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ईरान का शहजादा मिर्जा मुराद शाह, जिसकी जमीन पर बना है बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल PMCH

क्या आपको पता है PMCH का ईरान से है गहरा नाता?. इतिहास को खंगालती पटना से रंजीत कुमार की रोचक खबर पढ़ें.

MIRZA MURAD SAFVI OF IRAN
मिर्जा मुराद सफवी की मजार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : May 2, 2026 at 7:13 PM IST

10 Min Read
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पटना: बिहार की राजधानी पटना स्थित पीएमसीएच (पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल) अपने आप में कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है. 1925 में स्थापित इस अस्पताल में आज भी एक ईरानी राजकुमार की मजार पर लोग माथा टेकने आते हैं, जिनका नाम है मिर्जा मुराद सफवी. ईरान के इस राजकुमार मिर्ज़ा मुराद ने पटना में क्या कुछ किया और उन्होंने अपनी आखिरी आरामगाह के लिए गंगा के किनारे बसे शहर पटना को ही क्यों चुना?.

PMCH में ईरान के शहजादे की मजार : दरअसल मिर्जा मुराद सफवी के पिता मिर्ज़ा रुस्तम सफ़वी ने मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में बिहार के आखिरी गवर्नर के तौर पर मुगल सल्तनत की सेवा की थी. उन्हीं के सबसे बड़े बेटे मिर्ज़ा मुराद सफवी ने पटना को कर्मभूमि बनाया और गंगा नदी के किनारे एक शानदार हवेली बनवाई. उनकी मज़ार आज भी पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के परिसर में मौजूद है. साथ ही पटना में एक इलाके का नाम मुरादपुर उन्हीं के सम्मान में रखा गया है.

देखें रिपोर्ट (ETV Bharat)

जहांगीर ने दी इल्तिफात खान की उपाधि: मिर्जा मुराद सफवी के दादा इस्माइल शाह ने ही ईरान में सफवी डायनेस्टी की नींव रखी थी. मुराद सफवी के पिता मिर्जा रूस्तम सफवी लगभग 500 साल पहले ईरान से भारत आए थे. मुगल काल में वह बिहार के सूबेदार हुआ करते थे.

वहीं मुराद सफवी जहांगीर(1605-27) और शाहजहां (1627-58) के दरबार में काम करते थे. यहां तक कि मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में मिर्ज़ा मुराद सफवी को “इल्तिफ़ात ख़ान” की उपाधि से नवाजा गया था.

फकीरी के चलते छोड़ दी राजशाही: कहा जाता है कि मिर्जा मुराद सफवी ने देवत्व हासिल करने के लिए राजशाही छोड़ दी थी. उन्हें महसूस हुआ कि अल्लाह को सत्ता के रास्ते हासिल नहीं किया जा सकता. बल्कि फकीरी के जरिए ही अल्लाह आपके करीब आते हैं. इसी सोच को लेकर मिर्जा मुराद शाह ने राजशाही छोड़कर फकीरी को अपना लिया था.

24 घंटे अल्लाह की इबादत करते थे: वर्तमान समय में मिर्जा मुराद सफवी की मजार के केयर टेकर सैयद मोहम्मद शमीम अख्तर कहते हैं कि मिर्जा मुराद शफवी ने अल्लाह की इबादत के लिए राजशाही छोड़ दी थी. वह 24 घंटे अल्लाह की इबादत करते थे. बाद में उन्हें सफा हासिल हो गयी, वह जिस किसी को छू देते थे उसकी बीमारी ठीक हो जाती थी. उनके आशीर्वाद से लोगों की मनोकामनाएं पूरी हो जाया करती थी.

एक ठेकेदार ने बनवाई मजार: शमीम अख्तर के मुताबिक पहले यह मजार इस रूप में नहीं थी. मेरे पिता बताते थे कि पहले मजार मिट्टी का ढेर हुआ करता था. लगभग अस्सी साल पहले की बात है, उस दौरान पटना में जी एन वर्मा नाम के एक ठेकेदार हुआ करते थे. उनका नवजात शिशु कोमा में चला गया था.

MIRZA MURAD SAFVI OF IRAN
पीएमसीएच परिसर में मौजूद मजार (ETV Bharat)

बच्चे की जिंदगी बच गई और.. मजार का निर्माण: बच्चे की जिंदगी की दुआ लेकर वे मजार पर आए और बच्चे की जान बच गई. शमीम अख्तर बताते हैं कि उस घटना के बाद ही वर्मा साहब ने भव्य रूप में मजार का निर्माण कराया.

