शादी का वादा और सात साल का रिश्ता, झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म केस क्यों किया रद्द? पढ़ें रिपोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति पर लगे दुष्कर्म के केस को रद्द कर दिया है. राजेश कुमार सिंह की रिपोर्ट.

Published : September 3, 2026 at 2:31 PM IST
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने लंबे समय तक चले प्रेम संबंध और शारीरिक संबंध के बाद शादी से इनकार से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर, निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि मामले के तथ्यों को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तो अधिकतम यह दो व्यस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध का मामला सामने आता है और यह भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n) के तहत अपराध गठित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
2016 में हुई थी मुलाकात, फिर शुरू हुआ प्रेम संबंध
कोर्ट के आदेश के मुताबिक, शिकायतकर्ता महिला और आरोपी की मुलाकात वर्ष 2016 में एक मित्र के विवाह समारोह के दौरान हुई थी. इसके बाद दोनों ने एक-दूसरे से मोबाइल नंबर साझा किए और उनके बीच प्रेम संबंध विकसित हुआ. आरोप था कि आरोपी गिरिडीह रेलवे स्टेशन के पास महिला से मुलाकात करता और बातचीत करता था. महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए.
शादी के लिए दबाव बनाने पर भी रिश्ता चलता रहा
कोर्ट आदेश के मुताबिक, महिला जब शादी के लिए आरोपी पर दबाव बनाती थी, तब आरोपी कथित तौर पर उसे किसी न किसी तरह आश्वासन देकर टाल देता था. दोनों के बीच यह संबंध लंबे समय तक चलता रहा. मामले में यह भी आरोप लगाया गया कि बाद में आरोपी ने महिला से संबंध तोड़ लिया.
रांची के होटल में भी साथ रहने का आरोप
शिकायत के अनुसार, 20 दिसंबर 2022 को आरोपी महिला को रांची लेकर आया और अगले दिन यानी 21 दिसंबर को उसे एक होटल में रखा. महिला ने आरोप लगाया कि वहां भी दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने. शिकायतकर्ता का कहना था कि लंबे समय तक चले इस संबंध के बाद आरोपी ने उससे दूरी बना ली और शादी से इनकार कर दिया.
मोबाइल बंद किया, परिवार से बात के बाद विवाद बढ़ा
आदेश में दर्ज आरोप के मुताबिक, 2 अप्रैल 2023 को आरोपी ने अपना मोबाइल फोन बंद कर लिया. इसके बाद महिला ने आरोपी के पिता से फोन पर बातचीत की. महिला का आरोप था कि इस दौरान आरोपी और उसके परिवार के सदस्यों ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और दोनों की शादी से इनकार कर दिया. इसके बाद महिला की लिखित शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया.
जांच के बाद चार्जशीट, मजिस्ट्रेट ने लिया था संज्ञान
शिकायत के आधार पर गिरिडीह महिला (सदर) थाना में केस नं. 12/2023 दर्ज किया गया. पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद चार्जशीट दाखिल की. इसके आधार पर गिरिडीह के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने मामले में संज्ञान लिया था. इसके बाद आरोपी ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख करते हुए एफआईआर, संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की.
आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के Mahesh Damu Khare बनाम State of Maharashtra & Another मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया. दलील दी गई कि यदि दो लोगों के बीच लंबे समय तक बिना विरोध के शारीरिक संबंध बने रहे और बाद में शादी को लेकर विवाद हुआ, तो केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाया गया था.
झूठे वादे और वादा पूरा न होने में फर्क
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Pramod Suryabhan Pawar बनाम State of Maharashtra & Another फैसले का भी उल्लेख किया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का वादा तभी 'झूठा वादा' माना जाएगा, जब वादा करते समय ही उसे पूरा करने की मंशा न हो और उसी झूठे वादे के जरिए महिला को शारीरिक संबंध के लिए राजी किया गया हो. वहीं, यदि शुरुआत में शादी का इरादा था, लेकिन बाद में किसी कारण से वादा पूरा नहीं हुआ, तो महज वादे के टूटने को झूठा वादा नहीं कहा जा सकता.
शादी की नीयत नहीं थी, ऐसा कोई आरोप नहीं
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने मामले के रिकॉर्ड की समीक्षा करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ ऐसा कोई विशिष्ट आरोप नहीं है कि शारीरिक संबंध स्थापित करते समय उसकी शुरुआत से ही महिला से शादी करने की कोई मंशा नहीं थी. अदालत ने इसी बिंदु को मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक माना.
सात साल से अधिक समय तक चला संबंध
अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध सात साल से अधिक समय तक चलते रहे. आदेश में कहा गया है कि यह संबंध 2016 से शुरू हुआ था और लंबे समय तक जारी रहा. कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद इस तथ्य को भी देखा कि एफआईआर दर्ज कराने के पीछे मुख्य कारण शादी को लेकर पैदा हुआ विवाद था.
मामला सहमति से बने संबंध का- कोर्ट
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने के बाद भी अधिकतम यह मामला दोनों पक्षों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध का दिखाई देता है. अदालत के अनुसार, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n) के तहत अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं है.
आपराधिक कार्यवाही जारी रखना गलत -हाईकोर्ट
कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. इसी आधार पर अदालत ने इसे ऐसा उपयुक्त मामला माना, जिसमें एफआईआर और निचली अदालत द्वारा 16 अगस्त 2024 को पारित संज्ञान आदेश समेत पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जाना चाहिए.
जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने आरोपी के संबंध में पूरी आपराधिक कार्यवाही, एफआईआर और 16 अगस्त 2024 के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया.
ये भी पढ़ें:
मधुकम जमीन विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 12 परिवारों को दी राहत

