राजस्व घटने का ठीकरा केंद्र पर क्यों? बाबूलाल मरांडी ने वित्त मंत्री को आंकड़ों के साथ घेरा, झामुमो और कांग्रेस ने किया पलटवार
आर्थिक हितों को लेकर बाबूलाल मरांडी द्वारा वित्त मंत्री को पत्र लिखने के बाद झामुमो और कांग्रेस ने पलटवार किया. राजेश कुमार सिंह की रिपोर्ट.

Published : August 28, 2026 at 9:12 PM IST
रांची: झारखंड में खनिज संपदा और राज्य के आर्थिक हितों को लेकर सियासत गरमा गई है. MMDR एक्ट में केंद्र सरकार के संशोधन को लेकर वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की ओर से उठाए गए सवालों पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने आंकड़ों के साथ पलटवार किया है.
वित्त मंत्री को लिखे पत्र में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि केंद्र से झारखंड का जायज हक मांगने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन राज्य के राजस्व में कमी के लिए हर बात का दोष केंद्र सरकार पर डालना सही नहीं है. उन्होंने खनिजों पर लगाए गए उपकर, खदानों की नीलामी, रॉयल्टी, अवैध खनन और राज्य के वित्तीय प्रबंधन को लेकर सरकार से कई सवाल पूछे हैं.
संशोधन पूरे देश में लागू, फिर यहां सवाल क्यों?
बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि एमएमडीआर संशोधन किसी एक राज्य के लिए नहीं बल्कि पूरे देश में समान रूप से लागू हुआ है. ऐसे में सिर्फ झारखंड सरकार को इससे परेशानी क्यों हो रही है, यह सवाल सरकार की मंशा पर भी खड़ा होता है. उन्होंने वित्त मंत्री से कहा कि वे वित्त विभाग संभालते हैं, इसलिए आंकड़ों और तर्क के आधार पर यह बताना जरूरी है कि राज्य को वास्तविक नुकसान कहां हुआ है और उसकी जिम्मेदारी किसकी है.

रॉयल्टी के हजारों करोड़ गंवाने का जिम्मेदार कौन ?
बाबूलाल मरांडी ने पत्र में राज्य सरकार की ओर से खनिजों पर लगाए गए उपकर का हिसाब भी सामने रखा है. उनका दावा है कि पिछले साल सेस के जरिए करीब 7,500 करोड़ रुपये की आमदनी हुई, लेकिन इसी दौरान बजट में अनुमानित करीब 22 हजार करोड़ रुपये की खनन रॉयल्टी घटकर लगभग 16 हजार करोड़ रुपये रह गई, यानी करीब 6 हजार करोड़ रुपये की कमी हुई.
बीजेपी नेता का तर्क है कि सरकार ने एक तरफ से सेस के जरिए राजस्व बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन दूसरी तरफ खनन गतिविधियों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने से रॉयल्टी से होने वाली आय में कमी आई.
अप्रत्याशित सेस से कई खदान बंद: बाबूलाल मरांडी
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि कोयले पर 450 रुपये और लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन का सेस लगाने से झारखंड के वैध खनिज बाजार में प्रतिस्पर्धा से बाहर हो रहे हैं. उनके मुताबिक, 30 टन कोयला ले जाने वाले ट्रक पर करीब 13,500 रुपये और लौह अयस्क पर करीब 18 हजार रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ता है.
बाबूलाल मरांडी ने दावा किया कि इसका असर खनन और उससे जुड़े कारोबार पर पड़ रहा है. सिंहभूम क्षेत्र में खदानों और आयरन क्रशर के बंद होने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इससे स्थानीय मजदूरों और खासकर आदिवासी श्रमिकों के सामने रोजगार का संकट पैदा हुआ है.
ओडिशा ने कमाए हजारों करोड़ फिर झारखंड पीछे क्यों?
बाबूलाल मरांडी ने खनिज क्षेत्र में झारखंड की तुलना पड़ोसी राज्य ओडिशा से की है. उन्होंने कहा कि ओडिशा ने अपने प्रमुख खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर खनन गतिविधियों को बढ़ावा दिया और बड़ी संख्या में खदानों को चालू कराया. उनके मुताबिक, पिछले कुछ सालों में ओडिशा को इससे करीब 87 हजार करोड़ रुपये की आय हुई है जबकि इसके उलट मरांडी ने झारखंड में लौह अयस्क की बंद खदानों और केंद्र से मिले कोल ब्लॉक के चालू नहीं होने पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि अगर खनिज ब्लॉकों की नीलामी और उत्पादन बढ़ाने पर गंभीरता से काम किया जाता तो झारखंड हर साल करीब 20 से 25 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त कमा सकता था.
वैध खनिज महंगा, अवैध खनन सस्ता: मरांडी
मरांडी ने सरकार की खनिज नीति पर सबसे गंभीर सवाल अवैध खनन को लेकर उठाया है. उनका कहना है कि वैध खनिजों पर भारी अतिरिक्त बोझ डालने से वैध खनन महंगा हो रहा है, जबकि अवैध खनन करने वालों के लिए बाजार में जगह बन रही है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन से सरकार के खजाने को राजस्व नहीं मिलता और न ही खनन प्रभावित लोगों को उसका लाभ पहुंचता है. मरांडी ने सवाल किया कि अगर वैध खनन घट रहा है और अवैध खनन बढ़ रहा है तो इसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है.
'ओडिशा में सेस शून्य, झारखंड में इतना ज्यादा क्यों?’
मरांडी ने पड़ोसी राज्यों की खनिज नीति का उदाहरण देते हुए सरकार से तुलनात्मक अध्ययन का सवाल पूछा है. उन्होंने कहा कि ओडिशा में अतिरिक्त उपकर नहीं है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह करीब 22.50 रुपये प्रति टन बताया जाता है. ऐसे में झारखंड में 600 रुपये प्रति टन तक का सेस लगाने से पहले क्या सरकार ने पड़ोसी राज्यों की व्यवस्था और उसके असर का अध्ययन किया था? उन्होंने सरकार से यह भी पूछा कि इतना भारी सेस लगाने का फैसला किस आर्थिक आकलन के आधार पर लिया गया.