मजार के चमत्कार की कई कहानियां: मजार के चमत्कार की ऐसी कई कहानियां है. उनमें से एक है अशोक महाजन की कहानी. अशोक महाजन पटना के अशोक राजपथ पर स्पोर्ट्स आइटम की दुकान चलाते हैं. वर्ष 1987 में अचानक उनके छोटे भाई की तबीयत खराब हो गई. उन्होंने भाई को पीएमसीएच के हथुआ वार्ड में भर्ती कराया. लेकिन स्थिति बिगड़ती गई और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया.

40 साल से मजार पर रोज आते हैं अशोक : शमीम अख्तर बताते हैं कि, इसके बाद जो हुआ वो शायद आपको मेडिकल साइंस और तार्किक नजरिए से सही न लगे. लेकिन आस्था के आगे मेडिकल साइंस ने घुटने टेक दिए.

दरअसल डॉक्टरों से निराश अशोक महाजन की नजर मिर्जा मुराद सफवी की मजार पर पड़ी. उन्होंने मजार पर सर झुकाया, दुआ मांगी कहते हैं हजरत मिर्जा मुराद सफवी की मेहरबानी से उनकी भाई की जिंदगी बच गई. तब से अशोक महाजन हर रोज मजार पर सर झुकाने आते हैं. 40 साल से ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है.

मजार पर पहुंचे और सब ठीक हो गया: ऐसे ही एक और शख्स हैं मुकेश कुमार जो जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे थे. उनके आठ साल का बच्चा लगभग 3 महीने से पीएमसीएच में भर्ती था. यूरिन डिस्चार्ज नहीं होने के चलते पूरा परिवार संकट के दौर से गुजर रहा था. मुकेश भी अशोक की ही तरह हजरत मिर्जा मुराद शाह की मजार पर पहुंचे और फिर सब ठीक हो गया. मुकेश मानते हैं कि हजरत मिर्जा मुराद शाह की कृपा से ही उनके बच्चे की जान बच पाई.

MIRZA MURAD SAFVI OF IRAN
मजार पर इबादत करते लोग (ETV Bharat)

500 साल पहले ईरान से भारत आए: इतिहास के जानकार मोहम्मद उमर अशरफ बताते हैं कि मिर्जा मुराद सफवी के पिता मिर्जा रूस्तम सफवी लगभग 500 साल पहले ईरान से भारत आए थे. मुगलों से उन्होंने वैवाहिक संबंध बनाए. मिर्जा मुराद सफ़वी की शादी अब्दुल रहीम खानखाना के बेटी से हुई थी.

अब्दुल रहीम खान-ए-खाना अकबर और जहांगीर दोनों के दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके थे. मुग़लकालीन इतिहास की चर्चित कृति मआसिरुल उमरा में इन सभी बातों का उल्लेख है कि मिर्ज़ा मुराद सफवी का संबंध एक प्रतिष्ठित और प्रभावशाली परिवार से था. औरंगजेब के ससुर सरफराज खान मिर्जा मुराद सफवी के भाई थे.

बड़ी संख्या में अधीन थे सैनिक: मुग़ल प्रशासन की रीढ़ मानी जाने वाली मनसबदारी व्यवस्था में भी मिर्ज़ा मुराद को 2000 का मनसब और 800 घुड़सवारों की जिम्मेदारी दी गई थी. यह रैंक किसी साधारण दरबारी को नहीं मिलती थी. इतनी बड़ी जिम्मेदारी का मतलब था कि वे न सिर्फ प्रशासनिक बल्कि सैन्य दृष्टि से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे. उनके अधीन बड़ी संख्या में सैनिक थे.

शाहजहां के दौर में लिया बड़ा फैसला: सत्ता और प्रभाव के इस शिखर पर पहुंचने के बाद मिर्ज़ा मुराद सफवी ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने सबको चौंका दिया. सफवी ने शाहजहां के शासनकाल के 16वें वर्ष में मुगल दरबार से इस्तीफा दे दिया और फकीरी की राह पर चल पड़े. दरबार छोड़ने के बाद मिर्ज़ा मुराद सफवी को सालाना 40,000 रुपये की पेंशन मंजूर हुई. मुगल दरबार छोड़ने के बाद वे पटना चले आए और यही रहने लगे. अतीत में वह इलाका मुराद शाह का बाग भी कहलाता था.

