Bihar Ki Holi: परंपरा के डोली से विदा हो रही है होली, जानें कितनी बदल गई बिहार की होली?
बिहार में होली की खुमारी है. वो बात अलग है कि आधुनिकता के दौर में गांव से शहर की ओर परंपरागत होली पहुंच गई है.

Published : March 3, 2026 at 8:54 PM IST
पटना : बिहार के पारंपरिक होली की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है. बिहार के गांव में जो होली होती थी, उसकी कोई मिसाल नहीं है. एक सप्ताह पहले से ही लोग फगुआ गाना शुरू कर देते थे. धीरे-धीरे परंपराओं का प्रवाह शहर की ओर हो रहा है और अब शहरों में भी पारंपरिक होली की झलक देखने को मिल रही है. हालांकि आधुनिकता के दौर में होली का स्वरूप बहुत बदल गया है.
शहरों में भी परंपरा जीवित : रंगों का त्योहार होली बिहार की सांस्कृतिक विरासत की पहचान है. होली उत्सव कभी गांव की चौपाल, ढोल-मांदर और फगुआ गीतों से गूंजती थी तो आज उसकी जगह डीजे, ऑर्गेनिक कलर और सोशल मीडिया रील्स ने ले ली है. समय के साथ बिहार की होली का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी परंपरा से जुड़ी हुई है. परंपराओं का प्रवाह धीरे-धीरे गांव से शहर की ओर हो रहा है.

गांव में निकलती थीं टोलियां : पहले होली की शुरुआत फाल्गुन माह में फगुआ गीतों से होती थी. गांवों में टोलियां बनती थीं, लोग घर-घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते और पारंपरिक पकवान गुजिया, मालपुआ और ठंडई का आनंद उठाते थे. मिथिलांचल में 'फगुआ' और भोजपुर क्षेत्र में 'जोगीरा सारा रा रा' की गूंज खास पहचान थी. होलिका दहन के दिन पूरे गांव में सामूहिक आयोजन होता था और आयोजन सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता था.
सोशल मीडिया पर भी होली उत्सव का क्रेज : धीरे-धीरे अब बिहार में होली की तस्वीर बदल रही है. शहरी इलाकों में डीजे और रेन डांस का चलन बढ़ा है. युवा वर्ग फिल्मी गीतों और रंग-बिरंगे इवेंट्स के जरिए होली मना रहा है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम पर होली की तस्वीरें और वीडियो साझा करना नई परंपरा बन चुकी है. लोगों में अब केमिकल रंगों की जगह ऑर्गेनिक और हर्बल गुलाल का उपयोग बढ़ा है, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को दर्शाता है.
पटना में पारंपरिक आयोजन : राजधानी पटना समेत अन्य शहरों में होली मिलन समारोह, थीम पार्टी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन आम हो गया है. वहीं गांवों में अब भी परंपरागत गीत-संगीत और सामूहिक भोज की परंपरा कायम है, हालांकि वहां भी आधुनिकता की झलक दिखाई देने लगी है. परंपरा अब गांव से निकलकर शहर की ओर भी रुख कर रही है. शहरों में भी होली उत्सव और फगुआ का आयोजन हो रहा है. राजधानी पटना में भी इन दिनों ऐसे आयोजनों का क्रेज बढ़ा है.
नरेश जो कि गांव से शहर आए हैं. पटना में रोजी-रोटी चलते हैं. इनका कहना है कि होली की परंपरा को हम लोगों ने शहरों में भी जीवित रखा है. लोग गांव से ही शहर की ओर आए हैं. हम लोग पारंपरिक फगुआ का आयोजन राजधानी पटना में भी करते हैं.
''होली उत्सव का इंतजार हम लोग साल भर करते हैं. अब रोजी रोजगार की वजह से गांव में जाना आसान नहीं होता है. इस वजह से शहर में ही होली खेल लेते हैं और फगुआ का आयोजन भी करते हैं.''- गणेश, स्थानीय

वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी अपने निजी प्रयास से हर साल होली के पहले पारंपरिक फगुआ गीत का आयोजन करते रहे हैं. इनका मानना है कि गांव में लोग परंपरा से थोड़ा बहुत विमुख हो रहे हैं. पहले गांव में रात भर होली गाई जाती थी और जब चैत चढ़ जाता था तो चैता गीत के साथ होली का समापन होता था. युवाओं की टोली पूरे गांव में घर-घर घूमती थी. अब गांव में वह सब खत्म हो चुका है.
''कीचड़ से होली खेलने की परंपरा भी अब गुम होती जा रही है. गांव से जो लोग शहर में आए हैं, उन लोगों ने परंपरा को जीवित रखने में अपनी भूमिका निभाई है. हालांकि उस पर भी आधुनिकता का प्रभाव है.''- कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार
कीचड़ की होली का भी था क्रेज : बिहार में कभी कीचड़ वाली होली भी खेली जाती थी. होलिका दहन को लेकर भी तैयारी की जाती थी. युवा घर-घर जाकर होलिका दहन के लिए लकड़ी और पैसे वसूलते थे. युवाओं की टोली पारंपरिक गीत के साथ लोगों से लकड़ी और पैसे मांगने हर दरवाजे पर जाती थी. देर रात होलिका दहन होता था. होलिका दहन के ठीक दूसरे दिन कीचड़ की होली होती थी और गांव के साथ शहरों में भी लोग कीचड़ की होली खेलते थे.

लालू यादव की कुर्ता फाड़ होली : पटना में लालू प्रसाद यादव की कुर्ता फाड़ होली भी सुर्खियों में रहती थी. लालू प्रसाद यादव तो फिलहाल दिल्ली में है लेकिन उनकी होली आज भी लोगों के जहन में है. लालू प्रसाद यादव जब मुख्यमंत्री थे तब नेताओं के साथ कुर्ता फाड़ होली खेलते थे. जो कोई भी उनके आवास पर होली खेलने जाता था, वह पूरे कपड़ों के साथ बाहर नहीं निकलता था. उम्र के चलते लालू प्रसाद यादव अब उसे तरीके से होली सेलिब्रेट नहीं करते.
कई समाजसेवियों का मानना है कि बदलते दौर में पारंपरिक लोकगीतों और अबीर-गुलाल की जगह लाउड म्यूजिक, केमिकल रंगों और सोशल मीडिया के दिखावे ने ले ली है. हालांकि, जोगीरा फगुआ, भिरहा जैसी पारंपरिक होली और सामाजिक मेल जोल आज भी बरकरार है. जो लोग गांव से शहर में आए हैं, खासकर पटना का रुख जिस किसी ने किया है उनके द्वारा आज भी पटना में पारंपरिक गीत संगीत का आयोजन किया जाता है.
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