Special: कभी थे 200 हुनरमंद हाथ, अब महज 5 कारीगरों के भरोसे जिंदा है ईरान से आई यह दुर्लभ हस्तशिल्प कला
ईरान से जयपुर आई तांबे-पीतल पर हाथ से नक्काशी की सदियों पुरानी कला अब दम तोड़ रही है. पढ़िए फिरोज सैफी की स्पेशल रिपोर्ट.

Published : September 1, 2026 at 8:42 PM IST
|Updated : September 1, 2026 at 8:48 PM IST
जयपुर: गुलाबी नगरी जयपुर के पास कुछ सालों में पीतल और तांबे पर नक्काशी करने वाली छेनी और हथौड़े तो होंगे, लेकिन उन्हें चलाने वाले जादुई हाथ हमेशा के लिए गायब हो जाएंगे. सदियों पहले ईरान से वाया मुरादाबाद जयपुर पहुंची और महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के संरक्षण में फली-फूली यह दुर्लभ हस्तकला आज अपने वजूद की आखिरी सांसें गिन रही है. कभी शहर में 200 से अधिक कारीगरों की छेनियों की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन आज सरकारी उपेक्षा और मशीनी दौर की मार झेल रही यह विरासत अब महज 5 कारीगरों के भरोसे अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रही है.
सवाई जयसिंह द्वितीय लाए थे कारीगर: गुलाबी नगरी जयपुर की पहचान सिर्फ इसके भव्य किलों, महलों और ऐतिहासिक इमारतों से ही नहीं है, बल्कि यह शहर सदियों से अपने हुनरमंद कारीगरों और हस्तकलाओं के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है. जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जब इस शहर की स्थापना की थी, तब उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न विधाओं में दक्ष कारीगरों को लाकर यहां बसाया था. उन्हीं पारंपरिक हस्तकलाओं में से एक है तांबे और पीतल के बर्तनों पर हाथों से बारीक नक्काशी करने की कला, जिसे लोग बहुत पसंद किया करते थे.
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किशनपोल बाजार की अनमोल विरासत: राजधानी जयपुर के किशनपोल बाजार के पास आज भी कुछ गिने-चुने कारीगर इस अनमोल विरासत को अपने हाथों से जिंदा रखे हुए हैं. वे छेनी और लकड़ी के हत्थे की मदद से बर्तनों के बाहरी हिस्से पर चोट करते हुए आकर्षक फूल-पत्तियां, पशु-पक्षी, घोड़े, हाथी, राजा, रानी और मानव आकृतियां उकेरते हैं. यह नक्काशी इतनी बारीक और सफाई से की जाती है कि पहली नजर में यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि यह अद्भुत डिजाइन हाथ से बनाया गया है या किसी आधुनिक मशीन से.
ईरान से जयपुर पहुंची थी यह कला: किशनपोल बाजार के पास रहने वाले सगे भाई मोहम्मद हनीफ और मोमिन मोहम्मद पिछली तीन पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं. मोहम्मद हनीफ बताते हैं कि "हमारे पिता और दादा भी तांबे-पीतल के बर्तनों पर हाथों से नक्काशी किया करते थे. मैं स्वयं पिछले 55 वर्षों से यह काम कर रहा हूं. हमने बुजुर्गों से सुना है कि यह कला मूल रूप से ईरान की है. मुगल काल और विदेशी राजाओं के जमाने में ईरान से कई कारीगर भारत आए, जिन्होंने स्थानीय कारीगरों को यह हुनर सिखाया. उस समय इस काम का सबसे बड़ा केंद्र मुरादाबाद था. जब तत्तकालीन महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर बसाया, तो वे मुरादाबाद से इन दक्ष कारीगरों को पिंकसिटी लेकर आए थे."

