अलवर की 'जांबाज' बेटी: 800 सांपों और 400 डॉग्स की जान बचाई, बेजुबानों का बनी सहारा
ज्योति सैनी ने 400 से ज्यादा डॉग्स और करीब 800 सांपों समेत हजारों जीवों की जान बचाई है. पढ़िए पीयूष पाठक की स्पेशल रिपोर्ट.

Published : May 3, 2026 at 2:28 PM IST
अलवर: जब रात के सन्नाटे में लोग अपने घरों में सो रहे होते हैं, तब राजस्थान के अलवर की गलियों में एक युवती वन्यजीवों और घायल पक्षियों की जान बचाने निकलती है. ये कहानी है ज्योति सैनी की, जिन्होंने अब तक 800 से ज्यादा खतरनाक सांपों और 500 से अधिक डॉग्स का रेस्क्यू कर मानवता की एक नई मिसाल पेश की है. ज्योति सैनी आज उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं जो समाज में बदलाव लाना चाहते हैं. अपनी निजी नौकरी के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण के जुनून को पालने वाली ज्योति ने न केवल एक मजबूत टीम खड़ी की है, बल्कि वे अपने खर्च पर शहर के सैकड़ों बेजुबानों का इलाज और पेट भरने का जिम्मा भी बखूबी उठा रही हैं.
अक्सर जीवन में कुछ घटनाएं इतनी गहरी चोट पहुंचाती हैं कि वे व्यक्ति की पूरी दिशा बदल देती हैं. ज्योति सैनी के साथ भी यही हुआ. छोटी उम्र से डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करने का सपना देखने वाली ज्योति आज बेजुबान जानवरों और वन्यजीवों की रक्षक बनकर उभरी हैं. अब तक उनकी टीम 400 से अधिक डॉग्स और 800 से ज्यादा सांपों समेत हजारों Reptiles, Monitor Lizard, बंदर, बिल्ली आदि जीवों का सफल रेस्क्यू कर चुकी हैं.
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बचपन का पहला रेस्क्यू और स्वान वाली घटना: ईटीवी भारत से खास बातचीतस में ज्योति ने बताया कि उनकी यह यात्रा पांचवीं कक्षा से शुरू हुई जब उन्होंने पड़ोस के पेड़ पर घोंसले से गिरे गौरैया के बच्चे को बचाया. उस समय उन्हें रेस्क्यू का कोई खास ज्ञान नहीं था, लेकिन सहानुभूति और मदद करने की भावना जरूर थी. उन्होंने बताया कि वास्तविक मोड़ तब आया जब कुछ वर्ष पहले उनके ही पड़ोस में एक डॉग के साथ क्रूर घटना घटी.
किसी व्यक्ति ने स्वान के सिर पर इतना जोरदार वार किया कि उसकी आंखें बाहर निकल आईं और वह बहुत बुरी तरह घायल हो गया. इस निर्दयी और क्रूर दृश्य ने ज्योति को अंदर तक झकझोर दिया. उन्होंने सोचा कि बेजुबान जीवों पर हो रहे अत्याचार को कैसे रोका जाए. इसी घटना के बाद ज्योति ने सक्रिय रूप से रेस्क्यू कार्य शुरू किया और लोगों को जागरूक करना भी अपनी जिम्मेदारी समझा.

