बच्चे को नहीं पच रहा गेहूं या ग्लूटेन, इस रोग के हो सकते हैं लक्षण, ऑर्गन डैमेज का रहता है खतरा
पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट लाइफस्टाइल मेडिसिन चिकित्सक डॉ. प्रियंका उदावत से जानिए सीलिएक रोग, इसके लक्षण और खतरों के बारे में...

Published : July 7, 2026 at 3:34 PM IST
जयपुर : राजस्थान में बच्चों के बीच सीलिएक रोग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. चिकित्सकों का कहना है कि यह बीमारी अब राज्य में एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है. प्रदेश में प्रत्येक 1000 बच्चों में करीब 30 बच्चे इस बीमारी से प्रभावित हैं. समय पर पहचान और उचित खान-पान नहीं मिलने पर यह रोग बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर गंभीर असर डाल सकता है.
पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट लाइफस्टाइल मेडिसिन चिकित्सक डॉ. प्रियंका उदावत का कहना है कि सीलिएक रोग गेहूं में पाए जाने वाले ग्लूटेन नामक प्रोटीन के प्रति होने वाली एक ऑटोइम्यून बीमारी है. इस बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी आंत (स्मॉल इंटेस्टाइन) को ही नुकसान पहुंचाने लगती है. इससे भोजन में मौजूद पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है और शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता.
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बच्चों पर असर : इस बीमारी का सबसे अधिक असर बच्चों की वृद्धि पर पड़ता है. प्रभावित बच्चों में बार-बार दस्त या कब्ज, पेट फूलना, वजन नहीं बढ़ना, लंबाई का सामान्य गति से नहीं बढ़ना, लगातार कमजोरी, एनीमिया, चिड़चिड़ापन और कुपोषण जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं. कई मामलों में लक्षण स्पष्ट नहीं होने के कारण बीमारी की पहचान देर से हो पाती है, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है.

ऑर्गन डैमेज का खतरा : डॉ. प्रियंका का कहना है कि बीते कुछ सालों में देश में वेस्टर्न कल्चर के कारण प्रोसेस और पैक्ड फूड का चलन बढ़ा है, जो काफी घातक है. यह फूड पेट को प्रभावित कर रही है. कुछ मामलों में तो ऑर्गन डैमेज का खतरा तक बढ़ जाता है. ऐसे में बच्चों को हेल्दी फूड देना काफी जरूरी है. प्रदेश में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं, जिनकी समय पर जांच नहीं हो पाती और बीमारी का पता वर्षों बाद चलता है.

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सीलिएक रोग का फिलहाल कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है. इसका सबसे प्रभावी उपचार जीवनभर पूरी तरह ग्लूटेन-फ्री डाइट अपनाना है. बच्चे का वजन और लंबाई सामान्य रूप से नहीं बढ़ रहे हों, बार-बार पेट संबंधी समस्याएं हो रही हों या लगातार एनीमिया और कमजोरी बनी रहती हो तो इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज न करें. समय पर जांच और सही निदान से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है. इससे बच्चे को सामान्य और स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिल सकती है.

