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रिश्वतखोरी मामले में सब इंजीनियर की जमानत खारिज, भ्रष्टाचार के खिलाफ कोरिया जिला कोर्ट का कड़ा संदेश

विशेष न्यायाधीश ने रिश्वत मामले में लोक निर्माण विभाग के सब इंजीनियर को जमानत नहीं दी. कहा- आरोपी की भूमिका प्रथम दृष्टया स्पष्ट है.

Korea Court Corruption Case
रिश्वतखोरी मामले में सब इंजीनियर की जमानत खारिज (ETV BHARAT CHHATTISGARH)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : January 3, 2026 at 4:05 PM IST

3 Min Read
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कोरिया: जिले में भ्रष्टाचार के एक मामले में अदालत ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के सब इंजीनियर छत्रपाल बंजारे की जमानत याचिका खारिज कर दी है. यह आदेश विशेष न्यायाधीश शैलेश कुमार तिवारी ने दिया. यह मामला एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB), अंबिकापुर द्वारा दर्ज अपराध क्रमांक 61/2025 से जुड़ा है.

अदालत ने क्यों खारिज की जमानत: अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मामले में आरोपी की प्रथम दृष्टया संलिप्तता साफ दिखाई देती है. साथ ही अपराध की प्रकृति गंभीर है, इसलिए आरोपी को जमानत देना उचित नहीं है.

क्या है पूरा मामला: मनेन्द्रगढ़ व्यवहार न्यायालय परिसर में बार रूम विस्तार निर्माण कार्य का ठेका एक ठेकेदार को दिया गया था. निर्माण कार्य की अनुमानित लागत 8.56 लाख रुपये थी. कार्य शुरू होने के बाद एक चरण पूरा होने पर करीब 2.99 लाख रुपये का भुगतान किया गया.

रिश्वत मांगने का आरोप: निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अक्टूबर 2025 में भौतिक सत्यापन और मूल्यांकन के लिए सब इंजीनियर छत्रपाल बंजारे से संपर्क किया गया. आरोप है कि इसी दौरान सब इंजीनियर ने माप पुस्तिका में प्रविष्टि करने के बदले 25 हजार रुपये रिश्वत की मांग की. रिश्वत की मांग से परेशान होकर ठेकेदार ने एसीबी अंबिकापुर में लिखित शिकायत दर्ज कराई.

सत्यापन के बाद ट्रैप कार्रवाई: एसीबी ने शिकायत की जांच और सत्यापन किया, जिसमें रिश्वत मांग की पुष्टि हुई. इसके बाद 30 अक्टूबर 2025 को जाल बिछाकर कार्रवाई की गई. आरोपी को 21 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया. मौके से रिश्वत की राशि जब्त की गई.

किस कानून के तहत मामला दर्ज: आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

अभियोजन पक्ष की दलील: लोक अभियोजक ने कहा कि आरोपी एक जिम्मेदार सरकारी पद पर है और इस तरह की रिश्वत सार्वजनिक विश्वास के साथ भी धोखा है. अदालत के सामने वॉयस रिकॉर्डिंग, ट्रैप कार्रवाई और जब्ती पंचनामा जैसे साक्ष्य रखे गए.

बचाव पक्ष की दलील खारिज: बचाव पक्ष ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 483 के तहत जमानत मांगी, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि आरोपी की भूमिका प्रथम दृष्टया स्पष्ट है, अपराध गंभीर है, ऐसे मामलों में नरमी नहीं बरती जा सकती.

यह फैसला जिले में भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका के सख्त रुख को दर्शाता है. अदालत ने साफ संकेत दिया है कि रिश्वत और पद के दुरुपयोग के मामलों में कानून पूरी सख्ती से लागू होगा.

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