मदद न मिलने पर बना लिया एनजीओ: शुरुआती दिनों में जब ज्योति किसी घायल डॉग को बचातीं तो आसपास के लोग न सिर्फ मदद करने की बजाय उन्हें रोकने लगते थे, बल्कि कई बार ताने भी सुनाने थे. इस अनुभव के बाद ज्योति ने फैसला किया कि बिना किसी झिझक के काम करने के लिए उन्हें एक औपचारिक मंच चाहिए. इसके बाद उन्होंने अपना एक एनजीओ बनाने की ठानी, जिसके तहत अब वे पूरी कानूनी और सामाजिक मजबूती के साथ वन्यजीवों की रक्षा कर रही हैं.
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7 साल का संघर्ष, 17 सदस्यों की मजबूत टीम: पिछले 6-7 वर्षों से ज्योति पूरी तरह रेस्क्यू फील्ड में सक्रिय हैं। आज उनकी टीम में 17 समर्पित सदस्य हैं जो हर समय तैयार रहते हैं। टीम ने न सिर्फ सड़क पर घायल कुत्तों बल्कि वाइल्डलाइफ रेस्क्यू भी किए हैं, सांप, मॉनिटर लिजर्ड, बंदर आदि शामिल हैं. ज्योति सैनी बताती हैं 'लोग आमतौर पर रेस्क्यू का काम लड़कों से करवाना चाहते हैं, लेकिन मैंने साबित कर दिया कि लड़कियां भी इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में बराबरी से काम कर सकती हैं.'

लड़की होना सबसे बड़ा चैलेंज: रेस्क्यू कार्य में ज्योति को सबसे ज्यादा चुनौती अपनी महिला होने के कारण मिली. लोग उन्हें मैदान में उतरने से रोकते, ताने मारते. खासकर रात के समय रेस्क्यू करना और भी कठिन था, लेकिन ज्योति ने हार नहीं मानी. उनके बड़े भाई रात के रेस्क्यू में हमेशा उनके साथ जाते हैं. परिवार का पूरा सहयोग उन्हें मिलता रहा, मां भी अक्सर डॉग्स को बिस्किट खिलाने जाती हैं.
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आर्थिक व्यवस्था और स्वयं का योगदान: रेस्क्यू के बाद घायल जीवों का इलाज, खाना और दवाइयां महंगी पड़ती हैं. ज्योति निजी क्षेत्र में नौकरी करती हैं और अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा इस काम में लगाती हैं. टीम के सदस्य भी आपस में सहयोग करते हैं. कुछ महीने पहले टीम ने एंटी रेबीज वैक्सीनेशन (ARV) अभियान चलाया, जिसमें महंगी वैक्सीन का खर्च सदस्यों और स्थानीय लोगों के सहयोग से वहन किया गया.

रात में डॉग्स को खाना खिलाना: दिन में नौकरी और रेस्क्यू मैनेज करने के बाद ज्योति रात को सड़कों पर निकलती हैं. अपने आस-पास के क्षेत्र में जहां तक पहुंच सकती हैं, भूखे डॉग्स को खाना खिलाती हैं. उनका कहना है कि इससे डॉग भूखे नहीं रहेंगे और सड़क दुर्घटनाएं भी कम होंगी. डॉक्टर बनने की चाह अब जीवों की सेवा में ज्योति बचपन से डॉक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया. आज वे कहती हैं, “डॉक्टर बनकर मैं लोगों की सेवा करती, लेकिन अब जीवों की जान बचाकर भी वही सेवा कर रही हूं.”
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रेस्क्यू के अलावा सामाजिक पहल: ज्योति और उनकी टीम केवल रेस्क्यू तक सीमित नहीं हैं. वे अलवर में टूरिज्म बढ़ाने, स्वच्छता जागरूकता, पुरानी बावड़ियों और कुओं के संरक्षण, तथा बड़े पैमाने पर पौधारोपण का काम भी कर रही हैं. शहर की कॉलोनियों में पौधे लगाकर उनकी देखभाल की जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को सौंपी जा रही है.

ज्योति सैनी की यह कहानी प्रेरणा का अनुपम उदाहरण है. एक साधारण युवती से शुरू होकर आज वे पूरी टीम के साथ सैकड़ों जीवों की जिंदगी बदल रही हैं. उनकी मेहनत साबित करती है कि सच्ची लगन और मेहनत के साथ कोई भी चुनौती पार की जा सकती है. अलवर जैसे छोटे शहर से निकली यह मिसाल पूरे देश के युवाओं खासकर युवतियों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है.

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