जयपुर से तीज माता को 'लूट' लाए थे गोठड़ा के दरबार, तभी से है असली-नकली का दावा, जानिए क्या है मान्यता
बूंदी में आज भी दावा किया जाता है कि 'बूंदी में असली तीज निकलती है और जयपुर में नकली'. जानिए इसके पीछे की कहानी...

Published : August 31, 2026 at 2:47 PM IST
बूंदी : बूंदी की कजली तीज एक ऐसा पर्व है, जिसके साथ करीब 200 साल पुराना किस्सा जुड़ा है. बूंदी में आज भी दावा किया जाता है कि 'बूंदी में असली तीज निकलती है और जयपुर में नकली'. इस दावे के पीछे कहानी है बूंदी रियासत के गोठड़ा ठिकाने के दरबार बलवंत सिंह की बहादुरी की, जो कथित तौर पर जयपुर से तीज माता की प्रतिमा बूंदी ले आए थे.
इतिहास के जानकार पुरुषोत्तम पारीक बताते हैं कि बूंदी रियासत के गोठड़ा ठिकाने के दरबार बलवंत सिंह ने जयपुर में तीज माता की भव्य सवारी देखी थी. राजसी ठाठ-बाट, हाथी-घोड़े, बैंड-बाजे और श्रद्धालुओं की भीड़ देखकर उनके मन में विचार आया कि बूंदी में भी तीज माता की ऐसी ही भव्य सवारी निकलनी चाहिए. इसके बाद बलवंत सिंह तीज की सवारी वाले दिन जयपुर पहुंचे. इसी दौरान उन्होंने साहस दिखाते हुए जयपुर राजघराने की ओर से निकाली जा रही तीज माता की सवारी पर धावा बोला और तीज माता की प्रतिमा को अपने साथ बूंदी ले आए. बाद में प्रतिमा महाराजा रामसिंह को सौंप दी गई.
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बूंदी की तीज को लेकर 'असली-नकली' का दावा : यही वह घटना मानी जाती है, जिसने बूंदी की कजली तीज को एक अलग पहचान दी. इसके बाद बूंदी में तीज माता की सवारी राजसी वैभव के साथ निकाली जाने लगी. बूंदी रियासत से जुड़े कापरेन घराने के सदस्य बलभद्र सिंह के अनुसार उस दौर में जयपुर की तीज माता की प्रतिमा सोने की थी और लोकमान्यता है कि वही प्रतिमा आज भी बूंदी में विराजमान है. उनके मुताबिक जयपुर में वर्तमान में निकलने वाली तीज की प्रतिमा मूल प्रतिमा नहीं है, बल्कि परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए वहां सवारी निकाली जाती है. यही बात बूंदी की तीज को लेकर 'असली-नकली' का दावा पैदा करती है. हालांकि, यह इतिहास से अधिक बूंदी की लोकस्मृति और राज परंपरा में जीवित एक मान्यता है.
राजपरिवार की परंपरा में छिपा एक और अध्याय : पूर्व राजपरिवार की सदस्य रोहिणी कुमारी ने बताया कि बूंदी राजपरिवार की परंपराओं में तीज का स्थान अलग है. राजपरिवार में वर्षों से गणगौर का पर्व नहीं मनाया जाता. इसके पीछे उन्होंने जेतसागर से जुड़ा एक दुखद हादसा बताया. रोहिणी कुमारी की मानें तो गणगौर के अवसर पर जेतसागर में नौका विहार के दौरान हाथियों के कारण नाव पलट गई थी. हादसे में गणगौर की प्रतिमाओं के साथ कई लोग पानी में डूब गए थे. इस घटना के बाद राजपरिवार में गणगौर को लेकर 'आंठ' यानी शोक की परंपरा जुड़ गई.
