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हरिद्वार में नागा साधुओं ने होली को बनाया खास, सेलिब्रेशन में आस्था और परंपरा की गूंज, दिया ये संदेश

हरिद्वार में जूना अखाड़े में होली पर्व की धूम मची हुई है. सभी साधु संत गाय के पंचगव्य से होली मना रहे हैं.

Haridwar Juna Akhara
जूना अखाड़े में साधु संतों ने गाय के पंचगव्य से खेली होली (Photo-ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : February 28, 2026 at 9:53 AM IST

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हरिद्वार: फाल्गुन मास में रंगों और उल्लास के बीच धर्मनगरी हरिद्वार में संत समाज ने अनोखे अंदाज में होली मनाई. साधु संतों ने गाय के पंचगव्य से होली खेलकर सनातन परंपरा के निर्वहन के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया. साधु संतों ने माया देवी मंदिर प्रांगण में पहले गाय के दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र से पंचगव्य बनाया और फिर उसी से होली खेली. इस दौरान साधु संतों ने एक दूसरे को रंग लगाकर भी शुभकामनाएं दी. भजन कीर्तन और पारंपरिक जयघोष के बीच संत समाज ने उल्लासपूर्वक होली का उत्सव मनाया. साधु संत पारंपरिक ढोल नगाड़ों की धुन पर झूमते नजर आए. संत समाज की ओर से संदेश दिया गया कि त्यौहार केवल उत्सव का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पर्यावरण चेतना का भी प्रतीक हैं.

जगद्गुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्राकृतिक संसाधनों के प्रति आदर की भावना सदैव रही है. पंचगव्य की होली उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है. इस होली के माध्यम से समाज को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने का संदेश दिया गया है.

हरिद्वार में जूना अखाड़ा में होली आयोजन (Video-ETV Bharat)

जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरिगिरि महाराज ने कहा कि होली का पर्व संत समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है. फागुन मास में पड़ने वाली रंग भरी एकादशी भगवान शिव और माता पार्वती को अर्पित होती है. उन्हें प्रसन्न करने के लिए पंचगव्य और रंगों से होली खेली जाती है. प्राचीन काल से साधु संतों के द्वारा गाय माता के पंचगव्य से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है. बताया कि गाय के गोबर में भगवान गणेश का आह्वान हुआ था. इसका वैज्ञानिक महत्व भी है कि गोबर से कीटाणुओं का नाश होता है. इसलिए अखाड़ों ने होली खेलकर भगवान काशी विश्वनाथ की परम्परा का निर्वहन किया है.

Haridwar Juna Akhara
जूना अखाड़ा ने सेलिब्रेशन बनाया खास (Photo-ETV Bharat)

इस अवसर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि पंचकव्य गोबर की होली हमारी सनातन संस्कृति का प्रतीक है. गाय को हिंदू धर्म में माता का दर्जा प्राप्त है और उसका गोबर भी पवित्र माना जाता है. उन्होंने कहा कि यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है. निश्चित रूप से इन परम्पराओं के निर्वहन से गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा भी मिलना चाहिए.

Haridwar Juna Akhara
साधुओं ने परंपरा और प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश (Photo-ETV Bharat)

जूना अखाड़े और निरंजनी में नागा संन्यासी रहते हैं, जिन्हें सनातन धर्म और संस्कृति का वाहक माना गया है. जहां एक ओर बरसाना की लठमार होली और मथुरा की फूलों की होली देशभर में प्रसिद्ध है, वहीं इन साधुओं की होली में अलग ही उल्लास है. गाय से उत्सर्जन से बनी वस्तुओं और रंगों से पंचगव्य तैयार किया जाता है. जिसमें गंगाजल और रंग भी मिलाए जाते हैं. उसके बाद साधु संत पहले अबीर गुलाल लगाकर एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और फिर पंचगव्य से होली खेलते हैं.

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