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आपराधिक प्रकरण में दोषमुक्त होना विभागीय सजा खत्म होने का आधार नहीं : हाई कोर्ट

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बर्खास्त कांस्टेबल को नहीं दी राहत. कोर्ट से बरी होने के बाद नौकरी में बहाली की मांग.

Madhya Pradesh High Court
दोषमुक्त होना विभागीय सजा खत्म होने का आधार नहीं (ETV BHARAT)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : July 6, 2026 at 5:19 PM IST

3 Min Read
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जबलपुर : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अहम आदेश में कहा है "आपराधिक प्रकरण से दोषमुक्त होना विभागीय सजा खत्म होने का आधार नहीं है." जस्टिस दीपक खोत ने अपने आदेश में कहा "आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं. आपराधिक मुकदमे में अपराधी को उचित सज़ा दी जाती है. विभागीय जांच का मकसद दोषी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय व सर्विस नियमों के अनुसार कार्रवाई करना है." एकलपीठ ने इस आदेश के साथ बर्खास्त पुलिस आरक्षक की याचिका खारिज कर दी.

ऑटो में सवार महिला को चाकू दिखा धमकाया

याचिकाकर्ता रामपाल अहिरवार ने याचिका में कहा "वह रीवा पुलिस लाइन में आरक्षक के पद पर पदस्थ था. उस पर आरोप था कि 10 जुलाई 2017 की दोपहर ऑटो में सवार पीड़िता ने स्कॉर्फ हटाने से मना किया तो उसने चाकू दिखाकर उसे धमकाया. पीड़िता की शिकायत पर उसके खिलाफ सिविल लाइन्स पुलिस स्टेशन में धारा 294, 323, 506 और आर्म्स एक्ट धारा के तहत प्रकरण दर्ज किया गया. इस घटना के कारण उसके खिलाफ विभागीय जांच प्रारंभ हुई."

आरोप सही मिलने पर बर्खास्तगी

विभागीय जांच के दौरान उसकी तरफ से नोटिस का जवाब भी प्रस्तुत किया गया. विभागीय जांच में आरोप को सही पाते हुए 2018 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया गया कि आपराधिक प्रकरण में उसे दोषमुक्त कर दिया गया है. आपराधिक प्रकरण दर्ज होने पर विभागीय जांच प्रारंभ की गयी थी, उसमें वह दोषमुक्त हो गया है. इसलिए विभागीय जांच में पारित सज़ा के आदेश को रद्द किया जाना चाहिए.

संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त

सरकार की तरफ से याचिका का विरोध करते हुए एकलपीठ को बताया गया "न्यायालय ने याचिकाकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया है. विभागीय जांच और आपराधिक प्रकरण की कार्रवाई में फैसला करने का सिद्धांत अलग-अलग है. विभागीय जांच में संभावनाओं की अधिकता पर आधारित है और आपराधिक प्रकरण में सख्त सबूत आवश्यक है." एकलपीठ ने आपराधिक प्रकरण व विभागीय जांच का अवलोकन करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता ने विभागीय जांच के दौरान याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता महिला से खुद जिरह की थी. उसने साफतौर पर कहा था कि वह अपराध करने में शामिल था.

महिला ने आरोपी को पहचानने से किया इंकार

शिकायतकर्ता न्यायालय में अपने बयान से मुकर गयी और उसने याचिकाकर्ता को पहचाने से इंकार कर दिया. एकलपीठ ने आदेश में कहा है "विभागीय जांच में आरोप है कि याचिकाकर्ता अनुशासित बल का सदस्य है और अपनी ड्यूटी के दौरान गंभीर कदाचार किया है. अपनी आधिकारिक वर्दी में उसने ऐसा अपराध किया है. आपराधिक प्रकरण में उसके खिलाफ धारा 294, 323 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था."