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छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड के मुख्य आरोपी प्रवीण सोनी को झटका, हाईकोर्ट से दूसरी जमानत अर्जी खारिज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ ने कहा पहली जमानत याचिका विस्तृत आदेश के साथ खारिज की गई थी. हिरासत की अवधि के अलावा परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

JABALPUR HIGH COURT
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : July 3, 2026 at 11:01 PM IST

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जबलपुर: छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड में 30 बच्चों की मौत को गंभीर मानते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी है. हाईकोर्ट जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ ने आरोपी के जमानत आवेदन को यह कहते हुए निरस्त किया कि पहली जमानत याचिका विस्तृत आदेश के साथ खारिज की गई थी. हिरासत की अवधि के अलावा परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

दूसरी जमानत याचिका में कहा गया था कि वह निर्दोष है, उसे झूठा फंसाया गया है

छिंदवाड़ा जहरीले सिरप कांड के मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी की तरफ से दायर दूसरी जमानत याचिका में कहा गया था कि वह निर्दोष है और उसे अपराध में झूठा फंसाया गया है. वह 5 अक्टूबर 2025 से हिरासत में है. पुलिस ने न्यायालय में चालान पेश कर दिया है. ट्रायल में समय लगेगा, जिसके कारण उसे नियमित जमानत का लाभ दिया जाए.

पूर्व में अपराध को गंभीर व संवेदनशील मानते हुए निरस्त किया था आवेदन

अदालत ने उनकी पत्नी सहित अन्य आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि चेतावनी के बावजूद दूषित सिरप लिखना और सबूत नष्ट करना लोक स्वास्थ्य के साथ गंभीर अपराध है.

आरोपी डॉक्टर को हर बोतल पर मिलता था 10 फीसदी कमीशन

पूर्व में हाईकोर्ट ने 30 बच्चों की मौत को गंभीर और संवेदनशील मामले हुए मुख्य आरोपी डॉ. प्रवीण सोनी, उनकी पत्नी सहित दो अन्य आरोपियों के जमानत आवेदन खारिज कर दिए थे. हाईकोर्ट जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल ने अपने आदेश में कहा था कि आरोपी को जमानत का लाभ दिया जाता है तो जनता का न्याय से भरोसा बहुत कम हो जाएगा.

कफ सिरप एक्शन के संबंध में जानकारी होने के बावजूद डॉक्टर कमीशन लेकर बच्चों को दूषित कफ सिरप प्रिस्क्राइब करता रहा. केन्द्र सरकार की तरफ से नोटिफिकेशन के बावजूद आवेदक ने चार साल से कम उम्र के बच्चों को फिक्स्ड डोज़ कंपाउंड सिरप दिया. आवेदक को कथित कफ सिरप लिखने पर हर बोतल पर 10 प्रतिशत कमीशन मिलता था और सह-आरोपी को हर बोतल पर 23 रुपये का फायदा होता था.