खैरागढ़ में खनन परियोजना के खिलाफ किसानों का बड़ा आंदोलन, गांवों में कंपनी समर्थकों की एंट्री बैन
खैरागढ़ में हुई ऐतिहासिक किसान महापंचायत, 55 गांवों से किसान जुटे. कहा, किसी कीमत पर खनन परियोजना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : December 21, 2025 at 3:49 PM IST
खैरागढ़: संडी क्षेत्र में प्रस्तावित चूना पत्थर खनन और सीमेंट फैक्ट्री के खिलाफ किसानों का गुस्सा अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है. पंडरिया बिचारपुर भाठा में आयोजित ऐतिहासिक किसान महापंचायत ने साफ संदेश दे दिया है कि यह आंदोलन अब सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अधिकार अस्तित्व और जमीन बचाने की आर पार की जंग बन चुका है.
किसान, महिलाएं सभी मैदान में उतरे: इस विशाल महापंचायत में 55 गांवों से 5 से 6 हजार किसान और ग्रामीण उमड़े. खास बात यह रही कि करीब 2 हजार महिलाएं भी आंदोलन की अगुवाई करती नजर आईं. किसानों का यह जनसैलाब कह रहा है कि वे किसी भी कीमत पर खनन परियोजना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.
स्थायी नेतृत्व के लिए संघर्ष समिति का गठन: आंदोलन को मजबूत संगठित और दीर्घकालिक स्वरूप देने की भी तैयारी की गई है. इस उद्देश्य से महापंचायत में किसान अधिकार संघर्ष समिति का गठन किया गया. समिति ने स्पष्ट किया कि अब आंदोलन बिना किसी दबाव और समझौते के पूरी ताकत से आगे बढ़ेगा.

समिति में कौन-कौन
- संरक्षक गिरंवर जंघेल मोतीलाल जंघेल
- संयोजक सुधीर गोलछा
- अध्यक्ष लुकेश्वरी जंघेल
- सचिव प्रियंका जंघेल
- सह सचिव मुकेश पटेल
- उपाध्यक्ष कामदेव जंघेल प्रमोद सिंह राजकुमार जंघेल
गांवों में कंपनी समर्थक नेताओं और अधिकारियों की एंट्री बैन: महापंचायत का सबसे बड़ा और सख्त फैसला यह रहा कि खनन कंपनी के कर्मचारियों, परियोजना समर्थक अधिकारियों और नेताओं का गांवों में प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा. किसानों ने चेतावनी दी कि यदि कोई इस फैसले का उल्लंघन करता है तो उसका सामूहिक विरोध किया जाएगा.
पंडरिया भाठा बनेगा आंदोलन का स्थायी केंद्र: किसानों ने पंडरिया भाठा को आंदोलन का स्थायी केंद्र घोषित किया. वहीं दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर के निर्माण का निर्णय भी लिया गया ताकि आंदोलन को सामाजिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मजबूती मिल सके. यह भी तय किया गया कि परियोजना रद्द होने तक हर महीने किसान पंचायत आयोजित की जाएगी.
आंदोलन के साथ मानवीय सरोकार: महापंचायत के दौरान सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल पेश करते हुए रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया. इसमें 47 किसानों ने रक्तदान कर सिकलिन और थैलेसीमिया पीड़ित मरीजों के लिए सहयोग दिया.
यह आंदोलन केवल जमीन बचाने का नहीं बल्कि समाज और मानवता के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक है.- आंदोलनकारी
हर समाज का समर्थन: विभिन्न समाजों और संगठनों ने मंच से आंदोलन को समर्थन देते हुए किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने का ऐलान किया. किसानों ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह जमीन हमारी मां है और इसे बचाने की लड़ाई आखिरी सांस तक जारी रहेगी.

