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Kajari Teej 2026: सुहागिन महिलाएं इस विधि से करें पूजा, चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद होगा व्रत का पारण

भाद्रपद कृष्ण तृतीया तिथि को यह व्रत रखा जाता है. इस दिन शिवजी और माता पार्वती की पूजा करने का विधान है.

भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना
भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना (फोटो ईटीवी भारत)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : August 28, 2026 at 10:23 AM IST

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बीकानेर : भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का पर्व मनाया जाता है. इसे बड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है. सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है. इस बार 31 अगस्त सोमवार को कजरी तीज है. महिलाएं पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना से इस दिन व्रत रखती हैं. धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से कजरी तीज का व्रत करने से महिलाओं को सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है और दांपत्य जीवन में प्रेम व शांति बनी रहती है.

दिनभर निराहार रहकर व्रत : कजरी तीज पर महिलाएं दिनभर निराहार रहकर भगवान शिव, माता पार्वती और तीज माता की पूजा करती हैं. कई महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं. रात में चंद्रमा के उदय होने के बाद उन्हें अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है. इस पर्व पर सोलह श्रृंगार, बायना देने और सत्तू का नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा भी है.

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सफेद तिल से स्नान कर शुरू करें पूजा : बीकानेर के पंचांगकर्ता पंडित राजेंद्र किराडू के अनुसार कजरी तीज के दिन प्रातःकाल स्नान करते समय जल में सफेद तिल डालकर स्नान करना शुभ माना गया है. स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को तैयार किया जाता है. इसके बाद वृहद् गौरी अर्थात माता पार्वती का पूजन किया जाता है.

पूजा के लिए मिट्टी की माता पार्वती की प्रतिमा बनाने की भी परंपरा है. इस प्रतिमा का षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है. माता पार्वती की मूर्ति को सोलह श्रृंगार की सामग्री से सजाया जाता है. सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी और अन्य सुहाग सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है.

शिव-पार्वती की आराधना का विशेष महत्व : कजरी तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित कर अपने पति की दीर्घायु और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं. पूजा के दौरान धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, कुमकुम और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं. इस दिन महिलाएं कजरी तीज की कथा का श्रवण करती हैं. कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्र होकर तीज के लोकगीत गाती हैं और पर्व की खुशियां मनाती हैं.

बेर के पेड़ के नीचे रात में पूजा : कजरी तीज की पूजा में रात्रि में चंद्रमा अर्ध्य से पूर्व पूजा होती है. रात में बेर के वृक्ष के नीचे पाल बनाकर गंध, कुमकुम और अक्षत से पूजन करने की परंपरा है. महिलाएं श्रद्धा के साथ माता पार्वती का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना करती हैं. काले मेघों की घटाओं के बीच कजरी के लोकगीत गाने की परंपरा भी इस पर्व से जुड़ी हुई है. महिलाओं के सामूहिक गीतों में दांपत्य प्रेम, विरह, प्रकृति और पारिवारिक भावनाओं की झलक देखने को मिलती है.

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चंद्रमा के उदय तक निराहार रहने की परंपरा : कजरी तीज का व्रत रखने वाली महिलाएं चंद्रमा के उदय होने तक निराहार रहती हैं. रात्रि में चंद्रमा के दर्शन होने के बाद विधि-विधान से उनका पूजन किया जाता है. चंद्रमा को जल और अन्य पूजन सामग्री के साथ अर्घ्य देकर पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है. चंद्र पूजन के बाद सत्तू का नैवेद्य समर्पित करने की परंपरा है. इसके बाद आक के पत्ते पर सत्तू का प्राशन किया जाता है. सत्तू में गेहूं, जौ, चना और चावल का उपयोग किया जाता है. इसके बाद महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करती हैं.

सास को बायना देने की परंपरा : कजरी तीज को सोलह श्रृंगार और सुहाग का पर्व भी माना जाता है. इस दिन विवाहित महिलाएं विशेष रूप से श्रृंगार करती हैं. पूजा के बाद अपनी सास को बायना देने और उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा है. बायने में पकवान, मिठाई, फल और श्रृंगार की सामग्री दी जाती है. यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि परिवार में प्रेम, सम्मान और रिश्तों की मजबूती का प्रतीक भी मानी जाती है.

पति की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली की कामना : पंडित राजेंद्र किराडू के अनुसार कजरी तीज सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व वाला पर्व है. इस दिन महिलाएं व्रत रखकर माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं. सोलह श्रृंगार कर माता को सुहाग सामग्री अर्पित करने और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा के पीछे पति की दीर्घायु तथा अखंड सौभाग्य की कामना जुड़ी है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधि-विधान से कजरी तीज का व्रत करने से स्त्री को सुख, सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि की प्राप्ति होती है. वहीं, यह पर्व राजस्थान की लोक परंपराओं, महिलाओं के सामूहिक उत्सव और पारिवारिक संस्कारों को भी जीवंत बनाए रखने का माध्यम है.

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