घर से 350 रुपये लेकर निकले, आज है 100 करोड़ रुपये का टर्नओवर, जानिए मनोज शर्मा की सक्सेस स्टोरी
झिंगालाला कंपनी के मालिक डॉ. मनोज शर्मा लखनऊ में थे. बातचीत में उन्होंने कहा कि यूपी में मत्स्य उद्योग का बड़ा स्कोप है.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : March 2, 2026 at 5:24 PM IST
|Updated : March 3, 2026 at 7:06 PM IST
रिपोर्ट- अखिल पांडेय
लखनऊ : 'जब मैं अपना करियर बनाने के लिए नांदेड़ से सूरत निकला, तो मेरे पास सिर्फ 350 रुपये थे. सूरत पहुंचते ही वहां पर प्लेग की बीमारी फैल गई थी, जिससे मेरा सपना चकनाचूर हो गया था. करने नौकरी गया था, लेकिन हालत ये हो गई कि फुटपाथ के किनारे झींगा मछली बेचने लगा. इसके बाद से ईश्वर ने ऐसी कृपा की कि आज सूरत में ही सबसे बड़ा और अच्छा झिंगालाला रेस्टोरेंट है और करीब 900 से 1200 टन तक झींगा मछलियों का प्रोडक्शन और सप्लाई करता हूं.'
यह कहानी है एक ऐसे सफल व्यवसायी डॉ. मनोज शर्मा की जो आज 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का मालिक है. मनोज ने लाखों लोगों को रोजगार दिया है. सैकड़ों एकड़ में मछली पालन करते हैं. 125 एकड़ जमीन तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी थी. मनोज का लखनऊ से भी रिश्ता है. यहां पर कठौता झील में उन्होंने ट्रेनिंग ली थी.
मनोज बताते हैं, सिर्फ 72 रुपये में महाराष्ट्र से लखनऊ तक उस समय ट्रेन की यात्रा की थी. मेरे पास उस समय दो रुपये भी नहीं होते थे कि हजरतगंज से चिनहट स्थित कठौता झील तक टेंपो का किराया दे सकूं. टेंपो वालों का हेल्पर बनकर फ्री में ही यात्रा करता था.
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सवाल: संघर्ष से सफलता की कहानी क्या है?
जवाब: आज जिस सफलता पर मैं हूं चाहे तो कोई भी कहानी बोल सकता हूं, लेकिन यह भगवान का आशीर्वाद है. मैंने कभी अपने जीवन में सपने में सोचा नहीं था कि मत्स्य उद्योग से जुडूंगा. मैं तो डॉक्टर, इंजीनियर बनना चाहता था. 1987 में बच्चों की यही इच्छा होती थी. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज एजुकेशन में मैंने मास्टर डिग्री इन एक्वाकल्चर मैनेजमेंट किया. तब वह तीन साल का कोर्स था. पहले स्टाइपेंड 300 से 350 रुपये मिलता था. फिर बढ़कर 1100 से 1200 रुपये तक पहुंच गया था.
मेरी ग्रेजुएशन पूरी हुई, दोस्तों को अच्छी-अच्छी नौकरी मिल गई. कुछ फैमिली प्रॉब्लम थी, मैं घर गया था. इस वजह से कैंपस प्लेसमेंट अटेंड नहीं कर पाया था. ए. कृष्ण रेड्डी मेरे गुरु हैं. वह मुझे बोले कि गुजरात में मुझे एक असाइनमेंट मिला है. तुम मीठे पानी की हैचरी पर बहुत काम कर चुके हो, गुजरात जाओगे. 3000 रुपये महीना मिलेगा.

मेरे पास स्कॉलरशिप के 350 रुपये बचे थे, वही लेकर गुजरात गया था. भगवान भी परीक्षा ले रहे थे. जब स्टेशन पर उतरा, तो पता चला कि सूरत में फ्लड आ चुकी है. इसके बाद वहां प्लेग डिक्लेयर हो गया. बहुत बुरे तकलीफ वाले दिन वहां बीते. मेरिट लिस्ट में पास हुआ लड़का एकदम होटल में काम करने के लिए मजबूर हुआ. प्लेग के टाइम जब सब कुछ बंद हुआ तो एक गांव में चला गया था.
वहां पर एक शेट्टी साहब का होटल था. 12 रुपये की थाली मिलती थी, खाने के पैसे नहीं थे. होटल के काउंटर पर बैठता था. छह घंटे दुकान संभालता था, तो वह खाना फ्री कर देते थे. ऐसे दिन वहां के लोकल सरपंच प्रदीप नाविक मिले. उन्होंने देखा कि इतना एजुकेटेड लड़का है, अच्छा काम कर सकता है. बातचीत करने में अच्छा है, तो मुझसे पूछा कि क्या करते हो.
