कटिहार का ICU खुद वेंटिलेटर पर! 4 साल से बंद यूनिट, मरीजों की सांसें रेफरल के भरोसे
कटिहार सदर अस्पताल का आईसीयू वर्षों से बंद है, मशीनें बेकार पड़ी हैं, जिससे गंभीर मरीजों का इलाज संभव नहीं है. मनीष ठाकुर की रिपोर्ट.

Published : June 26, 2026 at 10:55 AM IST
कटिहार : किसी भी विकसित देश और प्रगतिशील राज्य की रीढ़ उसकी स्वास्थ्य व्यवस्था होती है. सरकारें योजनाएं बनाती हैं, करोड़ों का बजट जारी होता है, चमचमाती इमारतें खड़ी की जाती हैं और फीते काटकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब इन दावों की हकीकत जमीन पर उतरती है, तो वे अक्सर प्रशासनिक उदासीनता और बदहाली का शिकार होकर दम तोड़ देती है.
कटिहार सदर अस्पताल का आईसीयू बीमार : बिहार के कटिहार सदर अस्पताल का आईसीयू आज इसी कड़वी हकीकत का सबसे जीता-जागता और दर्दनाक उदाहरण बन चुका है. साल 2011 में जब इस हाई-टेक यूनिट का उद्घाटन हुआ था, तब इसे सीमांचल और कटिहार के लाखों गरीब मरीजों के लिए एक 'संजीवनी' के रूप में देखा गया था. उम्मीद थी कि अब गंभीर मरीजों को इलाज के लिए सिलीगुड़ी, पूर्णिया या पटना की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी.
करोड़ों की मशीनों पर बदइंतजामी भारी : अफसोस! आज स्थिति इसके बिल्कुल उलट है. करोड़ों की लागत से बना यह आलीशान भवन और धूल फांकती महंगी मशीनें चीख-चीखकर गवाही दे रही हैं कि यहां इलाज की जरूरत मरीजों को नहीं, बल्कि खुद इस वेंटिलेटर पर पड़े बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को है. यह आईसीयू राजनीति, महामारी के अवसरवाद और प्रशासनिक फाइलों के बीच एक सफेद हाथी बनकर रह गया.
बदहाली का प्रतीक सदर अस्पताल का ICU : कटिहार सदर अस्पताल का आईसीयू अब स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली का ऐसा प्रतीक बन गया है, जिसे देखकर लगता है कि इलाज की जरूरत मरीजों से ज्यादा खुद आईसीयू को है. करोड़ों रुपये की लागत से बना भवन, महंगी मशीनें और बड़े बड़े दावे- सब कुछ मौजूद है, बस मरीजों के इलाज की सुविधा गायब है.
2011 में उद्घाटन के बाद से व्यवस्था हुई बीमार : साल 2011 में बिहार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कटिहार सदर अस्पताल के आईसीयू का उद्घाटन किया था. उस समय इसे जिले के गंभीर मरीजों के लिए बड़ी सुविधा बताया गया था. शुरुआती दिनों में यहां इलाज भी हुआ, लेकिन समय बीतने के साथ मशीनें खराब होती गईं और भवन की स्थिति भी जर्जर होती चली गई.

कोरोना में खुला और महामारी खत्म होते ही बंद : कोरोना महामारी के दौरान आईसीयू को दोबारा चालू किया गया था. उस समय गंभीर मरीजों के लिए यह यूनिट काफी उपयोगी साबित हुई, लेकिन कोरोना खत्म होते ही आईसीयू पर फिर ताला लटक गया. अब यह यूनिट मरीजों के इलाज से ज्यादा सरकारी फाइलों, पत्राचार और आश्वासनों में जीवित है.
लाखों की मशीनें धूल फांक रहीं : कटिहार सदर अस्पताल में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं. लेकिन जैसे ही कोई गंभीर मरीज आता है, इलाज शुरू होने से पहले रेफर की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. करोड़ों की मशीनें अस्पताल में पड़ी हैं, मगर मरीजों की सांसें पटना, पूर्णिया या सिलीगुड़ी पहुंचने तक रेफरल अस्पतालों के भरोसे अटकी रहती हैं.
गरीब मरीजों के सामने सबसे बड़ा संकट : जिन मरीजों के पास पैसे हैं, वे निजी अस्पतालों या दूसरे शहरों में इलाज करा लेते हैं. लेकिन गरीब परिवारों के लिए रेफरल का मतलब है एंबुलेंस का खर्च, बाहर इलाज का खर्च और समय पर उपचार नहीं मिलने का खतरा. कई बार दूसरे शहर तक पहुंचते-पहुंचते मरीज की हालत और गंभीर हो जाती है.

