संस्कृति के रंग : DJ के जमाने में भी 'चंग' की थाप की आवाज जिंदा रखा है यह परिवार...
कुचामनसिटी के भरत कुमार का परिवार पिछली चार पीढ़ियों से चंग जैसी विरासत को बचाने के लिए इसे बनाने का काम कर रहा है.

Published : February 20, 2026 at 7:47 PM IST
कुचामनसिटी: फागुन का महीना आते ही कभी गलियां चंग-ढप की थाप से गूंज उठती थीं. मंदिरों में फाग और चौपालों पर होली के पारंपरिक गीतों का दौर शुरू हो जाता था, लेकिन आधुनिकता की इस भागदौड़ में डीजे और महंगे म्यूजिक सिस्टम ने त्योहारों की वो पुरानी तस्वीर बदल दी है. होली अब केवल रंगों और पानी तक सीमित रह गई है, उसकी आत्मा कहीं खो सी गई है. इसी बदलते दौर में डीडवाना-कुचामन जिले का एक परिवार ऐसा है जो आज भी इस मिटती परंपरा को बचाए हुए है. कुचामनसिटी के भरत कुमार का परिवार पिछली चार पीढ़ियों से चंग बनाने का काम कर रहा है. उनके हाथों की बनी यह लोक कला आज भी फागुन में जान फूंकने को तैयार है. यह परिवार सिर्फ व्यवसाय नहीं कर रहा, बल्कि एक विरासत को संजोए हुए है. होली की वो असली पहचान जो अब विलुप्त होने के कगार पर है.
भरत कुमार का परिवार बताते हैं कि पहले फाल्गुन शुरू होते ही चंग के ऑर्डर आने लगते थे. एक महीने में एक हजार से अधिक चंग बनाकर भेजे जाते थे. दुकानों के बाहर सजे चंग कुछ ही दिनों में बिक जाया करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं. इस बार पूरे महीने में महज 150 से 200 चंग ही बनाकर बेचे जा सके. वे कहते हैं कि पहले होली केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि पूरे पखवाड़े तक चलने वाला उत्सव हुआ करता था. समाज के नोहरे, मंदिर और चौराहे चंग की थाप से गूंजते थे. अब त्योहार पांच दिनों तक सीमित रह गया है.
पारंपरिक गीतों की जगह फूहड़ गीतों ने ले ली है, जो निराशाजनक है. युवा राकेश पारीक भी मानते हैं कि पहले रात के समय युवाओं की टोलियां चंग बजाते हुए नजर आती थीं. आज मोबाइल और डीजे से ही चंग की आवाज सुनाई देती है. वे कहते हैं कि भारतीय संस्कृति को सहेजना आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है.
बिक्री में आई कमी, लेकिन हौसला कायम: होली पर बजने वाले वाद्ययंत्रों की बिक्री में स्पष्ट कमी आई है. ढोल, तबला, ढप और विशेष ग्रामीण वाद्ययंत्र 'ढोल कुंडी' के खरीदार पहले जैसे नहीं रहे. व्यापारियों में पहले जैसा उत्साह भी कम नजर आता है. इसके बावजूद भरत कुमार रैगर का परिवार निराश होकर बैठा नहीं है. वे सीमित ऑर्डर के बावजूद पूरी लगन और गुणवत्ता के साथ चंग तैयार करते हैं. उनका मानना है कि जब तक एक भी व्यक्ति पारंपरिक फाग गाने और चंग बजाने के लिए तैयार है, तब तक यह परंपरा खत्म नहीं होगी.
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संस्कृति बचाने का संकल्प: भरत के परिवार का कहना था कि वे केवल व्यवसाय नहीं कर रहे, बल्कि एक विरासत को संभाल रहे हैं. उनका सपना है कि आने वाली पीढ़ी फिर से होली को उसी पारंपरिक अंदाज में मनाए, जहां चंग की थाप पर लोकगीत गूंजें और समाज एकजुट होकर उत्सव मनाए. आधुनिक युग भले ही होली की तस्वीर बदल रहा हो, लेकिन कुचामन का यह परिवार साबित कर रहा है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो परंपराएं कभी खत्म नहीं होतीं. फागुन की असली पहचान आज भी चंग की थाप में ही बसती है और यही थाप आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का जिम्मा इस परिवार ने उठा रखा है.

