जबलपुर में बॉल से नहीं डंडे से लोग उड़ा रहे गिल्ली, जीतने वाली टीम को मिलेगा हजारों का नगद इनाम
परंपरागत खेलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जिला पंचायत ने चुना गिल्ली-डंडा का खेल. डिस्ट्रिक्ट लेवल ट्रॉफी में 70 टीमें शामिल.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 21, 2026 at 8:35 PM IST
जबलपुर: आजकल क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, वॉलीबॉल और मोबाइल गेम की वजह से बच्चे और युवा परंपरागत खेलों से दूर होते जा रहे हैं. इसी के चलते जबलपुर में जिला पंचायत ने अनोखा आयोजन रखा है, जिसमें बच्चों और युवाओं को परंपरागत खेलों से जोड़ने के लिए गिल्ली-डंडा की प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है. इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए लगभग 500 युवाओं ने अलग-अलग गांव से रुचि दिखाई है. इस खेल का अंतिम आयोजन जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में किया जाएगा.
जिला पंचायत आयोजित करा रही गिल्ली-डंडा का खेल
राज्य सरकार परंपरागत खेलों का विकास करना चाहती है. जबलपुर जिले में परंपरागत खेलों की सूची में से गिल्ली-डंडा को चयनित किया गया है. इस खेल का आयोजन जिला पंचायत जबलपुर करा रही है.
जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गहलोत ने बताया कि "हमारे पास कई दूसरे विकल्प थे लेकिन हमने गिल्ली-डंडा को ही परंपरागत खेलों के आयोजन के लिए चुना है. सबसे पहले गिल्ली-डंडा खेल के नियम बनाए. इसके लिए क्रिकेट की ही तरह 2 टीमें शामिल होती हैं. एक टीम में 5 सदस्य होते हैं और एक मैनेजर और एक कोच भी बनाया जाता है. पहले एक टीम को गिल्ली को मारने का का मौका दिया जाता है और दूसरा पक्ष इसकी फील्डिंग करता है फिर यही मौका दूसरे को मिलता है."
गिल्ली-डंडा के खेल में 70 टीमें शामिल
जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गहलोत का कहना है कि "हमने हर क्लस्टर में टीम बनवाने के लिए गांव में सूचना दी थी. हमें अंदाज नहीं था कि इतने अधिक लोग इस खेल में रुचि दिखाएंगे. 500 से ज्यादा लोगों ने रुचि दिखाई और देखते ही देखते 70 टीम बन गईं और पहले हम सभी टीमों का क्लस्टर के स्तर पर मैच करवा रहे हैं. यह सभी मैच जबलपुर, पनागर, कुडम और सिहोरा में आयोजित किए जा रहे हैं. इनका फाइनल जबलपुर के कृषि विश्वविद्यालय में फरवरी के अंत या मार्च के पहले सप्ताह में किया जाएगा."

जीतने वाली टीम को मिलेगा इनाम
भारत के परंपरागत खेल गिल्ली-डंडा, कबड्डी, खो-खो, कुश्ती जैसे कई केल विदेशी खेलों की वजह से गुम होते जा रहे हैं. इसलिए लोगों को परंपरागत खेलों से जोड़े रखने के लिए शासन स्तर पर पहल की जा रही है. इस आयोजन में जीतने वाली टीमों को इनाम भी दिया जाएगा. पहले स्थान पर आने वाली टीम को 21000 रुपए और अच्छा प्रदर्शन करने वाली टीमों को कम से कम 1100 रुपए की राशि प्रदान की जाएगी.
- रतलाम में पतंग नहीं गिल्ली-डंडे वाली मकर संक्रांति, मालवा की अनूठी परंपरा
- अशोकनगर में क्रिकेट छोड़ ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खेला गिल्ली-डंडा, खिलाड़ियों के छुड़ा दिए छक्के
पहली पंसद होता था गिल्ली-डंडा का खेल
आज से लगभग 20 साल पहले ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में लोगों का सबसे पहला खेल गिल्ली-डंडा हुआ करता था. यह बेहद सस्ता और सुलभ खेल था. जिसमें लकड़ी की एक छोटी सी गिल्ली बनाई जाती है और एक सामान्य लकड़ी के डंडे की मदद से इसे खेला जाता है. इस खेल में जिसकी गिल्ली जितनी दूर तक जाती थी वह इस खेल का विजेता होता था. हालांकि उस समय तक ना तो उसकी प्रतियोगिताएं होती थी और ना ही इसके कोई नियम थे.

