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सुई-धागे से आत्मनिर्भरता तक! बिहार में जीविका दीदियों की सिलाई सेंटर से संवर रही 150 परिवारों की जिंदगी

ये महिलाएं आज आंगनबाड़ी के नौनिहालों के कपड़े सी रही हैं. ये सेंटर इनके लिए आत्मनिर्भरता का एक मजबूत मंच बन चुका है. पढ़ें खबर

JEEVIKA SEWING CENTER MASAURHI
जीविका दीदियों की सिलाई सेंटर (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : June 8, 2026 at 5:15 PM IST

7 Min Read
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पटना: कहा जाता है कि सही मायनों में आज़ादी तब मिलती है, जब आपके खर्च और आपके फैसले दोनों आपके खुद के हों.. पटना से सटे मसौढ़ी प्रखंड की इन महिलाओं के लिए ये कहना गलत नहीं होगा कि ये घर की चौखट से बाहर कदम कर आज आत्मनिर्भरता और आजादी की नई कहानी लिख रहीं हैं.

सरकारी पहल की मजबूत तस्वीर: बिहार में ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की सरकारी पहल अब जमीनी स्तर पर बदलाव की मजबूत तस्वीर पेश कर रही है. राजधानी पटना से सटे मसौढ़ी में जीविका समूह से जुड़ी 150 महिलाएं आज सुई-धागे से न सिर्फ आंगनबाड़ी के नौनिहालों के कपड़े सिल रही हैं, बल्कि अपने और परिवार के सपनों को भी नया आकार दे रही हैं.

देखें स्पेशल रिपोर्ट (ETV Bharat)

चहारदीवारी से निकली बाहर: कभी घर की चहारदीवारी में सिमटी रहने वाली ये महिलाएं आज सुई-धागे के दम पर आंगनबाड़ी के नौनिहालों के कपड़े सी रही हैं. ये महिलाएं अब अपने और अपने परिवार के सपनों को भी एक नया आकार दे रही हैं. मसौढ़ी का यह जीविका सिलाई सेंटर मौजूदा समय में करीब 150 महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का एक बहुत मजबूत मंच बन चुका है.

रानी देवी की कहानी: चौखट लांघकर पहली बार सिलाई सेंटर पहुंचीं रानी देवी कहती हैं कि पहले पति की कमाई पर निर्भर थे. अब महीने के 6-7 हजार कमा लेती हूं. बेटी की फीस और घर का राशन खुद भरती हूं. इस सेंटर में सभी दीदियां मिलकर आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के लिए यूनिफॉर्म, स्वेटर और बैग तैयार कर रही हैं, क्योंकि सरकार से मिले इस बड़े ऑर्डर ने इनकी पूरी जिंदगी को बदलकर रख दिया है.

आर्थिक स्थिति हुई मजबूत: प्रशिक्षण और मशीन सेंटर की समन्वयक सुनीता कुमारी बताती हैं कि मसौढ़ी प्रखंड की 150 जीविका दीदियां यहां जुड़ी हैं. हर दीदी को ट्रेनिंग के बाद मशीन दी गई है. अब ये हर महीने हजारों यूनिफॉर्म तैयार करती हैं, जिससे इनकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हुई है.

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आंगनबाड़ी के बच्चों की यूनिफॉर्म सिल रहीं जीविका दीदियां (ETV Bharat)

शांति देवी का संघर्ष: इस सेंटर से जुड़कर अपनी जिंदगी संवारने वाली 45 वर्षीय शांति देवी की आंखें पुरानी बातें याद कर भर आती हैं. शांति देवी कहती हैं कि पति की मौत के बाद लगा जिंदगी थम गई. आज इसी सेंटर से दो बच्चों को पढ़ा रही हूं. अब किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता.

बदला नजरिया: बदलाव की इस बयार पर रिंकी देवी मुस्कुराकर कहती हैं कि पहले सर पर पल्लू रखकर बोलती थी, अब मंच से बोलती हूं. जीविका के बीपीएम बताते हैं कि आंगनबाड़ी यूनिफॉर्म का ऑर्डर मिलने से दीदियों को सालभर काम मिला है. प्रति यूनिफॉर्म सिलाई पर तय राशि सीधे खाते में जाती है जिससे समाज में इनका सम्मान बढ़ा है.

उद्यमी दीदी की पहचान: इस बेहतरीन काम की वजह से अब गांव के लोग इन्हें सिर्फ 'दीदी' नहीं, बल्कि 'उद्यमी दीदी' कहकर बुलाते हैं. कभी दूसरों के कपड़े रफू करने वाले ये हाथ आज सैकड़ों बच्चों का तन ढंक रहे हैं और साथ ही अपनी खुद की जिंदगानी भी संवार रहे हैं. सुई-धागे की इसी आवाज के बीच मसौढ़ी की ये दीदियां आत्मनिर्भरता की सबसे खूबसूरत इबारत लिख रही हैं.

