मासूम ने जीती गुलियन बेरी सिंड्रोम से जंग, 80 दिनों पीआईसीयू में रही भर्ती, मुफ्त मिला 5.31 लाख का इलाज
गुलियन बेरी सिंड्रोम में आईवीआईजी की 5 डोज की कीमत लाखों रुपए है.

Published : June 2, 2026 at 8:07 PM IST
उदयपुर: रवीन्द्रनाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय के बाल चिकित्सालय ने गुलियन बेरी सिंड्रोम (GBS) से पीड़ित 5 साल की बच्ची का सफलतापूर्वक इलाज कर नया जीवन दिया है. बच्ची को करीब 80 दिनों तक पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) में रखा गया. उसे लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा. मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के तहत बच्ची को 5.31 लाख रुपए का इलाज मुफ्त दिया गया.
'दी मुफ्त दवाएं और पौष्टिक आहार': महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ आर एल सुमन ने बताया कि अस्पताल का मुख्य उद्देश्य हर क्रिटिकल मरीज को बिना किसी रुकावट के त्वरित और निर्बाध इलाज देना है. इस केस में 116 दिनों के लंबे ट्रीटमेंट कोर्स के दौरान वेंटिलेटर सपोर्ट, सर्जरी (ट्रेकियोस्टॉमी) से लेकर दवाओं और मुफ्त पौष्टिक आहार की व्यवस्था को हमारे स्टाफ ने पूरी मुस्तैदी से संभाला. राजसमंद जिले के निवासी ने बेहद गंभीर और दुर्लभ बीमारी गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) से करीब 90 दिनों के लंबे और कड़े संघर्ष के बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर नया जीवन प्राप्त किया. बालिका को दोनों पैरों में कमजोरी की शिकायत के साथ अस्पताल लाया गया था.
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पीआईसीयू में 80 दिनों सघन इलाज: बालिका की नाजुक हालत को देखते हुए उसे तत्काल बाल चिकित्सालय के पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) में भर्ती किया गया. बीमारी की गंभीरता के कारण मासूम को लंबे समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा. दीर्घकालीन श्वसन सहायता की आवश्यकता को देखते हुए ईएनटी विभाग द्वारा ट्रेकियोस्टॉमी (गले में श्वास नली बनाना) की गई. लगभग 80 दिनों तक पीआईसीयू में चले सघन इलाज और नियमित फिजियोथेरेपी के साथ-साथ मांसपेशियों की रिकवरी के लिए अंडा, दूध एवं अन्य प्रोटीन युक्त पौष्टिक आहार भी निशुल्क उपलब्ध कराया गया, जिसने इस रिकवरी में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
5.31 लाख रुपए का इलाज मुफ्त: उपचार के दौरान मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (एमएए) योजना के अंतर्गत लगभग 40 हजार रुपये प्रति वायल मूल्य की 5 डोज इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG) इंजेक्शन (कुल कीमत लगभग 2 लाख रुपए) मरीज को बिना किसी वित्तीय भार के पूरी तरह निशुल्क दी गई. इस प्रकार पूरे उपचार के दौरान कुल 5 लाख 31 हजार 900 रुपए का पूरा खर्च सरकार और चिकित्सालय प्रशासन द्वारा मां योजना के अंतर्गत वहन किया गया.
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'बच्ची का स्वस्थ होना सबसे बड़ा पुरस्कार': रवीन्द्रनाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य एवं नियंत्रक डॉ. राहुल जैन ने कहा कि गुलियन बेरी सिंड्रोम जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से एक 5 साल की बच्ची को पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकालना हमारी एडवांस क्रिटिकल केयर यूनिट की वैश्विक स्तर की क्षमताओं को दर्शाता है. बाल रोग विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ विवेक अरोड़ा ने कहा कि हमारे विभाग के पीआईसीयू में उपलब्ध अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और नर्सिंग केयर की बदौलत ही हम बच्ची को इतने लंबे समय तक सुरक्षित वेंटिलेटर पर रख पाए. पूरी तरह रिकवर होने के बाद उसे वार्ड में शिफ्ट किया. बच्ची का स्वस्थ होकर डिस्चार्ज होना हमारी पूरी पीडियाट्रिक्स टीम के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है.
'आईवीआईजी की 5 डोज': यूनिट हेड एवं प्रोफेसर डॉ मोहम्मद आसिफ ने तकनीकी जानकारी साझा करते हुए कहा कि जब बच्ची हमारे पास 4 फरवरी को आई थी, तो उसके दोनों पैरों की ताकत पूरी तरह खत्म हो चुकी थी. श्वसन तंत्र भी प्रभावित हो रहा था. हमारी टीम ने बिना समय गंवाए आईवीआईजी की 5 डोज शुरू की. ट्रेकियोस्टॉमी और लंबे वेंटिलेटर सपोर्ट के दौरान इन्फेक्शन से बचाना और साथ ही फिजियोथेरेपी व हाई-प्रोटीन न्यूट्रिशन के जरिए मांसपेशियों की रिकवरी को गति देना एक बड़ा टास्क था. चिकित्सकों के सतत प्रयास, नर्सिंग स्टाफ की चैबीसों घंटे की देखभाल तथा परिवार के दृढ़ सहयोग से पूरी तरह स्वस्थ होकर बच्ची अपने घर लौटी.

