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सातवीं पास संजो बघेल देश की पहली आल्हा सिंगर, 20 हजार गीत गाकर तोड़ा पुरुषों का वर्चस्व

महिला दिवस पर मिले देश की पहली महिला आल्हा गायिका संजो बघेल से. पुरुष प्रधान गीत गा हासिल किया नया मुकाम. ईटीवी भारत एक्सक्लूसिव.

SANJO BAGHEL ALHA SINGER
संजो बघेल आल्हा गायकी की झंकार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : February 26, 2026 at 10:19 AM IST

5 Min Read
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रिपोर्ट: विश्वजीत सिंह राजपूत

जबलपुर: बीते कुछ सालों में महिलाओं ने हर उस क्षेत्र में अपना दखल दिया है जहां पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था. बुंदेलखंड की वीर रस की कविता आल्हा की गायकी केवल पुरुष ही करते रहे हैं. सदियों से यही परंपरा थी महिलाओं को आल्हा नहीं गाने दिया जाता था. लेकिन, जबलपुर की संजो बघेल ने इस क्षेत्र में कदम रखा और पुरुषों को पीछे छोड़कर संजो बघेल ने आल्हा गायकी में ऐसा मुकाम बनाया है जो किसी पुरुष ने पहले कभी नहीं पाया.

संजो बघेल ने 7वीं तक पढ़ाई की है, पिता किसान थे

जबलपुर के कंजई गांव में संजो बघेल का जन्म हुआ था. संजो बघेल के पिता किसान थे. संजो बघेल बताती हैं कि उनकी शुरुआती पढ़ाई लिखाई गांव में ही हुई और उन्होंने मात्र सातवीं क्लास तक की पढ़ाई की. उनका कहना है कि उनका परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का था और उन्हें रामलीला में अक्सर काम करने का मौका मिलता था. इसलिए शुरुआत से ही वह स्टेज से बहुत नहीं डरीं.

आल्हा गायिका संजो बघेल ईटीवी भारत पर (ETV Bharat)

बचपन में परिवार के साथ भजन गाती थीं

संजो ने बताया कि बचपन में भी अपने परिवार के साथ भजन गाती थीं, लेकिन तब उनको यह पता नहीं था की बुंदेली में गाए यही भजन किसी दिन उनकी किस्मत बदल देंगे. उनके परिवार में उनके बड़े पिता एक बेहतरीन आल्हा गायक थे.

आल्हा क्या होता है, किसने की थी शुरुआत

आल्हा एक विशेष किस्म की गायकी होती है जो बुंदेलखंड बघेलखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके में गई जाती है. ऐसा कहा जाता है कि 12वीं शताब्दी में एक दरबारी कवि जगनिक ने इसकी शुरुआत की थी. आल्हा और उदल महोबा राज्य के दो सेनापति थे जिनकी वीरगति को जगनिक ने कुछ अलग अंदाज में लिखा और गया था. वीर रस की यह कविता 12वीं शताब्दी से बुंदेलखंड में प्रचलन में है.

युद्ध में जाते वक्त गाया जाता था आल्हा

संजो बघेल का कहना है कि अल्ला पहले केवल बरसात में ही गया जाता था और इसे दूसरी किसी ऋतु में नहीं गाते थे. आल्हा को ढोल मंजीरा और नगाड़े के साथ गया जाता था और अक्सर जब राजाओं की सेना लड़ने के लिए जाती थी तब उनके साथ गाने वाले चलते थे. आल्हा गाने से जोश बढ़ता है और जोश में लोग वीरता के साथ युद्ध लड़ पाते थे. इसलिए उस जमाने में आल्हा लड़ाई के काम में भी आता था.

SANJO BAGHEL ALHA SINGER
आल्हा गायिका संजो बघेल की कहानी (ETV Bharat)

ऐसा माना जाता था की आल्हा केवल पुरुष ही गा सकते हैं. बुंदेलखंड और बघेलखंड की जीवन शैली आज भी परंपरागत है और यहां पर महिलाओं को उतनी आजादी नहीं है जितनी दूसरे इलाकों में है. ऐसी स्थिति में संजो बघेल का आल्हा गाना एक क्रांतिकारी कदम था.

संजो बघेल के लिए आल्हा गाना एक चुनौती था

संजो बघेल बताती हैं कि उन्होंने जब यह इच्छा जाहिर की वे आल्हा गाना चाहती हैं तो कोई तैयार नहीं हुआ. यहां तक की जिस स्टूडियो में आल्हा रिकॉर्ड करवाने के लिए पहुंचीं उन्होंने भी संजो बघेल की रिकॉर्डिंग करने से मना कर दिया और कहा कि महिलाएं आल्हा नहीं गा सकतीं. तब उन्होंने स्टूडियो के लोगों को समझाया कि वो माता शारदा का भजन गाना चाहती हैं और यह आल्हा भजन के स्वरूप में होगा. तब जाकर उनकी रिकॉर्डिंग हो पाई. इसके बाद उन्होंने भोलेनाथ पर एक आल्हा गया जो बुंदेलखंड और बघेलखंड में लोगों की जुबान पर चढ़ गया.

20,000 से ज्यादा आल्हा गीत गाए

संजो बघेल बताती हैं कि इसके बाद तो यह सिलसिला चल निकला और उन्होंने अब तक 20,000 से ज्यादा आल्हा गीत गाया है. वो नया प्रयोग करते हुए समसामयिक घटनाओं पर भी आल्हा गाती हैं. संजो बघेल बताती हैं कि उन्होंने यह सफलता अपने दम पर प्राप्त की है. आज संजो बघेल बुंदेलखंड का एक जाना माना चेहरा हैं. उन्होंने हजारों की तादाद में शो किए हैं और लोग उन्हें सुनते हैं. उन्होंने आल्हा गाकर आल्हा गायकी में महिलाओं का प्रवेश शुरू करवा दिया. अब उन्हें सुनकर कई महिलाएं आल्हा गाने लगी हैं.

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आज उनके पास एक पूरी टीम है जो उनके लिए काम करती है उनके पास तीन लेखक हैं जो उनके लिए लिखते हैं. एक पूरा ग्रुप है जो उनके साथ शो करने के लिए जाता है. उनके कई यूट्यूब चैनल हैं इनमें से एक चैनल के 14 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं. संजो का कहना है कि यह सफलता उन्होंने अपनी कोशिश से प्राप्त की है उनका कोई गॉड फादर नहीं था. वह कहती हैं कि अभी यह सिलसिला जारी है और वह इसे और ऊंचाइयों पर ले जाएंगी.