यूनिवर्सिटी बिल पर मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष आमने-सामने, CM सुक्खू के 'सिर्फ कुर्सी की चिंता' वाले बयान पर जयराम ठाकुर का पलटवार
सीएम सुक्खू ने कहा कि, डॉक्टर टेस्ट की तरह विश्वविद्यालयों में भी नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाएगी.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : September 3, 2026 at 11:40 AM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के विरोध के बीच विश्वविद्यालय संशोधन बिल पारित हो गया. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बिल पर चर्चा का जवाब देते हुए विपक्ष पर जमकर निशाना साधा. मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष को सिर्फ कुर्सी की चिंता है, जबकि सरकार को जनता की सेवा का मोह है. उन्होंने कहा कि अच्छी चीज का विरोध होगा, इसकी उम्मीद भाजपा से नहीं थी. सीएम ने स्पष्ट किया कि बिल में यूजीसी की गाइडलाइन को नहीं तोड़ा गया है और अब बच्चे सिफारिश पर निर्भर नहीं रहेंगे, बल्कि पढ़कर आएंगे. उन्होंने इसे पारदर्शिता की दिशा में बढ़ता कदम बताया. वहीं, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर जमकार हमला बोला. उन्होंने कहा कि, कितनी बार हो गया सदन में जोर जबरदस्ती से बना कानून और हाईकोर्ट उसका रद्द कर दिया.
यूनिवर्सिटी बिल पास होने पर सीएम का विपक्ष पर तंज
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि उनकी सरकार व्यवस्था परिवर्तन की सरकार है. उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा, "आप सिर्फ कुर्सी की चिंता करते हैं, हमें जनता की सेवा का मोह है." उन्होंने स्पष्ट किया कि सहायक प्रोफेसर की नियुक्तियां विश्वविद्यालय करेंगे. मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉक्टर टेस्ट के माध्यम से आते हैं और इस पर किसी ने उंगली नहीं उठाई. इसी तरह विश्वविद्यालयों में भी नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाएगी. उन्होंने कहा कि सरकार ने वित्त कमेटी की अध्यक्षता वित्त सचिव को करने की बात कही है.
वित्तीय मामलों और भर्तियों में पारदर्शिता
सीएम सुकखू ने कहा कि, "सरकार वित्तीय मामलों और भर्तियों में पारदर्शिता चाहती है. अन्य कार्यों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं रहेगा. यह व्यवस्था पारदर्शिता की तरफ बढ़ता कदम है और इसका समर्थन किया जाना चाहिए. अगर बच्चे टेस्ट के माध्यम से आएंगे तो राजनीतिक लोगों पर उंगली नहीं उठेगी. यह व्यवस्था सभी के हित में है. अगर किसी की बेटी टॉप पर आती है तो उस पर भी उंगली उठती है. ऐसे में चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की जरूरत है. सरकार का उद्देश्य वित्तीय मामलों और भर्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है, जबकि अन्य कार्यों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं रहेगा."
HPPSC की चयन प्रक्रिया में किए गए बदलाव
इसके साथ ही सीएम सुक्खू ने हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया में किए गए बदलावों का भी जिक्र किया. मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले कई मामलों में लिखित परीक्षा के अंकों का अंतिम चयन में पर्याप्त प्रभाव नहीं होता था और इंटव्यू के अंकों की भूमिका अधिक रहती थी. सरकार ने लिखित परीक्षा और व्यक्तिगत साक्षात्कार दोनों के अंकों को चयन प्रक्रिया में शामिल किया है, ताकि भर्ती अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष रहे.

'कानून रद्द होने से सरकार की फजीहत'
विश्वविद्यालय बिल पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री पर जमकर हमला बोला. नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि, सदन में बहुमत के आधार पर राज्य सरकार ऐसे कानून बना देती है जो उच्च न्यायालय से रद्द हो जाते हैं. हाईकोर्ट से कोई कानून रद्द होता है तो इससे न केवल सरकार की फजीहत होती है बल्कि सदन की गरिमा को भी ठेस पहुंचती है.
नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि, "विधानसभा इसलिए है कि यहां विधायी कार्य होंगे, कानून बनेंगे और उसी कानून के आधार पर प्रदेश चलेगा. लेकिन, यहां बने कानून को हाईकोर्ट में भी सम्मान मिलना चाहिए. कई बार ऐसा हो चुका है कि इस विधानसभा के अंदर सत्ता पक्ष के बहुमत के कारण जोर-जबरदस्ती से बिल पारित किए गए और बाद में हाईकोर्ट ने उन कानूनों को रद्द कर दिया.इस तरह के मामलों की एक लंबी फेहरिस्त है."
'हर जगह होती है सरकार की फजीहत'
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री पर तंज करते हुए कहा कि, जैसे-जैसे सरकार का कार्यकाल पूरा होने की दिशा में जा रहा है, इसका प्रभाव व्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है. उन्होंने कहा कि इसी सदन में वॉटर सेस का प्रावधान किया गया था. उन्होंने सरकार से पूछा कि उसका क्या हुआ. मामले हाईकोर्ट जाते हैं और हर जगह फजीहत हो जाती है. जयराम ठाकुर ने पंचायत चुनाव को लेकर की गई संशोधन का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार ने पंचायत चुनाव टालने का प्रयास किया वहां भी उच्च न्यायालय ने विपरीत फैसला सुनाया.

'जोर जबरदस्ती से बहुमत के आधार पर बिल पारित'
जयराम ठाकुर ने कहा कि वह भी पांच साल तक इन सभी चीजों को देखकर और झेलकर आए हैं. जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार यहां जोर जबरदस्ती से बहुमत के आधार पर बिल तो पारित कर देगी, लेकिन जब यूजीसी के नियमों को लेकर लोग हाईकोर्ट जाएंगे तो वहां सरकार का क्या होगा. उन्होंने कहा कि जब इस विधानसभा से कानून बनकर पारित होता है और हाईकोर्ट उसे रद्द कर देता है, तो इससे केवल सरकार की ही नहीं इस सदन की भी किरकिरी होती है, यह सरकार को सोचना चाहिए.
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