बालू-पत्थर की नीलामी क्यों नहीं हो रही: मरांडी
बाबूलाल मरांडी ने एमएमडीआर संशोधन को लेकर एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि संशोधन का असर प्रमुख यानी मेजर मिनरल पर है, जबकि लघु खनिजों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. ऐसे में उन्होंने वित्त मंत्री से पूछा कि पिछले कुछ वर्षों में बालू घाटों और पत्थर खदानों की नीलामी क्यों नहीं हुई. जहां नीलामी हुई भी, वहां खनन शुरू क्यों नहीं हो सका। मरांडी ने पूछा कि इसके कारण राज्य को होने वाले राजस्व नुकसान की जिम्मेदारी आखिर किसकी है.
केंद्रीय अनुदान का पैसा क्यों गंवाता रहा झारखंड
बाबूलाल मरांडी ने उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित रहने, निकाय चुनाव नहीं कराने और राज्य वित्त आयोग का गठन नहीं होने जैसे मुद्दों को भी उठाया है. उनका कहना है कि इन कारणों से राज्य को मिलने वाले हजारों करोड़ रुपये के केंद्रीय अनुदान पर असर पड़ा है. उन्होंने सरकार से सवाल किया कि अगर केंद्र से मिलने वाली राशि समय पर लेने और उसका उपयोग करने में ही लापरवाही हो रही है तो इसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराना कितना उचित है.
कहां खर्च हो रही डीएमएफटी की राशि ?
खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए बनाए गए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट यानी डीएमएफटी के पैसे को लेकर भी बाबूलाल मरांडी ने सवाल उठाया है. उन्होंने पत्र में दावा किया है कि इस मद में झारखंड को करीब 19 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि हासिल हुई है. उन्होंने सरकार से पूछा कि खनन प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के विकास के लिए डीएमएफटी की राशि का किस तरह इस्तेमाल हुआ और इसके लिए जवाबदेही किसकी है.
बाबूलाल मरांडी ने अपने पत्र के अंत में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर से कहा है कि केंद्र से झारखंड का अधिकार मांगना बिल्कुल उचित है लेकिन राज्य के भीतर राजस्व में कमी, खनन गतिविधियों में गिरावट और वित्तीय प्रबंधन की कमियों पर भी सवाल उठने चाहिए. उन्होंने कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन राज्य स्थाई रहता है. इसलिए राज्य के हित में सरकार की जवाबदेही भी स्थायी होनी चाहिए. मरांडी ने वित्त मंत्री से पूछा है कि क्या वे अपने मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों से भी इन सवालों का जवाब मांगने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएंगे.
बाबूलाल मरांडी के पत्र पर कांग्रेस और झामुमो का पलटवार
पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी द्वारा वित्तमंत्री राधाकृष्ण किशोर को पत्र देकर MMDR पर दिए गए प्रति उत्तर पर कांग्रेस और झामुमो ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.
झारखंड कांग्रेस के प्रदेश मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने वीडियो क्लिपिंग जारी कर कहा है कि बाबूलाल मरांडी ने इस पत्र में मान लिया है कि नए MMDR कानून से झारखंड राज्य को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा लेकिन देशभर में MMDR कानून लागू होने की बात कहकर इस सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस अपने आर्थिक नुकसान के खिलाफ जोरदार प्रतिकार करेगी.
वहीं झामुमो के केंद्रीय महासचिव और प्रवक्ता विनोद पांडेय ने प्रेस वक्तव्य जारी कर कहा है कि, बाबूलाल मरांडी को खनन कंपनियों की चिंता छोड़कर झारखंड के हितों की बात करनी चाहिए.
झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने भाजपा नेता एवं पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी के वित्त मंत्री को लिखे पत्र पर पलटवार करते हुए कहा कि बाबूलाल मरांडी का पत्र पढ़कर साफ लगता है कि उन्हें झारखंड के खनिज से ज्यादा चिंता खनन कंपनियों की लागत और मुनाफे की है, उन्हें तय करना चाहिए कि वे झारखंड के नेता की तरह बात कर रहे हैं या खनन कंपनियों के प्रवक्ता की तरह.
रघुवर दास के बयान पर आई सुबोधकांत सहाय की प्रतिक्रिया, बोले- माइक्रो लेवल पर होगा झारखंड को नुकसान

