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पॉक्सो के तहत दोषी के साथ किया गया अन्याय, हाईकोर्ट ने स्पेशल जज, सरकारी वकील को जारी किया नोटिस

जबलपुर हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास के दोषी को किया बरी. रवि कोल ने विशेष न्यायालय की तरफ से सुनाई गई सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर की थी अपील.

JABALPUR HIGH COURT
जबलपुर हाईकोर्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर - IANS)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : January 4, 2026 at 10:57 PM IST

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Updated : January 4, 2026 at 11:03 PM IST

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जबलपुर: बोन टेस्ट में बालिग पाए जाने के बावजूद विशेष न्यायालय द्वारा पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित किए जाने को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है. हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस राम कुमार चौबे की युगलपीठ ने अपीलकर्ता को दोषमुक्त करते हुए संबंधित स्पेशल जज और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए उनसे स्पष्टीकरण मांगा है. युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि आरोपी के साथ अन्याय किया गया और उसे तीन साल अधिक समय तक जेल में रखा गया.

आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ रवि कोल ने हाईकोर्ट में दायर की थी अपील

पॉक्सो एक्ट में आजीवन कारावास की सजा से दंडित किये जाने के खिलाफ रवि कोल ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी. अपील में कहा गया था कि अभियोजन की कहानी के अनुसार माढोताल थाने में पीड़ित के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज हुई थी. पुलिस ने पीड़ित को उसके घर से बरामद किया था. उसके खिलाफ अपहरण, पॉक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज कर विशेष न्यायालय के समक्ष चालान पेश किया था.

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विशेष न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए उसे नवंबर 2023 में आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया था. अपील में कहा गया था कि कथित पीड़िता की उम्र का परीक्षण करने के लिए बोन टेस्ट करवाया गया था. बोन टेस्ट करने वाली महिला डॉक्टर ने न्यायालय में अपने बयान में बताया था कि बोन टेस्ट के अनुसार पीड़ित की उम्र 18 साल से अधिक थी. पीड़िता ने भी अपने बयान में कहा था कि उसने अपीलकर्ता के साथ मंदिर में अपनी मर्जी से विवाह किया था.

अभियोजन की तरफ से पेश की गई एक्स-रे रिपोर्ट लोक अभियोजक ने नहीं दिखाया

युगलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में कहा है कि अभियोजन की तरफ से एक्स-रे रिपोर्ट पेश की गई थी. जिसे लोक अभियोजक ने नहीं दिखाया और विशेष जज ने भी दस्तावेजों को नही देखा. विशेष न्यायाधीश ने धारा 311 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करना सही नहीं समझा. उनके द्वारा एक्स-रे फिल्म और रिपोर्ट पर और सबूत मांगे गए. जिसे जिला अस्पताल के रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर की तरफ पेश किया गया था.

पीड़िता बालिग थी और सहमति से संबंध स्थापित होने के कारण अपीलकर्ता को सजा से दंडित नहीं किया जा सकता था. अपीलकर्ता के साथ अन्याय किया गया और उसे तीन साल से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा. यह स्पेशल जज की तरफ से दिमागी बेइमानी की निशानी है. युगलपीठ ने अपीलकर्ता को दोषमुक्त करते हुए संबंधित विशेष न्यायाधीश व लोक अभियोजक की गलती के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

Last Updated : January 4, 2026 at 11:03 PM IST