160 साल और 1.36 लाख से अधिक किताबों का संग्रह, राजस्थान के हर सफर का साक्षी है महाराजा लाइब्रेरी
राजधानी जयपुर के त्रिपोलिया गेट के पास 1866 में महाराजा राम सिंह ने दो मंजिला भव्य हवेली बनाकर यहां स्थापित की थी महाराजा लाइब्रेरी

Published : January 1, 2026 at 4:06 PM IST
जयपुर : गुलाबी शहर जयपुर की पहचान केवल इसकी चौड़ी सड़कें, ऊंचे महल और मजबूत किले ही नहीं बल्कि वो बौद्धिक विरासत भी हैं, जिसने इसे सदियों से विद्या और संस्कृति का केंद्र बनाए रखा है. त्रिपोलिया बाजार के पास स्थित महाराजा लाइब्रेरी इस विरासत का जीवंत प्रतीक है, जहां आज भी किताबों के पन्नों में इतिहास 'सांस' लेता है. करीब 160 वर्ष पुरानी यह ऐतिहासिक लाइब्रेरी न केवल पुस्तकों का संग्रह है बल्कि जयपुर रियासत के शैक्षिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टिकोण का प्रमाण भी है.
1866 में महाराजा राम सिंह ने की थी स्थापना : 1866 में महाराजा राम सिंह ने त्रिपोलिया गेट के पास दो मंजिला एक भव्य हवेली का निर्माण करवाया था और उसके बाद महाराजा लाइब्रेरी को यहां स्थापित किया था. 1886 में यह लाइब्रेरी आम जनता के लिए खोल दी गई थी. उस दौर में जब शिक्षा आम लोगों की पहुंच से दूर थी तब जयपुर के शासकों ने ज्ञान को सहेजने और फैलाने की अनोखी पहल शुरू की और इसे आम पब्लिक के लिए खोल दिया.
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आमेर से त्रिपोलिया का गौरवशाली इतिहास : महाराजा लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन पवन कुमार पारीक का कहना है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक महाराजा लाइब्रेरी की स्थापना पहले आमेर में महाराजा मानसिंह ने की थी. इसके बाद जब जयपुर की स्थापना हुई तब इसे जलेब चौक में स्थापित किया गया था. बाद में राजा राम सिंह ने 1866 में दो मंजिला भव्य ऐतिहासिक हवेली बनाकर उसमें इस लाइब्रेरी को शिफ्ट किया था. इसे 1886 में आम जनता के लिए खोल दिया गया था. उन्होंने कहा कि यह लाइब्रेरी राजपूताना काल से लेकर आधुनिक राजस्थान तक के बौद्धिक सफर की मूक साक्षी है.
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लाइब्रेरी में 1 लाख 36 हजार से ज्यादा किताबें : उन्होंने बताया कि कभी शाही परिवार की लाइब्रेरी रही महाराजा लाइब्रेरी आजादी के बाद सरकार के अधीन है. वर्तमान में इसमें 1 लाख 36 हजार 600 किताबें हैं, जिनमें इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान, दर्शन और राजनीति से जुड़े दुर्लभ साहित्य हैं. इस लाइब्रेरी में कई हजार साल पुरानी 336 हस्तलिखित पांडुलिपियां हैं. इसके अलावा 27 अत्यंत दुर्लभ ग्रंथ और उर्दू भाषा में लिखी हुई महाभारत भी मौजूद है. इसके अलावा 18वीं और 19वीं सदी के प्रसिद्ध समाचार पत्र भी मौजूद है. यहां से कई दुर्लभ पांडुलिपियों और कई दुर्लभ ग्रंथों को टोंक के अरबी फारसी शोध संस्थान में भेज दिया गया, जहां वे लोगों के दर्शनाथ रखी गई है.

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प्रतिदिन आते हैं 100 से ज्यादा विद्यार्थी : लाइब्रेरियन पवन कुमार पारीक का कहना है कि डिजिटल युग के बावजूद महाराजा लाइब्रेरी की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है. यहां प्रतिदिन 100 से सवा सौ विद्यार्थी अध्ययन करने आते हैं. कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए भी आते हैं. कई साहित्य और कला प्रेमी भी यहां पर घंटों किताबें पढ़ते हुए नजर आते हैं. बुजुर्ग पाठक भी यहां नियमित रूप से आते हैं और सदस्यता के माध्यम से पुस्तक घर ले जाकर पढ़ते हैं.

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ऐतिहासिक भवन में आधुनिक सुविधाएं : 150 साल पुरानी महाराजा लाइब्रेरी की हवेली आज भी अपनी स्थापत्य भव्यता बनाए हुए हैं. साथ ही समय के साथ इसमें आधुनिक सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं. यहां पर आने वाले विद्यार्थियों को निशुल्क वाई-फाई की सुविधा मिल रही है. साथ ही कंप्यूटर भी निशुल्क उपलब्ध करवाया जा जाता है, जिससे वो ऑनलाइन क्लास ले सकें. इसका कोई शुल्क नहीं देना होता है. लाइब्रेरियन पवन कुमार पारीक का कहना है कि कोई भी यहां आकर सदस्य बनकर किताबों का उपयोग कर सकता है. महाराजा लाइब्रेरी केवल किताबों का भंडार नहीं बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक आत्मा है. ये वे स्थान हैं, जहां इतिहास के पन्ने आज भी पलटे जाते हैं.


