सिक्के की उछाल पर टिकी काशी के कुलियों की जिंदगी; क्या कुछ बदला और क्या हैं इनकी मांगें
बनारस कुली संगठन के अध्यक्ष केदार यादव कहते हैं, कि हमारा जीवन पहले से और भी मुश्किल होता जा रहा है.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : January 2, 2026 at 1:13 PM IST
|Updated : January 2, 2026 at 8:10 PM IST
वाराणसी (प्रतिमा तिवारी) : कैंट रेलवे स्टेशन पर करीब 200 कुली काम करते हैं. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इनकी जिंदगी आज भी सिक्के की उछाल पर टिकी है. कई दशकों से यह परंपरा चली आ रही है. सिक्का उछलता है, तब जाकर कुली को ग्राहक का बोझ उठाने का मौका मिलता है.
यदि ग्राहक ने मना कर दिया तो, उसके हक में गिरा सिक्का खोटा साबित हो जाता है. उसे फिर से अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है. ETV भारत ने बनारस के कुलियों से बात की और जाना कि क्या हैं, उनकी मुश्किले, कैसी है जिंदगी? वह सरकार से क्या मांग करते हैं.
तकनीकी ने कम की कमाई: बनारस कुली संगठन के अध्यक्ष केदार यादव कहते हैं कि हमारा जीवन पहले से और भी मुश्किल होता जा रहा है. डिजिटल इंडिया और नई-नई टेक्नोलॉजी ने हमारा रोजगार छीन लिया है. अब तो पैसेंजर के पास बैट्री वाला रिक्शा पहुंच जाता है. पैसेंजर कुली नहीं करता है.
अब तो बैग में पहिए लग गए हैं. प्लेटफॉर्म पर लिफ्ट और एस्केलेटर लग गए हैं. इससे ग्राहक हमने बोझ उठवाने की जगह खुद ही सामान लेकर चले जाते हैं. पहले यह सब नहीं था, तब कुलियों को काम मिल जाता था. अब तो दिन भर में मुश्किल से एक-दो ग्राहक मिल पाते हैं.
क्यों है सिक्का उछालने की परंपरा: केदार यादव ने बताया कि हम काम से पहले सिक्का इसिलए उछालते हैं कि हमारे बीच कोई टकराव न हो. सिक्के से तय हो जाता है, कि अगला ग्राहक आया तो उसका बोझ कौन उठाएगा. जिसके हक में सिक्का गिरता है, वह मजदूरी का हकदार बन जाता है.
5 दशकों से चल रही परंपरा: उन्होंने बताया कि सिक्का उछालने की यह परंपरा लगभग 50 साल से चली आ रही है. हम सभी कुली एक ही स्थान पर बैठे रहते हैं और जब स्टेशन से कोई यात्री आता है तो सिक्का उछालकर तय करते हैं कि ये यात्री किस कुली का होगा.
केदार यादव बताते हैं कि, इसके लिए हम सिक्के के दो पहलू एक ओर बेगम और दूसरी ओर सन मानते हैं. इन दोनों में से कुली एक चुनता है, जो भी जीतता है वो यात्री का बोझ उठाता है. उनका ये भी कहना है कि ऐसा हम इसलिए करते हैं ताकि भविष्य में आपस में किसी भी तरह के विवाद की स्थिति न पैदा हो.
दिन भर में एक-दो बोझ मिल जाए तो 100-200 रुपए की कमाई होती है. इससे घर का खर्च नहीं चलता. किसी दिन तो एक रुपया भी नहीं मिलता. कुलियों ने बताया कि हम तो अब सिर्फ ट्रेन के आने-जाने के बारे में बताने के लिए बचे हैं.

लाइसेंसधारी कुली बनने की योग्ताएं
- भारतीय रेलवे की विज्ञप्ति से कुलियों (Licensed Porter) का आवेदन किया जाता है.
- उम्मीदवार को कम से कम 10वीं पास होना अनिवार्य है.
- शारीरिक दक्षता परीक्षा भी पास करनी पड़ती है.
- आवेदक को उसी रेलवे डिविजन का निवासी होना चाहिए, जहां से आवेदन कर रहा है.
- रेलवे भर्ती सेल के वाणिज्यिक विभाग द्वारा यह रिक्तियां निकाली जाती हैं.
- आवेदन के साथ 10वीं की मार्कशीट और पुलिस द्वारा जारी चरित्र प्रमाण पत्र आवश्यक है.
- आवेदन के बाद इंटरव्यू के आधार पर चयन होता है.
- इसके बाद लाइसेंस दिया जाता है. लाल वर्दी और बिल्ला पहनकर काम करना होता है.
क्या है कुलियों की मांग: कुली चंद्रशेखर यादव कहते हैं कि अपने बच्चों को इस काम में नहीं लाना चाहेंगे. हमारी जिंदगी किसी तरह कट जाए, यही बहुत है. कमाई कम हो चुकी है, सुविधाएं कुछ भी नहीं हैं. हम चाहते हैं कि हमें तो चतुर्थ श्रेणी का भी कर्मचारी मान लिया जाए तो हमारा भला हो जाएगा.
कुली संगठन के अध्यक्ष केदार यादव कहते हैं, कि जब से रेल चली है, तब से कुली हैं. जब तक रेल रहेगी, तब तक कुली भी रहेंगे. कम कुली काम करेंगे लेकिन करेंगे. हम लोगों ने कई बार सरकार से मांग की है.
हमें सरकार चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी मान ले. कम से कम हम लोग अपनी जिंदगी सही से बिता लेंगे. जो लोग ओवर एज हो गए हैं, उनके बच्चों को नौकरी मिल जाए. बनारस के करीब 200 कुलियों की यही व्यथा है, जिस पर कोई ध्यान देने वाला नहीं है.