सिलाई मशीन की मांग: सिलाई सेंटर में कपड़े सिलाई कर रही भैंसवा गांव की महिलाओं ने कहा कि एक कपड़े पर ₹25 मिलते हैं. प्रतिदिन 200-300 रुपए की अच्छी आमदनी हो जा रही है. हालांकि उन्होंने अनुरोध करते हुए कहा कि सरकार से गुजारिश करेंगे कि इलेक्ट्रिक वाला सिलाई मशीन दिया जाए.

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सुनीता कुमारी के विचार: इस रोजगार के बारे में सुनीता कुमारी हैं कि जीविका के सिलाई सेंटर में हम सबों का एक रोजगार मिल गया है प्रतिदिन ₹25 प्रति कपड़े के हिसाब से अच्छी कमाई हो जा रही है पहले बहुत कुछ नहीं कर पा रहे थे पहचान भी नहीं थी लेकिन अब एक नई पहचान बन रही है.

"आज हम सब महिलाएं जीविका से जुड़कर अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. अपने हाथ में पैसा होता है तो घर-परिवार भी अच्छा से चल जाता है. सरकार से मांग करेंगे कि एक इलेक्ट्रिक वाला सिलाई मशीन दिया जाए और कपड़ा काटने का मशीन भी लगावा दिया जाए." -सुनीता कुमारी, जीविका दीदी

सरिता कुमारी का अनुभव: काम के अनुभवों को साझा करते हुए जीविका दीदी सरिता कुमारी बताती हैं कि पहले इधर-उधर से मांग कर कुछ कपड़े घर में ही सिलाई कर लेते थे. कुछ खास कमाई नहीं थी, लेकिन अब जीविका के द्वारा इस सिलाई सेंटर में प्रतिदिन 200-300 रुपये की अच्छी आमदनी हो जा रही है.

रश्मि कुमारी का वजूद: अपने आत्मसम्मान को लेकर बात करते हुए रश्मि कुमारी कहती हैं कि जीविका के साथ जुड़कर सिलाई कढ़ाई करने से न केवल पैसों की कमाई हो जा रही है बल्कि एक नई पहचान बन रही है. इलाके में लोग इज्जत की निगाहों से देखते हैं पहले पति के पैसों पर थे अब खुद का अपना वजूद बन गया है.

भविष्य की प्लानिंग: सिलाई सेंटर के विस्तार को लेकर प्रखंड जीविकोपार्जन पदाधिकारी दिग्विजय नारायण समदर्शी ने कहा कि मसौढ़ी प्रखंड में तकरीबन डेढ़ सौ महिलाएं हैं जो जीविका सिलाई सेंटर से जुड़कर एक अपनी पहचान बना रही है. प्रतिदिन अच्छी खासी कमाई भी बन जा रही है धीरे-धीरे और कई जगहों पर सिलाई सेंटर केंद्र खोलने की प्लानिंग है.

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"यहां दीदियां सिलाई के साथ हिसाब-किताब, बैंकिंग और मार्केटिंग भी सीख रही हैं. समूह में काम करने से इनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा है. अब ये महिलाएं ब्लॉक ऑफिस में बिना किसी डर के अपनी बात रखती हैं और लोन लेने के लिए खुद बैंक तक जाती हैं." -दिग्विजय नारायण, बीपीएम

क्या है जीविका योजना: बिहार सरकार की 'जीविका' योजना ग्रामीण इलाकों से गरीबी मिटाने और महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का एक राज्यव्यापी आंदोलन है. इसे आधिकारिक तौर पर बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना (Bihar Rural Livelihoods Project - BRLP) कहा जाता है.

विश्व बैंक की मदद: बिहार सरकार के बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन समिति द्वारा विश्व बैंक (World Bank) की वित्तीय सहायता से 2 अक्टूबर 2006 को शुरू की गई थी. हालांकि इसने अक्टूबर 2007 से विधिवत रूप से कार्य करना शुरू किया.

योजना से जुड़ना बेहद आसान: जीविका योजना से जुड़ना बेहद आसान है, जिसके लिए ग्रामीण इलाकों की 10 से 12 महिलाएं मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाती हैं. इसके लिए किसी सरकारी दफ्तर के चक्कर काटने की जरूरत नहीं होती. बल्कि जीविका के फील्ड वर्कर्स खुद गांवों में जाकर महिलाओं को जागरूक करते हैं.

कम ब्याज दर पर लोन: जीविका के फील्ड वर्कर्स आवश्यक दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, फोटो और बैंक पासबुक की मदद से उनका खाता खुलवाते हैं. समूह बनने के बाद महिलाओं को ट्रेनिंग, रिवॉल्विंग फंड और फिर रोजगार शुरू करने के लिए बैंक से कम ब्याज दर पर ₹1 लाख से ₹5 लाख तक का लोन आसानी से मिल जाता है.

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