शिव-पार्वती से जुड़ी आस्था का पर्व : उन्होंने बताया कि हादसे के बाद से बूंदी में गणगौर की परंपरा भले ही राजपरिवार में थम गई, लेकिन तीज माता की पूजा और उनकी शाही सवारी की परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ कायम है. तीज केवल राजसी किस्सों और शाही सवारी का पर्व नहीं है, यह भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी आस्था का पर्व है. महिलाओं के लिए इसका विशेष महत्व है. सुहाग, प्रेम, परिवार की खुशहाली और पति की दीर्घायु की कामना से जुड़ा यह पर्व लोकजीवन में सदियों से अपनी जगह बनाए हुए है.
1947 में राजपरिवार ने निकाली आखिरी शाही सवारी : समय बदला, राजशाही समाप्त हुई और प्रशासनिक व्यवस्थाएं बदल गईं, लेकिन बूंदी की तीज की परंपरा नहीं टूटी. राजघराने के सदस्य बलभद्र सिंह के अनुसार वर्ष 1947 में बूंदी के अंतिम शासक महाराव कर्नल बहादुर सिंह ने आखिरी बार राजपरिवार की ओर से तीज माता की शाही सवारी निकाली थी. इसके बाद तीज माता की सवारी निकालने की जिम्मेदारी सरकारी स्तर पर नगर परिषद के पास आ गई. राजपरिवार की प्रत्यक्ष भूमिका भले ही कम हुई, लेकिन तीज माता की सवारी का शाही अंदाज और लोक आस्था आज भी बरकरार है. अब नगर परिषद इस परंपरा को कजली तीज महोत्सव के रूप में आगे बढ़ा रही है. दो दिन तीज माता की सवारी निकलती है, जिसे देखने दूर दराज के लोग बूंदी पहुंचते हैं.

पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से स्थापित करने की जरूरत : इतिहास के जानकार पुरुषोत्तम पारीक का कहना है कि कजली तीज की इस ऐतिहासिक परंपरा को देश-दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से स्थापित करने की जरूरत है. इसके लिए कजली तीज महोत्सव को और अधिक ऐतिहासिक स्वरूप दिया जाना चाहिए. बूंदी में इसकी खासियत यह है कि यहां धार्मिक आस्था के साथ इतिहास भी कदमताल करता दिखाई देता है. एक ओर महिलाएं तीज माता की पूजा करती हैं, दूसरी ओर शहर की सड़कों पर निकलने वाली सवारी बूंदी के गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है.
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सजेगा कजली तीज का मेला : इस बार बूंदी का कजली तीज महोत्सव 31 अगस्त से 14 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है. नगर परिषद आयुक्त बृजेश रॉय के अनुसार इस बार मेले को भव्य, व्यवस्थित और ऐतिहासिक बनाने के लिए करीब दो महीने से तैयारियां चल रही हैं. मेले के मैदान को नए नक्शे के अनुसार विकसित किया गया है. सड़कों का निर्माण कर जीएसबी डालने के बाद रोलर से मैदान को समतल किया गया है. बारिश के दौरान पानी जमा नहीं हो, इसके लिए नालियों का निर्माण भी कराया गया है. झूले, चकरी, पार्किंग, तहबाजारी और अन्य व्यवस्थाओं के लिए निविदा प्रक्रिया अपनाई गई है.
इस तरह रहेगा कार्यक्रम : उन्होंने बताया कि 31 अगस्त को तीज माता की सवारी, 1 सितंबर को तीज माता की दूसरी सवारी और अलगोजा कार्यक्रम होगा. 2 सितंबर को स्कूली बच्चों का कार्यक्रम, 3 सितंबर को पर्यटन विभाग का सांस्कृतिक कार्यक्रम, 4 सितंबर को जन्माष्टमी झांकी, 5 सितंबर को राजस्थानी कवि सम्मेलन, 6 सितंबर को भजन संध्या, 8 सितंबर को रंगारंग कार्यक्रम, 9 सितंबर को राजस्थानी सांस्कृतिक कार्यक्रम, 10 सितंबर को देशभक्ति कार्यक्रम और 11 सितंबर को सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा. इसके अलावा 12 सितंबर को बॉलीवुड नाइट, 13 सितंबर को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और स्टार नाइट और 14 सितंबर को पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह आयोजित किया जाएगा.


