जबलपुर की शैली धोपे का कमाल, जो बच्चे सुन नहीं सकते म्यूजिक बजते ही थिरकने लगते हैं
जबलपुर की शैली धोपे ने मूक-बधिर और दिव्यांग बच्चों को सिखाया कत्थक और कई डांस. बच्चों के लिए सीखी साइन लैंग्वेज. विश्वजीत सिंह की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : July 8, 2026 at 10:56 PM IST
जबलपुर: मध्य प्रदेश में कत्थक की एक ऐसी कलाकार हैं जिनकी वजह से कई मानसिक दिव्यांग और मूक बधिर बच्चों की जिंदगी बदल गई है. जिन लोगों को कोई शिक्षा देने को तैयार नहीं था, उन्हें इशारों-इशारों में कत्थक और दूसरे डांस सिखा दिया.
आज यह बच्चे नाचते गाते हैं, जो बच्चे सुन नहीं सकते, वे भी संगीत की धुन को महसूस करके कत्थक जैसा कठिन नृत्य कर लेते हैं. इस कत्थक नृत्यांगना का नाम है शैली धोपे. शैली ने कई लाचारों की जिंदगी में खुशियां भर दी हैं. इन बच्चों को डांस सिखाने के लिए उन्होंने साइन लैंग्वेज भी सीखी है.
दूसरे विषय में बनाना चाहती थीं करियर, पिता नहीं थे राजी
जबलपुर की डॉ शैली धोपे बचपन से ही डांस में रुचि रखती थीं. शैली बहुत अच्छा नृत्य करती थीं. उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ भारतीय शैली के कई नृत्य सीख लिए थे. वे कत्थक में माहिर हो गई थीं लेकिन किसी दूसरे विषय में अपना कैरियर बनाना चाहती थीं, पर उनके पिता इस बात के लिए राजी नहीं थे. शैली के पिता प्रोफेसर थे, उन्होंने कहा कि जब तुम्हारी रुचि नृत्य में है तो तुम अपना करियर भी नृत्य में ही बनाओ. इसके बाद शैली धोपे ने इसे ही अपना करियर बनाते हुए कत्थक में ही पीएचडी की है.
'दिव्यांग बच्चों को कत्थक सिखाने खुद को किया तैयार'
शैली धोपे ने बताया, "उन्होंने 1998 से ही कत्थक सिखाना शुरू कर दिया था. 1999 के दौरान पहली बार उनकी क्लास में एक लड़की आई जिसे डाउन सिंड्रोम था. हम जिसे सामान्य तौर पर मानसिक रूप से दिव्यांग मानते हैं. उसे कत्थक सिखाना बहुत कठिन था. हम थोड़ा भी दबाव उस पर डालते थे तो वह रोने लगती थी. हालांकि कुछ दिनों बाद वह लड़की चली गई.

इसके बाद शैली ने धीरे-धीरे खुद को ऐसे बच्चों के लिए तैयार करना शुरू किया. शैली बताती हैं कि उन्होंने 2012 से सामान्य बच्चों के साथ ही 2 अलग-अलग श्रेणी के दिव्यांग बच्चों को भी कथक और डांस सिखाना शुरू किया."
'मूक-बधिर बच्चों को डांस सिखाने सीखी साइन लैंग्वेज'
शैली धोपे ने बताया, "उन्होंने मूक-बधिर बच्चों के लिए कत्थक सिखाने का प्रयास किया तो सबसे पहले उन्होंने साइन लैंग्वेज सीखी. कत्थक के इतिहास में मूक-बधिर बच्चों को कत्थक सीखाने का कोई कोर्स उपलब्ध नहीं था. इसलिए उन्होंने खुद ही हाथ से डांस की नई किस्म की साइन लैंग्वेज तैयार की. जिसमें इशारे देखकर मूक बधिर बच्चे नृत्य की मुद्राएं बनाते थे. इशारे से मुद्राएं बनाने में यह बच्चे बहुत ही एक्सपर्ट होते हैं हालांकि इन्हें सुनाई नहीं देता लेकिन यह कॉपी बहुत तेजी से करते हैं."

शैली धोपे ने बताया, "इनमें बहुत एनर्जी होती है इसलिए समस्या इनकी गति पर होती थी. ये नृत्य को ज्यादा तेजी से करने लगते थे. वही यह लोग सुन नहीं सकते. इसलिए इन्हें इशारों में संगीत सुनाया जाता है. मैं इस मामले में काफी सफल रही. मेरे सिखाए हुए कुछ बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं."
'डाउन सिंड्रोम वाले बच्चों को याद रहे स्टेप्स'
शैली धोपे ने बताया, "डाउन सिंड्रोम या मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के साथ एक समस्या होती है कि उनकी याददाश्त कमजोर रहती है. उन्हें स्क्रिप्ट याद नहीं रहती, बातें याद नहीं रहतीं लेकिन शैली का कहना है कि उनका अनुभव कुछ अलग ही रहा है. उन्होंने मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को कत्थक और राजस्थानी शैली के नृत्य सिखाए हैं. कई दिनों बाद भी बच्चों ने जब इन नृत्य को दोहराया तब भी स्टेप्स नहीं भूले. सामान्य तौर पर ऐसे बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता लेकिन वे डांस पूरी मस्ती में करते हैं और पूरे मन से करते हैं."

शैली धोपे से हमारी मुलाकात जबलपुर के विजयनगर में आंचल नाम के एक केंद्र पर हुई. जैसे ही शैली यहां पर पहुंची डाउन सिंड्रोम के बच्चे यहां पढ़ रहे थे. शैली को देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान थी उन्हें अंदाज हो गया था कि अब शैली उनके साथ डांस की मस्ती करेगी. इन बच्चों ने हमें कई गानों पर एक से हाव-भाव और मुद्राओं के साथ नाच कर दिखाया.
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'संगीत में कई मूक-बधिर बच्चे कर रहे डिप्लोमा और डिग्री कोर्स'
शैली धोपे ने बताया, "उनके सिखाए कई बच्चे अब बैचलर इन परफॉर्मिंग आर्ट और परफॉर्मिंग आर्ट में डिप्लोमा जैसे कोर्स भी कर रहे हैं. वे इन बच्चों के लिए ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर संगीत विश्वविद्यालय से डिग्रियां भी करवा रही हैं. कई मूक बधिर बच्चों ने डांस की कई विधाएं सीखने के बाद दूसरे लोगों को भी सिखाना शुरू कर दिया है.
शैली धोपे का कहना है कि यही उनकी सबसे बड़ी जीत है क्योंकि जिन बच्चों को नाकारा समझ कर बोझ माना जा रहा था, वे न केवल नाम कमा रहे हैं बल्कि अपनी कला से पैसा भी कमा रहे हैं और अब वे आत्मनिर्भर भी हैं."