वे गांव के सरपंच थे तो गांव लेकर गए. जहां 300 से 350 एकड़ जगह थी, वहां पर चार तालाब बनाए. जो रिजल्ट आया उसके बाद तो भगवान की कृपा है कि कभी पीछे पलट कर मैंने देखा नहीं. आज गुजरात में हमारे 16 हजार से 17 हजार किसान मिलाकर करीब 25 हजार एकड़ में 40 हजार टन लगभग 2500 करोड़ रुपये का झींगा पकड़ते हैं, जिससे डेढ़ लाख से दो लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है.
वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीफ मिनिस्टर थे, उन्होंने इसको ध्यान में लिया कि जो समंदर में खारे पानी में 30 से 35 हजार टन का झींगा पकड़ रहा है, तो उन्होंने आशीर्वाद दिया. काफी किसानों को जमीन दी. उसमें मुझे भी 125 एकड़ जमीन दी थी. आज मेरी अपनी कंपनी है जिसका 100 करोड़ से लेकर सवा सौ करोड़ तक का टर्न ओवर है.
मुझे खुशी इस बात की नहीं है कि जिंदगी ने क्या रुख लिया और मैं बहुत सक्सेस हो गया. मुझे इस बात का बड़ा गर्व है और मैं भगवान को धन्यवाद देता हूं जो साइंस, जो टेक्नोलॉजी लेकर मैं गुजरात गया आज गुजरात के करीब चार लाख हेक्टेयर जगह में से हमने 25000 हेक्टेयर जगह डेवलप की है. समंदर के किनारे गरीब मछुआरे हैं जिनकी कमाई का कोई साधन नहीं था आज वह मेरे साथ जुड़े हैं.

सवाल: लखनऊ से भी आपका जुड़ाव रहा है. उसे भी साझा करिए?
जवाब: लखनऊ की कहानी तो ऐसी है कि मैं ऑल इंडिया कंपटीशन देकर मेरिट लिस्ट में सिलेक्ट हुआ. सबसे पहले सात महीने की ट्रेनिंग के लिए जो पहला पड़ाव था वह था कठौता ताल. आज तक मुझे याद है 1991 में एकदम जनरल बोगी में 72 रुपये का ट्रेन का टिकट लिया. मनमाड़ से ट्रेन में बैठा. खंडवा, झांसी, उन्नाव और फिर लखनऊ आकर उतरा था. यहां मैंने जो सात माह लखनऊ की धरती पर बिताए, जो आनंद उठाया, बोलते हैं न बनारस की सुबह और लखनऊ की शाम, दोनों का मैंने अनुभव लिया.
यह कहानी ऐसी भी है कि जेब में पैसे नहीं होते थे, खाली जेब और भूखा पेट आपको कुछ भी काम करवा सकता है. हजरतगंज से चिनहट के लिए दो रुपये किराया लगता था. मेरे पास दो रुपये भी उसको देने के लिए नहीं थे. थोड़े थे भी, लेकिन मैं खर्च नहीं करना चाहता था. मैं उनके साथ जुड़ जाता था, एक हेल्पर की तरह और आवाज लगाता था कि चिनहट की सवारी दो रुपये. टेंपो वाला ये बोलता था कि अगर 8-10 सवारी लाकर टेंपो भर देगा तो फ्री में लटक जाना. ऐसे मैंने चार महीने बिताए.
मैं एक दिन पहले कठौता झील देखने गया था तो मुझे आनंद आ गया. मेरी भावनाएं वहां से जुड़ी हुई थीं. मेरी आंख से आंसू निकल गए कि इस जगह पर भी हम लोगों ने क्या मेहनत की. यहां पर पैदल चलकर जाते थे. एक खूबसूरत कठौता ताल है. वहां की मेरी एक पुरानी फोटो भी है. मैं ताल में खड़ा हूं. यह सब भगवान की कृपा है, आशीर्वाद है, मेहनत का उसने मुझे बहुत अच्छा फल दिया है.
सवाल: आप ब्राह्मण हैं और मछली का बिजनेस करते हैं, क्या कुछ कहेंगे?
जवाब: अपने देश में दो चीज हैं. वेज और नॉनवेज का जो विषय है या जाति धर्म का जो विषय है. बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं अरे आप शर्मा जी हैं तो मछली पालन क्यों करते हो? आप तो जनेऊधारी ब्राह्मण हो, वशिष्ठ गोत्र के हो, आप यह सब कलावा पहनते हो. मैंने कहा कि मैं ब्राह्मण का ही कर्तव्य कर रहा हूं. भगवान ने जो मुझे शक्ति दी है, जो बुद्धि दी है जिससे मैं मत्स्य उद्योग का एक्सपर्ट बना, किसान बना और मैं अपनी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर रहा हूं.
सवाल: यूपी की नदियों में पानी कम है. यहां पर मत्स्य उत्पादन में क्या संभावना देखते हैं?
जवाब: आज साइंस और टेक्नोलॉजी इतनी चरम सीमा पर है. एडवांस लेवल पर है. उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है. यहां पर किसान की जमीन खाली है, जो बोर करने के बाद समंदर जैसा खारा पानी निकलता है. जैसे हमने हरियाणा और पंजाब में 12000 से 15000 टन झींगा मछली पकड़ा है. समुद्र की तरह ही यहां पर बहुत सारी संभावना है. किसान के खेत में खारा पानी है, एक लीटर में तीन चार ग्राम नमक का लेवल होता है उसमें भरपूर मात्रा में समुद्र की तरह झींगा पाल सकते हैं.
हरियाणा और पंजाब में भी कहां समंदर है? उत्तर प्रदेश में छह लाख से ऊपर छोटे-छोटे तालाब हैं. आप इसमें जुड़ सकते हैं. मत्स्य से जुड़ने का मतलब ये नहीं कि सिर्फ मछली या झींगा है. वनस्पति है, माइक्रो लेवल है. आर्नामेंटल है, मोती उत्पादन से हर चीज में जुड़ सकते हैं. मत्स्य उद्योग का सिर्फ मछली झींगा से लेना देना नहीं है. उसमें तो कई सारी वनस्पतियां हैं, रंग-बिरंगी मछलियां हैं. तमाम चीजों से आप जुड़ सकते हैं.
सवाल: ट्रंप के टैरिफ का असर मत्स्य व्यवसाय पर कितना पड़ा?
जवाब: मोदी सरकार का मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने बखूबी इस स्थिति को संभाला और आज जो भी रिलेशन सरकार के थे उस वजह से टैरिफ वापस हो गया है. जो 58% था वह 26 परसेंट हो गया है. मैं ट्रंप सरकार को धन्यवाद इस बात का देना चाहता हूं कि उन्होंने हमपर यह मुसीबत लाई. मुसीबत लाने के बाद हमारे किसान जो बिजनेस एंटरप्रेन्योर हैं वह जाग गए कि यह धोखा कोई भी देश अपने साथ कभी भी कर सकता है. मैं इस माध्यम से यह कहना चाहता हूं कि हमारे देश में 150 करोड़ लोग हैं. 77 पर्सेंट लोग नॉनवेज खाने वाले हैं.
जैसे हमारे देश में संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे का नारा चल गया, वैसे ही तालाब से तुम्हारी थाली तक पौंड टू प्लेट की जो कल्पना मैं झींगालाला के थ्रू लाया जो मेरे रेस्टोरेंट के थ्रू लाया गया. सैटरडे संडे या कोई त्योहार में एक किलो मछली या आधा किलो भी झींगा हमारे अपने लोग खाना चालू कर दें तो हमारे देश में इंपोर्ट करना पड़ेगा अमेरिका से. अमेरिका को हमारी फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं. हमारे देश के घरेलू बाजार में इतनी ताकत है कि हमें तो दिन दोगुना रात चौगुना प्रोडक्शन करेंगे तो हमारा देश खा सकता है.
सवाल: क्या यूपी में फिशरीज डेवलपमेंट बोर्ड का एक रीजनल कार्यालय स्थापित होना चाहिए?
जवाब: मैं इससे सहमत हूं. हमारा बहुत बड़ा राज्य है. आज नेशनल फिश डेवलपमेंट बोर्ड का हेड क्वार्टर हैदराबाद में है. आज उनके पास स्टाफ कम है. नया-नया बोर्ड बना है. सब कुछ है, लेकिन अगर रीजनल लेवल पर बड़े-बड़े राज्यों में फिशरीज डिपार्टमेंट से जुड़े या एनिमल हसबेंडरी से जुड़कर एक सब सेंटर हो जाए या एक रीजनल कार्यालय हो जाए तो इससे किसानों को, इंडस्ट्री को बहुत सुविधा मिलेगी, सहूलियत मिलेगी.
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