इस कद काठी का था वो आखिरी भारतीय चीता, जबलपुर में आज भी सुरक्षित है कंकाल
जबलपुर के एक खास म्यूजियम में चीते के कंकाल के साथ जानवरों की 700 प्रजातियों के अवशेष व आर्टिफैक्ट्स मौजूद

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 10, 2026 at 5:20 PM IST
|Updated : February 10, 2026 at 5:27 PM IST
रिपोर्ट: विश्वजीत सिंह राजपूत
जबलपुर : भारत में 75 साल पहले चीते खत्म हो गए थे, जिस वजह से सरकार विदेशों से चीतों को भारत लाकर उन्हें फिर बसाने के प्रयास कर रही है. लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि भारत में 75 साल पहले विलुप्त हुए चीतों में से एक का कंकाल आज भी जबलपुर के साइंस कॉलेज म्यूजियम में सुरक्षित रखा है. इतना ही नहीं, इस म्यूजियम में 700 से ज्यादा जानवरों के स्केलेटन, पक्षियों के आर्टिफैक्ट्स के साथ ऐसी चीजें मौजूद हैं, जिन्हें आप देखते रह जाएंगे.
अंग्रेजों ने बनवाया था साइंस कॉलेज, यहीं मौजूद चीते का कंकाल
जबलपुर के रॉबर्टसन साइंस कॉलेज (अब गवर्नमेंट मॉडल साइंस कॉलेज) में भारतीय चीते का कंकाल आज भी सुरक्षित रखा है. अंग्रेजों ने इस कॉलेज की स्थापना 1873 में की थी. पहले यह संस्था 1836 में सागर में शुरू हुई थी, जिसके बाद 1873 में इसे जबलपुर शिफ्ट किया गया था. अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया ये साइंस कॉलेज आज भी मध्य प्रदेश में साइंस की सबसे अच्छी शिक्षा के लिए जाना जाता है. यहां बीएससी और एमएससी के कोर्स संचालित होते हैं. यहीं पर जूलॉजी डिपार्टमेंट में एक म्यूजियम है, जो बेहद खास है.

जूलॉजी डिपार्टमेंट में मौजूद है अनोखा म्यूजियम
जूलॉजी में प्राणी विज्ञान की शिक्षा दी जाती है और इसके लिए अलग-अलग जानवरों की हड्डियों और स्केलेटन के बारे में जूलॉजी के छात्रों को पढ़ाना होता है. इसी वजह से इस कॉलेज में जूलॉजी का एक म्यूजियम बनाया गया था. वर्तमान में जूलॉजी डिपार्टमेंट की एचओडी सुनीता शर्मा कहती हैं, '' कॉलेज के इस म्यूजियम की शुरुआत 1957 में हुई थी लेकिन ऐसा लगता है कि इस म्यूजियम में जिन प्राणियों के स्केलेटन संरक्षित हैं, वे इस कॉलेज में बहुत पहले से रखे गए थे. क्योंकि ये काफी ज्यादा पुराने हैं.''

