भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला, आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति, यहां मिलेगा एक साथ
खजुराहो डांस फेस्टिवल में दिखा नृत्य, शिल्प, राधा की वेदना, श्रीकृष्ण की लीला और संस्कृति का समागम. मंदिर के अलौकिक परिसर में कलाकारों का जादू.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 23, 2026 at 11:01 AM IST
छतरपुर: खजुराहो डांस फेस्टिवल के तीसरे दिन मणिपुरी, ओडिसी एवं शास्त्रीय नृत्य की शानदार प्रस्तुति हुई. इस दौरान शिव, शक्ति की दिव्य छटा, भक्ति, सौंदर्य और अध्यात्म का संगम एक साथ दिखाई दिया. मंदिर के अलौकिक परिसर में कलाकार अपनी कला का जादू बिखेर रहे थे.
मंच पर पहली प्रस्तुति संगीत नाटक अकादमी अवॉर्डी मणिपुर की थोकचोम इबेमुबि देवी द्वारा मणिपुरी नृत्य से हुई. उनकी प्रस्तुति कवि जयदेव के अमर काव्य गीत गोविंद के अष्टम सर्ग पर आधारित थी, जिसमें राधा की वेदना और आहत मनोभावों का अत्यंत मार्मिक चित्रण दिखाई दिया. वह क्षण जब श्रीकृष्ण राधा से समय पर मिलने नहीं आते.
आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति
कथा के अनुसार श्रीकृष्ण पूरी रात्रि चंद्रावली के साथ रति-लीला में मगन रहते हैं, सुबह होते ही उन्हें राधा का ध्यान होता है और वे उनके कुंज में पहुंचते हैं, लेकिन उनके अंगों पर प्रेम-लीला के स्पष्ट चिह्न दिखाई देते हैं. इन्हें देखकर राधा का मन दुखी हो उठता है. प्रेम, पीड़ा, ईर्ष्या और आत्मसम्मान के भाव एक साथ जागृत हो उठते हैं. यहां प्रेम केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति बनकर मंच पर जीवंत हुआ और खजुराहो के मंच पर प्रस्तुति देने वाले कलाकरों को दर्शको की तालियां इतनी मिली कि वह खुशी के मारे भी झूम उठे.
खजुराहो के मंच पर दूसरी प्रस्तुति
वहीं, दूसरी प्रस्तुति पद्मश्री ओडिशा की दुर्गाचरण रनवीर द्वारा ओडिसी नृत्य की रही. आदित्य अर्चना ने ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति की जो प्रकाश, ऊर्जा और जीवन के स्रोत भगवान सूर्य को समर्पित थी. ओडिसी नृत्य-बैले के माध्यम से इस रचना ने सूर्य देव के प्रति श्रद्धा अर्पित की. इसके बाद शुद्ध नृत्य की प्रस्तुति पल्लवी ने दी. इसमें लय, राग और मूर्तिमय गतियां पूर्ण सामंजस्य में विकसित हुई.

त्रिभंगी की मोहक भंगिमाओं, जटिल पद संचालन और तरल गतियों के माध्यम से कलाकारों ने 'पल्लवी' अर्थात 'प्रस्फुटन' के अर्थ को साकार किया. प्रस्तुति के अंतिम क्रम में संत-कवि बिल्वमंगल ठाकुर की रचना पर आधारित प्रस्तुति ने बाल मुकुंद के दिव्य बाल्य रूप को चित्रित किया. कलाकारों ने अभिनय के माध्यम से कृष्ण की यशोदा माता के साथ बाल लीलाएं और वृंदावन के क्रीड़ा प्रसंग को जीवंत कर दिया.

इस प्रस्तुति में गुरु सुकांत कुमार कुंडू का गायन, गुरु सीताकांत जेना का मर्दल, गुरु अभिराम नंदा की बांसुरी, गुरु प्रदीप राय का वायलिन, गुरु प्रकाश चंद्र महापात्र सितार पर एवं मंजीरा पर गुरु दुर्गा चरण रणबीर थे. नृत्य कलाकारों में दीप्ति राउतरे, गायत्री रणबीर, शताब्दी मल्लिक, श्रद्धांजलि राउल, रोहिणी सामल, विदिशा बसुमल्लिक, मनोज प्रधान, शेखर सुमन माझी, गोकुलश्री दास एवं देबाशीष पटनायक थे.
अद्भुत दिखी भगवान श्रीकृष्ण की लीला
तीसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति शास्त्रीय नृत्य की रही. सत्रीया केन्द्र, असम द्वारा नृत्य की प्रस्तुति दी गई थी. इस रचना में देवकीनन्दन श्रीकृष्ण का आह्वान कर उनके दिव्य अनुग्रह की प्रार्थना की गई. इसके बाद राजघरिया चालि की प्रस्तुति दी गई. यह महापुरुष माधवदेव द्वारा एक स्वतंत्र एवं विशिष्ट नृत्य रचना है. नृत्य सत्रिया परम्परा की भक्ति भावना को बनाए रखते हुए नृत्य की सौंदर्यात्मकता को दर्शाता है.

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अगली प्रस्तुति भोजन बिहर, बहार नाच की थी. भोजन बिहर जिसे लोकप्रिय रूप से बहार नाच कहा जाता है, सत्रिया परम्परा की अत्यंत सुंदर रचना है. इसे महान वैष्णव संत, कवि एवं नाटककार माधवदेव ने रचा जो श्रीमंत शंकरदेव के प्रमुख शिष्य थे. यह प्रस्तुति ताल ठुकोनी एवं एकताल राग बसंत में निबद्ध थी. अंतिम प्रस्तुति ओजापाली शैली में भगवान के दशावतार की हुई, जो राग आह्नार पर आधारित थी. इसमें विभिन्न अवतारों के माध्यम से धर्म की पुनर्स्थापना का संदेश दिया गया. इसमें दस अवतारों, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, हलिराम/बलराम, बुद्ध और कल्कि को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया. प्रत्येक अवतार संरक्षण, संतुलन और धर्म की पुनः स्थापना का प्रतीक है.

क्या बोले कार्यक्रम प्रभारी
कार्यक्रम प्रभारी प्रकाश सिंह ठाकुर ने बताया कि "खजुराहो नृत्य समारोह में 23 फरवरी, 2026 को सायं 6:30 बजे से चेन्नई की नव्या नायर का भरतनाट्यम, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्डी काेटक्कल नंदकुमार नायर, केरल द्वारा कथकली एवं पद्मश्री पद्मजा रेड्डी, हैदराबाद द्वारा कुचिपुड़ी नृत्य की प्रस्तुति दी जाएगी."

