Boss Scam : कॉर्पोरेट अकाउंट को निशाना बनाते हैं साइबर ठग, करोड़ों की धोखाधड़ी...
साइबर ठगी का नया पैंतरा 'बॉस स्कैम'...जयपुर की स्टेट साइबर क्राइम थाना पुलिस जुटी है ऐसे मामलों की जांच में.

Published : August 28, 2026 at 5:52 PM IST
जयपुर: साइबर ठग बड़े कॉर्पोरेट अकाउंट को बॉस स्कैम के जरिए निशाना बनाकर करोड़ों रुपए की साइबर ठगी की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं. साइबर ठग किसी कंपनी, संस्था और कारोबार के मालिक अथवा वरिष्ठ अधिकारी के नाम से अकाउंटेंट, मैनेजर या वित्त विभाग के कर्मचारियों को WhatsApp, ईमेल या कॉल के जरिए संपर्क करते हैं और तत्काल बड़ी रकम ट्रांसफर करने का दबाव बनाते हैं.
स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन के प्रभारी आरपीएस गजेंद्र शर्मा का कहना है कि यह साइबर ठगों का एक नया पैंतरा है. जिससे करोड़ों रुपए की साइबर ठगी को अंजाम दिया जाता है. ऐसे मामलों के पीड़ित अलग-अलग राज्यों से भी होते हैं. थाना पुलिस ऐसे ही एक मामले की जांच में जुटी है. एक आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है.
ऐसे लगाते हैं सिस्टम में सेंध : साइबर ठग पहले कंपनी के कंप्यूटर या लैपटॉप में मैलवेयर इंस्टॉल करवाकर वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों से जुड़ी जानकारी जुटा सकते हैं. इसके बाद बॉस (मालिक या वरिष्ठ) अधिकारी के वाट्सएप अकाउंट को उस सिस्टम पर ब्लॉक कर देते हैं. उस नंबर की पुरानी चैट की रेप्लिका बनाकर एक नए नंबर को बॉस के नाम से सेव करते हैं और उसी अकाउंट से बड़ी धनराशि अपने अकाउंट में तत्काल ट्रांसफर करने का दबाव बनाते हैं.
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Web WhatsApp को निशाना बनाकर जुटाते हैं जानकारी : उनका कहना है कि साइबर ठग एपीके फाइल के जरिए मोबाइल में सेंधमारी करते हैं. जबकि कंप्यूटर या लैपटॉप को निशाना बनाने के लिए .exe फाइल का इस्तेमाल किया जाता है. यह फाइल ऑपरेटिंग सिस्टम की खामी या किसी आकर्षक विज्ञापन के जरिए कंप्यूटर या लैपटॉप में इंस्टॉल की जाती है. इसके बाद खासतौर पर वेब वाट्सएप को टारगेट किया जाता है, ताकि कंपनी या संस्था के बारे में और उसके बॉस के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाई जा सके.
ठगी की रकम से खरीदते हैं क्रिप्टो करेंसी : उनका कहना है कि ठगों की ओर से भेजे गए मैसेज में जल्द भुगतान करने या गोपनीय लेन-देन का दबाव बनाया जाता है. अधिकारी के नाम, मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी की नकल कर कर्मचारी को भरोसे में लिया जाता है और रकम अपराधियों के बताए खातों में ट्रांसफर करवा ली जाती है. साइबर अपराधी आगे इस रकम को अलग-अलग खातों के जरिए ट्रांसफर करते हैं. कैश विड्रॉल के बाद साइबर ठगी का इस्तेमाल क्रिप्टो करेंसी या USDT खरीदने में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
चैनल-ग्रुप से खातों की खरीद-फरोख्त : उनका कहना है कि टेलीग्राम या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बने चैनल्स और ग्रुप में कई मेंबर जुड़े होते हैं. इन ग्रुप्स और चैनल्स का मकसद साइबर ठगी के लिए बैंक खातों की खरीद-फरोख्त करना होता है. अकाउंट होल्डर को लालच देकर उसके अकाउंट के दस्तावेज और जानकारी जुटाई जाती है. इन बैंक खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी में किया जाता है. ऐसे ही एक आरोपी को पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है. उससे पूछताछ में कई बड़े खुलासे होने की संभावना है.
यह सावधानी रखकर बचा जा सकता है ठगी से : पुलिस ने कर्मचारियों, खासकर वित्त विभाग से जुड़े लोगों को किसी भी संदिग्ध फाइल, लिंक या सॉफ्टवेयर को डाउनलोड नहीं करने की सलाह दी है. पुलिस के अनुसार, किसी भी बड़े भुगतान के निर्देश की स्वतंत्र रूप से फोन कॉल या आमने-सामने पुष्टि करनी चाहिए. WhatsApp Web और Linked Devices की नियमित जांच करनी चाहिए. सिस्टम, एंटीवायरस और सुरक्षा सॉफ्टवेयर को अपडेट रखना चाहिए और वित्तीय लेन-देन में दो-स्तरीय सत्यापन का इस्तेमाल करना चाहिए.
लाखों-करोड़ों रुपए की चपत लगाते हैं ठग : उनका कहना है कि इस तरह की वारदात आजकल देश के अलग-अलग राज्यों में सामने आ रही है. राजस्थान में भी कुछ घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें लेकर साइबर पुलिस स्टेशन ने मुकदमे दर्ज किए गए हैं. पुलिस मामलों की जांच में जुटी हैं. उनका कहना है कि ऐसी वारदातों में ठगी की रकम बहुत बड़ी होती है. किसी मामले में 76 लाख रुपए की, किसी में एक करोड़ और किसी मामले में 2.50 करोड़ रुपए की साइबर ठगी की बात सामने आई है. हालांकि, उन्होंने पीड़ित के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी.