जबलपुर में 1950 के दशक के चीते का स्केलेटन
डॉ. सुनीता शर्मा कहती हैं, '' भारत में 1950 के ही दशक में भारतीय चीता विलुप्त हो गया था. भारत में एक बार फिर से दक्षिण अफ्रीकी देश नामीबिया से चीते लाए जा रहे हैं और उन्हें भारत में बसाया जा रहा है लेकिन जबलपुर के जूलॉजी डिपार्टमेंट के म्यूजियम में भारतीय चीते का स्केलेटन है. यह स्केलेटन लगभग 70-75 साल पुराना है, जब साइंस कॉलेज के जूलॉजी डिपार्टमेंट में इस म्यूजियम को बनाने की शुरुआत की गई थी.''
चीते के नाखून से लेकर दांत तक सुरक्षित
सुनीता शर्मा का कहना है कि यह पूरा आर्टिकुलेटेड स्केलेटन है. इस चीते के स्केलेटन में उसकी लगभग सभी हड्डियां सुरक्षित हैं, उसके दांत भी देखे जा सकते हैं और उसके पंजे के नाखून भी उसमें देखे जा सकते हैं. स्केलेटन देखकर यह अंदाजा होता है कि यह चीता वयस्क रहा होगा. डॉ. सुनीता शर्मा ने बताया, '' इन हड्डियों को सुरक्षित रखने के लिए इनके पास नैफथलीन बॉल और फार्मलीन का घोल डाला जाता है. इसके साथ इनके ऊपर एक किस्म का पेंट किया जाता है, जिससे ये हड्डियां खराब ना हों.
बाहरी छात्र भी विजिट कर सकते हैं म्यूजियम
ऐसा नहीं है कि साइंस कॉलेज के इस म्यूजियम को केवल साइंस कॉलेज के जूलॉजी डिपार्टमेंट के ही छात्र देख सकते हैं. बल्कि बाहरी छात्र जो जूलॉजी की पढ़ाई करता हो, वह भी इस म्यूजियम को देखने आ सकता है. हालांकि, इस म्यूजियम में किसी भी चीज को हाथ लगाना साफ मना है.

विदेशी जानवरों के स्केलेटन भी मौजूद
डॉ. सुनीता शर्मा ने कहा, '' यहां केवल मध्य प्रदेश के ही जानवरों के स्केलेटन नहीं हैं बल्कि यहां लगभग 700 प्रकार के जानवरों की हड्डियों के ढांचे हैं. यहां भारत के विभिन्न क्षेत्रों के एनिमल्स के अवशेष हैं और न केवल भारत के हम कह सकते हैं कि विश्व के विभिन्न भागों में पाए जाने वाले एनिमल्स भी यहां पर सुरक्षित रखे हुए हैं. इनमें से कई ऐसे हैं, जो विलुप्त हो चुके हैं.''

सील मछली का स्केलेटन
इस म्यूजियम में न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया यहां तक की अंटार्कटिका में पाई जाने वाली सील मछली का स्केलेटन भी सुरक्षित रखा गया है. इस जूलॉजी म्यूजियम में आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, मछली, रेप्टाइल्स, स्नेक्स, बर्ड्स, मैमल्स के साथ ही कई एंब्रियो भी सुरक्षित रखे गए हैं. यहां मानव हड्डियां भी देखने मिलती हैं.

दोबारा नहीं बनाया जा सकता ऐसा म्यूजियम
डॉ. सुनीता शर्मा का कहना है कि आज के दौर में ऐसा म्यूजियम दोबारा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि अब कानून बदल गए हैं और कई जानवर ऐसे हैं जिन्हें किसी भी परिस्थिति में पकड़ा या मारा नहीं जा सकता. भले ही उनका उपयोग अध्ययन के लिए ही क्यों ना हो रहा हो. इसलिए यहां पर कुछ ऐसे जानवरों की हड्डियां हैं, जो दोबारा किसी म्यूजियम में स्थापित नहीं की जा सकतीं.

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चिड़ियों की सैकड़ों प्रजातियां
डॉ. सुनीता शर्मा ने बताया, '' यहां पर ऑस्ट्रिच, मोर, हिमालय ईगल जैसे बहुत बड़े-बड़े पक्षियों के साथ ही छोटी-छोटी हमिंग बर्ड्स को भी संरक्षित किया गया है. डॉक्टर सुनीता शर्मा ने बताया कि कई जानवरों और पक्षियों की मृत्यु के बाद उनके अंदरूनी अंगों को हटाने के बाद केमिकल लगाया जाता है और फिर स्टफिंग करने के बाद असली खाल पहना दी जाती है, जिससे उनका शेप न बिगड़े. इसी तरह भारीय चीते के कंकाल को भी केमिकल लगाकर 75 वर्षों से सुरक्षित रखा गया है.

