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शादीशुदा बेटी को है एक्सग्रेसिया और लीव इनकैशमेंट पाने का अधिकार, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

जबलपुर हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि शादीशुदा बेटी अगर मृतक पिता की कानूनी वारिस है, तो उसे अनुग्रह तथा अवकाश नगदीकरण की राशि पाने का पूरा अधिकार है.

Jabalpur High Court
जबलपुर हाईकोर्ट (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : February 25, 2026 at 7:05 AM IST

3 Min Read
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जबलपुर: पिता की मौत के बाद अनुग्रह तथा अवकाश नगदीकरण (Ex-gratia and Leave Encashment) की राशि प्रदान नहीं किये जाने को चुनौती देते हुए जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी थी.

मृतक की शादीशुदा बेटी को मिले अनुग्रह तथा अवकाश नगदीकरण की राशि

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक रूसिया तथा जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने याचिका की सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा है कि- "शादीशुदा बेटी मरने वाले की अकेली कानूनी वारिस है. अनुग्रह तथा अवकाश नगदीकरण की राशि मृतक कर्मचारी के कानूनी वारिसों को दी जानी चाहिए. युगलपीठ ने 60 दिनों में दोनों राशियों का भुगतान याचिकाकर्ता को करने के आदेश जारी किये हैं."

मृतक कर्मचारी की अकेली जिंदा कानूनी वारिस है याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता प्रसन्ना नामदेव की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि उनके पिता प्रभात कुमार नामदेव जिला न्यायालय नरसिंहपुर में ड्राइवर के पद पर पदस्थ थे. सेवा के दौरान 4 मई 2024 को उनकी मृत्यु हो गयी थी. याचिकाकर्ता मृतक कर्मचारी के अकेली जिंदा कानूनी वारिस है. पिता ने सर्विस रिकॉर्ड में उसे नॉमिनेट किया था. पिता की मौत के बाद उसने रिटायरमेंट और सर्विस बेनिफिट्स के सेटलमेंट करने का आवेदन दायर किया था. उसे नॉमिनी मानते हुए अन्य भुगतान कर दिये गये थे परन्तु अनुग्रह तथा अवकाश नकदीकरण का भुगतान करने से इंकार कर दिया.

शादीशुदा बेटी होने के कारण लाभ से किया वंचित

याचिका में कहा गया था कि शादीशुदा बेटी होने के कारण उसे उक्त लाभ प्रदान करने से इंकार किया गया है. जो प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है और भारत के संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है. जिसके कारण युक्त याचिका दायर की गयी है.

अनावेदकों का सरकार के 1972 के नोटिफिकेशन का हवाला

मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा 14 नवम्बर 1972 को जारी नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए अनावेदकों की तरफ से बताया गया कि अनुग्रह तथा अवकाश नगदीकरण की राशि मृतक सरकारी कर्मचारी के पति या पत्नी को प्रदान किया जायेगा. एक से अधिक पत्नी होने पर उनके बीच बराबर राशि बांटी जायेगी. मृतक सरकारी कर्मचारी का सबसे बड़ा बेटा तथा सबसे बड़ी अनमैरिड बेटी उक्त राशि की हकदार होगी. याचिकाकर्ता शादीशुदा है इसलिए उसके आवेदन को निरस्त किया गया है.

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युगलपीठ ने की 1972 के नोटिफिकेशन की कानूनी व्याख्या

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि "उक्त नियम मृतक कर्मचारी के कानूनी वारिसों के बीच झगड़े को सुलझाने के लिए बनाया गया है. नोटिफिकेशन में इस संबंध में कोई उल्लेख नहीं किया गया है कि अगर शादीशुदा बेटी के अलावा कोई वारिस नहीं है, तो अनुग्रह राशि किसे मिलेगी. इसका मतलब है कि अगर शादीशुदा बेटी मरने वाले की अकेली कानूनी वारिस है, तो उसे बाहर नहीं रखा गया है. कर्मचारी की मौत के बाद अनुग्रह राशि उसी दिन अंतिम संस्कार के लिए दी जाती है. इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि शादीशुदा बेटी इसका दावा नहीं कर सकती. मृतक कर्मचारी की अनुग्रह तथा अवकाश नकदीकरण की राशि उसके कानूनी वारिसों को दी जानी चाहिए. बिना इस बात पर ध्यान दिए कि वह शादीशुदा है या नहीं."