जनभावनाओं की जीत: कामा का नाम अब 'कामवन', बदला आबू का नाम, लोगों ने बताया ऐतिहासिक कदम
सीएम भजनलाल ने शुक्रवार को राज्य के तीन शहरों का नाम बदलने की घोषणा की.

Published : February 27, 2026 at 10:52 PM IST
भरतपुर/सिरोही/भीलवाड़ा: राजस्थान विधानसभा में शुक्रवार को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने एप्रोप्रिएशन बिल पर बहस का जवाब देते हुए डीग जिले के कामां का नाम बदलकर उसके पौराणिक स्वरूप 'कामवन' करने की घोषणा की. इसके साथ ही आबू का नाम 'आबू राज' किया गया. वहीं जहाजपुर का नाम बदलकर 'यज्ञपुर' रखा गया. इन नामों को लेकर स्थानीय लोगों में उत्साह देखने को मिला. उन्होंने इसे ऐतिहासिक कदम बताया.
भरतपुर के स्थानीय निवासी विजय मिश्रा ने बताया कि ब्रज में 'कामवन' का विशेष धार्मिक और पौराणिक महत्व रहा है. अपभ्रंश के चलते इसका नाम कामां प्रचलित हो गया था, जबकि मूल नाम कामवन ही था. ब्रजवासियों द्वारा लंबे समय से पौराणिक नाम बहाल करने की मांग की जा रही थी. मुख्यमंत्री द्वारा जनभावनाओं को सम्मान देते हुए नाम परिवर्तन की घोषणा करना ऐतिहासिक कदम है. एक अन्य स्थानीय निवासी संजय ने कहा कि कामां को उसकी पुरानी पहचान वापस मिली है. यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना है. उन्होंने इसे प्रदेश सरकार का मील का पत्थर निर्णय बताया.
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विधायक के प्रयासों की सराहना: क्षेत्र की विधायक नौक्षम चौधरी के प्रयासों को भी स्थानीय लोगों ने सराहा. नागरिकों का कहना है कि विधायक ने चुनाव के दौरान कामां का नाम पुनः कामवन करने का वादा किया था और उसे पूरा करके दिखाया. लोगों ने उनके अथक प्रयासों और प्रतिबद्धता के लिए आभार व्यक्त किया. इस अवसर पर कई स्थानीय निवासियों ने मुख्यमंत्री और विधायक के प्रति धन्यवाद जताया. इस अवसर पर कामवन जीव सेवा समिति के अध्यक्ष भागचंद, दुलीचंद तथा जॉयंट्स ग्रुप कामवन के सदस्य भी उपस्थित रहे.
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माउंट आबू अब 'आबू राज': राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू का नाम बदलकर 'आबू राज' किए जाने की घोषणा के बाद पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई. इस घोषणा के बाद स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इसे ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए स्वागत किया. आबू राज क्षेत्र में लोगों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर और बधाई देकर अपनी खुशी जाहिर की.

माउंट आबू का नाम बदलकर 'आबू राज' करने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही थी. इस मांग को लेकर क्षेत्रीय विधायक समाराम गरासिया, मंत्री ओटा राम देवासी सहित कई जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और संत-महात्माओं द्वारा लगातार आवाज उठाई जा रही थी. स्थानीय लोगों का कहना है कि 'आबू राज' नाम क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा. नागरिकों का मानना है कि इस निर्णय से क्षेत्र को नई पहचान मिलेगी और पर्यटन के क्षेत्र में भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा.
इधर भीलवाड़ा जिले के जहाजपुर कस्बे की बहु प्रतीक्षित नाम बदलने की शुक्रवार को विधानसभा में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ओर से घोषणा के बाद क्षेत्र के आमजन में खुशी की लहर है. भीलवाड़ा सांसद दामोदर अग्रवाल और जहाजपुर से भाजपा विधायक गोपीचंद मीणा ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का आभार जताया है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने शुक्रवार को राज्य सरकार के वित्तीय वर्ष 26-27 के बजट को अनुमोदन करते हुए जहाजपुर क्षेत्र के बाशिंदों को बड़ी सौगात दी है. सरकार ने क्षेत्र की सालों पुरानी जहाजपुर का नाम बदलने की मांग पूरी करते हुए नया नाम 'यज्ञपुर' कर दिया है.
भाजपा विधायक गोपीचंद मीणा ने कहा कि शुक्रवार का दिन जहाजपुर के लिए गौरव और खुशी का दिन था. जहाजपुर का नाम बदलने के लिए नगर पालिका के बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित करने के बाद राज्य सरकार को भेजा था. निरंतर प्रयास और सदन में उठाई गई मजबूत आवाज और जनभावनाओं के प्रति प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप शुक्रवार को कस्बे का नाम आधिकारिक रूप से 'यज्ञपुर' घोषित हो गया है. यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान है.
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जहाजपुर का इतिहास : पुराण के अनुसार राजा जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था. इससे नागों के देह से नागदी नदी और यज्ञपुर बसा. पुराणों (विशेषकर महाभारत) के अनुसार, राजा जनमेजय ने अपने पिता राजा परीक्षित की तक्षक नाग के काटने से हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए महाभारत युद्ध के बाद, द्वापर युग के अंत में नागों के विनाश के लिए 'सर्प सत्र यज्ञ' (नाग यज्ञ) किया था. यह यज्ञ वर्तमान भीलवाड़ा (राजस्थान) के जहाजपुर (जिसे अब 'यज्ञपुर' कहा जा रहा है) में हुआ था. यज्ञ का कारण: तक्षक नाग की ओर से राजा परीक्षित (अर्जुन के पौत्र) को डसना और ऋंगी ऋषि का शाप. जहाजपुर, भीलवाड़ा, राजस्थान (मान्यता के अनुसार यहां आज भी यज्ञकुंड के प्रमाण मिलते हैं). वहीं, पौराणिक कथाओं के अनुसार, यज्ञ की अग्नि से नागों के देह (शरीर) के भस्म होने से जो नदी बनी, उसे नागदी नदी कहा गया. यज्ञ के बाद जनमेजय ने इस स्थान को 'यज्ञपुर' या 'यज्ञनगर' के रूप में बसाया था. आस्तिक मुनि (जरत्कारू) के हस्तक्षेप के कारण यज्ञ रुक गया और तक्षक नाग की जान बच गई. राजा जनमेजय के नाम से आज भी सांप डरते हैं, ऐसी मान्यता है.

