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झारखंड नगर चुनाव: ढोल-नगाड़ों की थाप पर सजी सियासत, देवघर में परंपरा के सुरों संग चुनावी बिगुल

देवघर नगर निगम चुनाव में ढोल नगाड़ों की थाप के साथ प्रत्याशी अपना प्रचार-प्रसार करवा रहे हैं.

MUNICIPAL ELECTION IN DEOGHAR
ढोल नगाड़ो के साथ प्रचार करते हुए (ईटीवी भारत)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : February 16, 2026 at 8:54 PM IST

3 Min Read
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देवघर: नगर निकाय चुनाव को लेकर पूरे शहर में सियासी तापमान चढ़ा हुआ है. गली-गली, वार्ड-वार्ड प्रत्याशी मतदाताओं के दरवाजे खटखटा रहे हैं. कहीं हाथ जोड़कर समर्थन मांगा जा रहा है, तो कहीं नुक्कड़ सभाओं के जरिए माहौल बनाया जा रहा है. आधुनिक चुनावी रणनीतियों के बीच देवघर में इस बार कुछ ऐसा भी देखने को मिल रहा है, जो शहर को उसकी जड़ों से जोड़ देता है.

शहरी चुनावी शोर में भी यहां परंपरा की थाप गूंज रही है. डिजिटल पोस्टर और डीजे की तेज धुनों के बीच ढोल-नगाड़ों की आवाज अलग ही पहचान बना रही है. मेयर पद के प्रत्याशी बाबा बलियासे उर्फ नागेंद्र नाथ बलियासे अपने प्रचार अभियान को पौराणिक रंग में रंगते नजर आ रहे हैं. उनके समर्थन में शहर की गलियों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दे रही है.

संवाददाता हितेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट (ईटीवी भारत)

ढोल नगाड़ों का होता है विशेष महत्व

देवघर, जिसे बाबा बैद्यनाथ धाम के कारण देश-दुनिया में पहचान मिली है, वहां ढोल-नगाड़ों का विशेष महत्व रहा है. धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर सामाजिक आयोजनों तक, हर शुभ कार्य की शुरुआत इन्हीं वाद्यों की थाप से होती है. प्रचार में शामिल वासुदेव तूरी, जो पारंपरिक गायक हैं, बताते हैं कि देवघर में आज भी परंपरा के प्रति गहरा सम्मान है. उनके अनुसार भले ही आजकल लोग डीजे और बैंड-बाजा का रुख कर रहे हों, लेकिन जब बात संस्कृति और आस्था की आती है तो ढोल-नगाड़ा ही सबसे शुभ माना जाता है.


वासूदेव तूरी ने कहा कि इस तरह के प्रचार से उन्हें और उनके जैसे कलाकारों को रोजगार का अवसर मिलता है. बदलते दौर में पारंपरिक कलाकारों के सामने रोजी-रोटी की चुनौती बढ़ी है. ऐसे में चुनावी मौसम उनके लिए सहारा बनकर आता है. गौरतलब है कि सिर्फ एक प्रत्याशी ही नहीं, बल्कि नगर निगम में कई उम्मीदवार ऐसे हैं, जो पौराणिक वाद्य यंत्रों के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बना रहे हैं.

वासूदेव का मानना है कि पुराने विचारों वाले मतदाता इस तरह के प्रचार से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं. यह तरीका न सिर्फ सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करता है, बल्कि भावनात्मक रिश्ता भी स्थापित करता है. देवघर की सियासत में इस बार सिर्फ वादों और भाषणों की ही गूंज नहीं है, बल्कि ढोल-नगाड़ों की थाप भी चुनावी माहौल को अलग रंग दे रही है. आधुनिकता और परंपरा का यह संगम शहर की पहचान को और गहरा कर रहा है.

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