लिए सामान बनाते समय घर से रहना पड़ता है दूर (ETV Bharat)

देव सामान बनाते वक्त किसी से मुलाकात नहीं करते कारीगर

कारीगर खूब राम ने बताया कि, "हमारे पूर्वज भी यही काम करते थे और कई मंदिरों में जाकर वह यह काम करते हैं. छोटा सामान बनाते समय हमें 3 दिन का समय भी लगता है, लेकिन देवता का बड़ा सामान तैयार करने में हमें कई बार महीने भी लग जाते हैं. ऐसे में कई बार हमें घर जाने की अनुमति मिल जाती है, लेकिन कई बार हमें मंदिर में ही रहना पड़ता है. देवताओं के प्रति हमारी गहरी आस्था है और उस आस्था का सम्मान करते हुए हम आज भी इस काम को पूरी आस्था के साथ कर रहे हैं."

Kullu Artisans Follow Strict Dev rules
देवता से अनुमति लेकर सामान बनाते हैं कारीगर (ETV Bharat)

देव सामान बनाने में कारीगरों की अहम भूमिका

हिमाचल प्रदेश के साहित्यकार डॉ. सूरत ठाकुर का कहना है कि, "देवी-देवताओं के साजो सामान बनाने की परंपरा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों के अलावा उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर में भी है. इसके अलावा दक्षिण भारत के मंदिरों में भी देव नियमों का पालन करने के बाद ही देवी देवताओं की मूर्तियां व अन्य सामान तैयार किए जाते हैं. इसमें कारीगरों की विशेष भूमिका रहती है, क्योंकि वह इन देव नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं. उसके बाद मंदिर में उन सामान की प्रतिष्ठा की जाती है. हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर कारीगर आज भी अपनी प्राचीन काल से देवी देवताओं के साजो सामान पूरे नियमों के साथ तैयार करने की परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं."

ये भी पढ़ें: अखरोट और प्याज के छिलके से प्राकृतिक रंग तैयार कर बनते हैं रंग-बिरंगे ऊनी कपड़े, देश-विदेश में भारी डिमांड

ये भी पढ़ें: जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के लिए खतरा, ग्लेशियर पिघलने से घेपन झील का 176% बढ़ा दायरा, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा