14 या 15 जनवरी, जानिए किस दिन मकर संक्राति मनाना है शुभ, दान-पुण्य का है महत्व
शास्त्रों के अनुसार मकर संक्राति में किया गया दानपुण्य व पूजा की हुई कई गुणा फल प्रदान करती है.

Published : January 10, 2026 at 1:42 PM IST
कुचामनसिटी : हर वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है. इस बार मकर संक्रांति के पावन पर्व पर सूर्यदेव दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इसके साथ ही सूर्य के उत्तरायण होने का शुभ काल प्रारंभ होगा, जिसे सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. सूर्य का प्रवेश रात्रि से पूर्व में होने के कारण 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाना शास्त्र सम्मत रहेगा. ज्योतिषाचार्य डॉ. मन्नू शर्मा ने बताया कि पुण्यकाल 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 7 महापुण्यकल शुरू होगा. साथ ही सुबह 8 बजकर 43 मिनट से पूरे दिन रहेगा दानपुण्य कर सकते हैं.
ज्योतिषाचार्य के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. इस अवधि में दान-पुण्य, जप-तप, पवित्र नदियों में स्नान व तर्पण का विशेष महत्व है. मकर संक्रांति पर दिया गया दान निष्फल नहीं जाता. इसी कारण मकर संक्रांति के दिन स्नान, तर्पण, दान और जप-तप का विशेष महत्व होता है. इस अवसर पर शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा.
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ज्योतिषाचार्य डॉ. मन्नू शर्मा ने बताया कि मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है और वह समय होता है जब सूर्य के उत्तरायण होने पर सुख का आरंभ होता है. यह समय आत्म सुख और पुण्य के लिए महत्वपूर्ण होता है. मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा और इस दिन किया गया दान अत्यंत शुभ माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में किया गया दानपुण्य व पूजा की कई गुणा फल प्रदान करती है. माना जाता है कि इस शुभ काल में दान करने से अक्षय की प्राप्ति होती है.
शास्त्रों में उल्लेख है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा, जमुना, सरस्वती किसी भी पवित्र जल में स्नान करने से मनुष्य के सम्पूर्ण पापों का नाश होता है. मंदिर, तालाब, कुआं, बावड़ी में भी आप स्नान कर सकते हैं. साथ ही ब्राह्मण, साधु, दीन और दुखी लोगों को दान करना चाहिए, जिससे कि सूर्य की विशेष कृपा बनी रहती है. पुरानी कथाओं के अनुसार इसी दिन सूर्य अपने पुत्र शनि देव के मकर राशि में जाते हैं जो पिता पुत्र के संबंध में कड़वाहट खत्म करके मधुरता लाने का प्रतीक है.
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- सूर्य का उत्तरायण : मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है, जिसे देवताओं का दिन माना जाता है और आध्यात्मिक उन्नति का काल कहते हैं.
- पाप-पुण्य : इस दिन गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान, जप, तप और दान करने से सभी पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है.
- पितृ तर्पण : यह पितरों को याद करने और तर्पण करने का भी शुभ दिन है, जिससे पितृ दोष से मुक्ति मिलती है.
- दान-पुण्य : गरीबों, साधुओं और जरूरतमंदों को तिल, गुड़, अन्न, फल आदि दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है.
- सूर्य-शनि मिलन : सूर्य देव अपने पुत्र शनि देव से मिलने मकर राशि (शनि की राशि) में जाते हैं, जिससे पिता-पुत्र के रिश्ते में मधुरता आती है.
संक्रांति पर क्या करें, क्या नहीं : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संक्रांति पर नमक और लोहे का दान वर्जित माना गया है, जबकि तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र एवं गौदान करना शुभ फलदायी होता है. इस दिन से खरमास का समापन भी हो जाता है, जिसके बाद मांगलिक कार्यों की शुरुआत पुनः संभव होती है. मकर संक्रांति को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है. मंदिरों में पूजा-अर्चना, तीर्थ स्थलों पर स्नान तथा दान-पुण्य के लिए मंदिरों व गौशालाओं में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलेगी.
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मकर संक्रांति पर्व का है विशेष महत्व : मकर संक्राति का पर्व हिंदू उत्सवों में अत्यत लोकप्रिय है. सूर्य के उत्तरायण होने से मलमास समाप्त होगा और शुभ कार्यों की शुरुआत होगी. पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत काल में भीष्म पितामह ने इसी दिन देह त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया था.
यह रहेगा ज्योतिषीय प्रभाव : सूर्य के उत्तरायण होने से सर्दी का असर क्रमशः घटेगा, स्वास्थ्य में सुधार होगा और कृषि उपज बेहतर रहने की संभावना है. अनाज भंडारण बढ़ेगा, किसानों व आमजन में प्रसन्नता रहेगी. सूर्य के शनि के घर (मकर) में प्रवेश से लोगों में नई ऊर्जा आएगी और कार्यों में सफलता के योग बनेंगे.