इतिहासकार करते हैं तथ्यों की पुष्टि: इतिहासकार प्रोफेसर डॉ इम्तियाज अहमद भी इन तथ्यों की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि मुगल काल में ईरान के साथ भारत के गहरे रिश्ते थे. ईरान के साथ मुगलों का वाणिज्य और व्यापार भी चलता था. जहांगीर ने मिर्जा मुराद सफवी को 'इल्तिफ़ात खान' की उपाधि दी थी. मिर्जा मुराद के भाई मिर्जा नौजर पटना सिटी इलाके में रहते थे और वहां उनका भी मजार है उस इलाके को नौजर का कटरा भी कहते हैं.

बिहार को जन्नते उल हिंद की संज्ञा: डॉ अहमद आगे कहते हैं कि जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल में दो ईरानी यात्री आते हैं. पहले अब्दुल लतीफ और फिर मोहम्मद सदीक. ये दोनों ने बिहार की यात्रा की और बिहार के बारे में बहुत कुछ लिखा है. इनके मुताबिक बिहार में बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक बसे हैं. 18 वीं सदी के अंत में एक और ईरानी यात्री और बिहार आते हैं और बिहार को जन्नते उल हिंद की संज्ञा देते हैं.

इसका मतलब है कि हिंद का स्वर्ग बिहार को कहा गया. ईरानी यात्री कहते हैं कि उसे दौर में गंगा का पानी बहुत स्वच्छ हुआ करता था और इसके कई तरह के फायदे थे. हिंदुस्तान में बिहार एक ऐसी जगह थी जहां सबसे अधिक संख्या में ईरानी बसे हुए थे.

पीएमसीएच मिर्जा मुराद सफवी की देन: डॉ इम्तियाज अहमद बताते हैं कि बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल पीएमसीएच मिर्जा मुराद सफवी की देन है. दरअसल मिर्जामुराद की हवेली भी उसी जगह पर हुआ करती थी वे वहीं रहते थे जहां आज अस्पताल है. डॉ अहमद के मुताबिक जब मिर्जा मुराद का इंतकाल हो गया तब उन्हें वहीं दफन किया गया और परिजनों ने अस्पताल के लिए वह जमीन सरकार को दे दी.

अस्पताल को मिर्जा मुराद की कोठी में किया गया शिफ़्ट: उन्होंने आगे बताया, 1857 आंदोलन के बाद बंगाल की सरकार ने पटना में एक स्वास्थ्य संस्थान खोलने का फैसला लिया. सरकार को सोच थी कि पटना में अस्पताल बन जाने पर कलकत्ता मेडिकल स्कूल पर बोझ कम होगा.

इसके बाद 1874 में बांकीपुर डिस्पेंसरी खोली गई जो आज भी बी एन कॉलेज परिसर में संचालित है. बीते वक्त के साथ अस्पताल को टेंपल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन कहा गया.यहीं अस्पताल बाद में पीएमसीएच कहलाया. एक साल बाद 1875 में जगह की कमी के चलते अस्पताल को मिर्जा मुराद सफवी की कोठी में शिफ़्ट कर दिया गया.

ब्रिटिश वास्तुविद ने किया निर्माण: शोधकर्ता और लेखक अरुण सिंह बताते हैं कि 18 वीं सदी की शुरुआत में मुराद कोठी का मालिकाना हक ईस्ट इंडिया कंपनी के पास आ गया था. बाद में किसी रईस ने मुराद कोठी खरीद ली. जब टेंपल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन को यहां स्थानांतरित करने की योजना बनी तब उस संपत्ति को जुलाई 1875 में ₹28000 में खरीद लिया गया. इसके बाद 1877 में टेंपल स्कूल आफ मेडिसिन के लिए एक नई इमारत का निर्माण ब्रिटिश वास्तुविद मेजर चार्ल्स मैट ने किया.

भारत को लेकर ईरान का रुख सकारात्मक: वर्तमान परिदृश्य में जब ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध में फंसा है. अमेरिका-इजरायल के साथ उसके रिश्तों की तल्खी से पूरे विश्व में तेल को लेकर हाहाकार मचा है. लेकिन इन विषम परिस्थितियों में भारत को लेकर ईरान का रुख सकारात्मक है. भारत की ओर आने वाले तेल टैंकर सहजता से होर्मुज स्ट्रेट से आवागमन कर रहे हैं. भारत और ईरान के बीच अतीत में भी रिश्ते बेहतर रहे हैं और मौजूदा समय में भी वो बेहतर बने हुए हैं.

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