''यह अस्पताल विवादित हो चुका है. एक दुर्घटना के शिकार मरीज को लेकर यहां पहुंचे तो पता चला कि आईसीयू लंबे समय से बंद है. जिनके पास पैसा है वह लोग तो पटना और सिलीगुड़ी में इलाज करा लेंगे लेकिन गरीब कहां जाएंगे. हम सभी का यही कसूर है कि हम सभी ने कटिहार में जन्म ले लिया है.''- अमित पासवान, स्थानीय युवा
प्राणपुर से पहुंचे परिजनों ने उठाए सवाल : दुर्घटना में घायल एक मरीज को लेकर प्राणपुर से सदर अस्पताल पहुंचे मो. रफीक ने कहा कि गंभीर मरीज को इलाज के लिए अस्पताल लाया गया था, लेकिन उसे पटना या सिलीगुड़ी रेफर करने की बात कही जा रही है. उन्होंने कहा कि जब जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का आईसीयू बंद है तो गरीब मरीज आखिर कहां जाएं?
''एक गंभीर रूप से चोटिल मरीज को लेकर सदर अस्पताल आए थे, जिसे पटना या सिलीगुड़ी रेफर किया जा रहा है, जबकि सदर अस्पताल का आईसीयू लंबे समय से बंद है. यहां सांसद और सातों विधानसभा के विधायक सहित अन्य जनप्रतिनिधि मिलकर भी इस अस्पताल के आईसीयू को नहीं खुलवा पा रहे हैं ये शर्मनाक है.''- मो. रफीक, स्थानीय युवा

'गरीब मरीजों का क्या होगा' : दुर्घटना के शिकार मरीज को लेकर सदर अस्पताल पहुंचे अमित कुमार पासवान ने भी अस्पताल की व्यवस्था पर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि जिनके पास पैसा है, वे पटना या सिलीगुड़ी में इलाज करा सकते हैं, लेकिन गरीब परिवारों के लिए यह संभव नहीं है. उन्होंने जनप्रतिनिधियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव के समय सभी जनता के बीच रहते हैं, लेकिन स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर कोई दिखाई नहीं देता.
सरकार पर उठे सवाल : सांसद प्रतिनिधि सुनील कुमार यादव ने कहा कि कटिहार का आईसीयू खुद आईसीयू में भर्ती होने की स्थिति में पहुंच चुका है. उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को उठाया, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

सिविल सर्जन ने कैमरे पर जवाब देने से किया इनकार : लंबे समय से बंद पड़े आईसीयू को लेकर जब कटिहार के सिविल सर्जन डॉ. जितेंद्र नाथ सिंह से सवाल किया गया तो उन्होंने कैमरे पर कोई जवाब देने से इनकार कर दिया. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि- ''इस संबंध में विभाग को पत्र भेजा गया है.'' सवाल यह है कि पत्रों से मरीजों की जान बचेगी या आईसीयू कभी जमीन पर भी चालू होगा?
डीएम ने बताई ICU बंद की वजह : कटिहार के जिलाधिकारी आशुतोष द्विवेदी ने आईसीयू बंद रहने की वजह एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की कमी बताई है. उन्होंने कहा कि चिकित्सकों की नियुक्ति के लिए सरकार को पत्र भेजा गया है और विशेषज्ञों की तैनाती होते ही आईसीयू को दोबारा शुरू कर दिया जाएगा.
"एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की कमी की वजह से आईसीयू बंद है. जैसे ही विशेषज्ञों की तैनाती होगी इसे दोबारा चालू कर दिया जाएगा."- आशुतोष द्विवेदी, जिलाधिकारी, कटिहार
दावों और जमीनी हकीकत में अंतर : एक तरफ बिहार सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक अस्पतालों के दावे करती है, दूसरी तरफ कटिहार सदर अस्पताल का वर्षों से बंद पड़ा आईसीयू उन दावों की असली तस्वीर दिखा रहा है. करोड़ों का भवन, लाखों की मशीनें और मरीजों के लिए सिर्फ रेफरल-यही कटिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की कहानी बन गई है.

पहले मरीज बचेंगे या ICU? : कटिहार के लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आईसीयू कब शुरू होगा. मरीजों को समय पर इलाज मिलेगा या फिर वे रेफरल के भरोसे दूसरे शहरों की ओर भागते रहेंगे. स्वास्थ्य व्यवस्था की इस तस्वीर में अब इंतजार सिर्फ इस बात का है कि पहले मरीजों की सांसों को सहारा मिलेगा या खुद आईसीयू को नई जिंदगी?
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