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कभी गूंजती थीं 200 छेनियां, अब सिर्फ पांच बचे: वक्त के थपेड़ों ने इस कला को हाशिए पर धकेल दिया है. मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि जब वे छोटे थे, तब जयपुर में इस विधा के 200 से ज्यादा कारीगर हुआ करते थे. समय बदला, तकनीक बदली और कारीगरों की संख्या लगातार घटती गई. अब देखते ही देखते जयपुर में हाथ से नक्काशी करने वाले महज चार से पांच कारीगर ही बचे हैं.
सरकारी संस्था के बंद होने से टूटा हौसला: मोहम्मद हनीफ का कहना है कि पहले इस हस्तकला को सरकार से पूरा प्रोत्साहन मिलता था. इसके लिए 'राजस्थान हैंडीक्राफ्ट्स' का गठन किया गया था. यह संस्था कारीगरों को काम देती थी और तैयार माल को उचित मूल्य पर बाजार में बेचती थी. इससे कारीगरों को रोजगार और सम्मान दोनों मिलते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह सरकारी व्यवस्था कमजोर हुई और राजस्थान हैंडीक्राफ्ट्स के बंद होने के बाद कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया. नतीजा यह हुआ कि कई हुनरमंदों ने यह काम छोड़ दिया. आज कोई पेट पालने के लिए ऑटो रिक्शा चला रहा है, तो कोई ट्रॉली खींचने या मजदूरी करने पर मजबूर है.

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मशीनों के दौर में पिछड़ रहा हाथ का हुनर: इस कला के विलुप्त होने का एक बड़ा कारण आर्थिक मंदी भी है. मोहम्मद हनीफ बताते हैं कि इस काम में शारीरिक मेहनत बहुत ज्यादा है, लेकिन उसके मुकाबले मजदूरी बेहद कम मिलती है. काम की भी कोई नियमित गारंटी नहीं है. यही वजह है कि नई पीढ़ी और उनके बच्चे इस पारंपरिक कला को सीखने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं. इसके अलावा, बदलते दौर में बाजार में मशीन से बने सस्ते और चमकीले सामानों की बाढ़ आ गई है. इसने हाथ के काम की कद्र और बाजार दोनों को खत्म कर दिया है, जबकि हाथ से की गई नक्काशी की अपनी एक अलग रूह होती है, जहां हर उत्पाद पर कारीगर के स्पर्श का अहसास होता है.

छोटी-छोटी डिब्बियों पर उकेरी जाती है कला: दूसरे भाई मोमिन मोहम्मद तांबे और पीतल की छोटी-छोटी डिब्बियों पर नक्काशी करने में माहिर हैं. इन डिब्बियों का इस्तेमाल महिलाएं जेवरात और सिंदूर रखने के लिए करती हैं. वे इतनी छोटी सी जगह पर भी छेनी से राजा-रानी, घोड़े और शेर जैसी आकृतियां उकेर देते हैं. मोमिन कहते हैं कि यह काम उन्होंने अपने बुजुर्गों से सीखा है और अब यही उनकी पहचान है, लेकिन नई पीढ़ी इस काम को करने में दिलचस्पी नहीं ले रही, क्योंकि इसमें मेहनत के मुताबिक आमदनी नहीं मिलती है.

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आमेर महल की योजना बंद होने से लगा झटका: सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए मोमिन मोहम्मद कहते हैं, "सरकार इस कला को बचाने के लिए गंभीर नहीं है. करीब 12 साल पहले सरकार ने एक बेहतरीन योजना शुरू की थी, जिसके तहत ऐतिहासिक आमेर महल में हम जैसे कारीगरों को स्टॉल दिए गए थे. वहां हम पर्यटकों के सामने लाइव कला का प्रदर्शन करते थे और उत्पाद बेचते थे. देश-विदेश के पर्यटक इसे हाथों-हाथ खरीदते थे और हमारी अच्छी आमदनी हो जाती थी, लेकिन बाद में उस योजना को बंद कर दिया गया." पहले सरकारी प्रदर्शनियों में भी इन्हें मंच मिलता था, लेकिन अब उनकी जगह महंगे प्राइवेट एग्जिबिशन ने ले ली है, जो इन जमीनी कारीगरों की पहुंच से बाहर हैं.

सरकार से हस्तकला को बचाने की गुहार: मोहम्मद हनीफ और मोमिन मोहम्मद का कहना है कि जयपुर की कई अनमोल हस्तकलाएं पहले ही समय के साथ दफन हो चुकी हैं. तांबे-पीतल पर नक्काशी की यह कला भी अब अपने अंतिम दौर में है. कारीगरों ने सरकार से गुहार लगाई है कि इसे बचाने के लिए विशेष योजना और नीचि बनाई जाए. उनका कहना है कि अगर अब भी ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले कुछ सालों में जयपुर के पास छेनी और हथौड़े तो होंगे, लेकिन उन्हें चलाने वाले जादुई हाथ नहीं होंगे, और यह दुर्लभ हस्तकला हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी.
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