लाइसेंसधारी कुलियों को भुगतान और सुविधाएं
- कुलियों को 40 किलो सामान उठाने के लिए 70 से 140 रुपए भुगतान का नियम है.
- यह रकम प्लेटफॉर्म से दूरी, प्रतीक्षा के समय के हिसाब से बढ़ सकती है.
- कुलियों को अब QR कोड वाले आईडी कार्ड जारी किए जाते हैं. काम के समय कार्ड जरूरी है.
- कुलियों को मुफ्त यात्रा पास मिलते हैं. बच्चों को रेलवे स्कूलों में मुफ्त शिक्षा की सुविधा.
- रेलवे अस्पताल में कुछ शर्तों के साथ खुद और परिवार के इलाज की सुविधा मिलती है.
- बड़े स्टेशनों पर आराम कक्ष की सुविधा रहती है. साल में एक वर्दी यानी शर्ट की आपूर्ति होती है.
ब्रिटिश शासन से कुली शब्द का प्रयोग: कुली शब्द का प्रयोग ब्रिटिश शासन में 18वीं से 19वीं सदी में शुरू हुआ था. अंग्रेजों को बंदरगाह, रेलवे, खदान और चाय बागानों के लिए श्रमिकों की जरूरत पड़ती थी. इसी दौर में रेलवे स्टेशनों पर सामान उठाने वाले श्रमिक कुली कहे जाने लगे.
वहीं, गिरिमिटिया प्रथा के अंदर भारत से हजारों मजदूरों को दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद, मॉरीशस जैसे देशों में भेजा गया. उन्हें एग्रीमेंट लेबर कहा जाते था. बाद में आम बोलचाल की भाषा में इन्हें भी कुली ही कहा जाने लगा.
भारत सरकार ने (1947 के बाद) श्रम कानून बनाए, जिसमें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम लागू किया गया. इसी दौरान रेलवे के कुलियों को संगठित भी किया गया.

वाराणसी कैंट स्टेशन की स्थापना: कैंट रेलवे स्टेशन की स्थापना 1862 में की गई थी. इसे ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बनाया गया था. तब ब्रिटिश शासन उत्तर भारत में रेल नेटवर्क विकसित करने पर काम कर रही थी.
अंग्रेजों ने वाराणसी में एक बड़ी सेना छावनी स्थापित की थी. वहीं, क्षेत्र आज वाराणसी रेलवे स्टेशन कैंट क्षेत्र है. धीरे-धीरे यह रेलवे स्टेशन पूर्वांचल का प्रमुख रेल जंक्शन बन गया.
आज यह कैंट स्टेशन सिर्फ यातायात का केंद्र ही नहीं, बल्कि भारत तीर्थाटन, व्यापार और सामाजिक परिवर्तन का आधार भी बन चुका है. वाराणसी न सिर्फ धार्मिक केंद्र है, बल्कि शिक्षा का प्रमुख स्थल है. गंगा के जल मार्ग से व्यापार का भी जरिया है.
काशी के विद्वान बताते हैं कि वाराणसी कैंट स्टेशन ने स्वतंत्रता के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी. क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी इस स्टेशन के माध्यम से गुप्त यात्राएं करते थे. छात्र आंदोलन से जुड़े लोग भी इसी रेल मार्ग का प्रयोग करते थे.
इस मार्ग का अधिक प्रयोग होने के कारण ब्रिटिश सरकार इस पर कड़ी निगरानी रखती थी. अब यहां पर प्लेटफॉर्म का विस्तार हो चुका है. आधुनिक तकनीक विकसित की गई है. लंबी दूरी की ट्रेनों का संचालन हो रहा है. दक्षिण भारत को काशी से जोड़ने वाली ट्रेनें भी यहां से संचालित होती हैं.
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