बाल विवाह करने से इंकार.. पढ़ाई से जोड़ा नाता, पटना की दो बेटियों ने अपने हाथों बदली अपनी किस्मत
पटना की दो बेटियों ने खुद की बदौलत अपनी किस्मत बदली है. उनकी सफलता से महादलित बस्ती में शिक्षा की अलख जग दी है. पढ़ें..

Published : June 1, 2026 at 2:31 PM IST
पटना: बाल विवाह से इंकार कर शिक्षा को चुना, आज नतीजा सामने है. पटना की राधा और सीमा और समाज के लिए मिसाल बन गई है. एक समय था, जब महादलित बस्तियों में बेटियों की जिंदगी का फैसला उनकी उम्र नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराएं तय करती थीं. कम उम्र में शादी, पढ़ाई से दूरी और सपनों का दम घुट जाना यहां आम बात थी लेकिन इन दोनों ने इस सोच को चुनौती दी. उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया, परिवार और समाज के दबाव के सामने झुकने से इनकार किया और शिक्षा को अपना रास्ता बनाया.
मुर्गियाचक की राधा ने दिखाई हिम्मत: फुलवारी शरीफ प्रखंड के रामपुर फरीदपुर पंचायत स्थित मुर्गियाचक गांव की राधा कुमारी ने पढ़ाई के लिए एक तरीके से परिवार से ही 'बगावत' कर दी. राधा ने मैट्रिक परीक्षा में 83.6 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. इतने अच्छे परिणाम के बावजूद आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण परिवार ने उनकी शादी तय कर दी लेकिन राधा पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहती थीं. उनका सपना इंजीनियर बनने का है. उन्होंने भी सामाजिक सहयोग के माध्यम से अपनी शादी रुकवाई और आगे की पढ़ाई जारी रखी.
संस्था की मदद से शादी रुकी: राधा बताती हैं कि वह आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं और इसलिए इंटरमीडिएट में विज्ञान संकाय चुना है. बाल मित्र संस्था ने उनकी पढ़ाई का खर्च उठाया, जिससे परिवार की चिंता कम हुई और आज वह नियमित रूप से स्कूल और कोचिंग जा रही हैं. शादी रुकवाने में संस्था ने उनकी बहुत मदद की. आज उनका लक्ष्य सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई पूरी कर एक सफल इंजीनियर बनना है. पढ़ाई के अलावे पेंटिंग का भी शौक है और यह उनकी पसंदीदा गतिविधि है.
"मैं पढ़ना चाहती थी लेकिन माता-पिता गरीबी के कारण शादी कर देना चाहते थे. संस्था से मदद मिली. हालांकि पिताजी राजी नहीं हो रहे थे लेकिन काफी मान मनौव्वल करना पड़ा. मैं इंजीनियर बनना चाहती हूं."- राधा कुमारी, इंटरमीडिएट छात्रा
अब बेटी के फैसले से मां भी खुश: राधा की मां रीता देवी भले ही आर्थिक तंगी के कारण बेटी की पढ़ाई छुड़वाकर शादी कराना चाहती थीं लेकिन आज वह इस फैसले से खुश हैं. वह कहती हैं, 'गरीबी के कारण मैंने बेटी की शादी करने का फैसला लिया था. अब जब संस्था पढ़ाई में सहयोग कर रही है तो कोई चिंता नहीं है. मैं चाहती हूं कि बेटी जितना पढ़ना चाहे, उतना पढ़े.'

घर टूटने का सता रहा डर: रीता देवी ने बताया कि अब बेटी को दूसरों के खेतों में मजदूरी करने नहीं भेजा जाता और परिवार पूरी तरह उसकी शिक्षा के समर्थन में खड़ा है. राधा का मकान एक कमरे का है लेकिन दो मंजिला है और यह सरकारी जमीन पर है. राधा को डर है कि अभी सरकारी जमीनों से अतिक्रमण हटाने के नाम पर कहीं उनका घर ना उजाड़ जाए. राधा के घर में शौचालय नहीं है.
शादी से इंकार कर शिक्षा को अपनाया: इसी तरह फुलवारी शरीफ प्रखंड के कुरकुरी पंचायत स्थित ढिबड़ा गांव की रहने वाली सीमा कुमारी आज अपने इलाके में प्रेरणा का नाम बन चुकी हैं. महादलित बस्ती की सीमा ने एक वर्ष पहले उस समय साहसिक फैसला लिया था, जब उनका परिवार उनकी शादी कराने की तैयारी कर रहा था. उस समय वह नाबालिग थीं और पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं. परिवार आर्थिक तंगी और सामाजिक दबाव के कारण शादी कराने पर अड़ा हुआ था लेकिन सीमा ने हार नहीं मानी. उन्होंने सामाजिक संगठनों से मदद मांगी और अंततः बाल विवाह रुक गया.

'मां किताब-कॉपी फाड़ देती थी': ईटीवी भारत से बातचीत में सीमा ने बताया कि पढ़ाई की राह उनके लिए कभी आसान नहीं रही. दसवीं तक उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता था. जब वह किताब लेकर बैठती थीं तो कई बार उनकी मां किताब फेंक देती थीं और कॉपियां तक फाड़ देती थीं. बावजूद इसके वह फटे हुए पन्नों को जोड़कर पढ़ाई करती रहीं. पढ़ाई के प्रति उनका जुनून इतना था कि तमाम बाधाओं के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को मरने नहीं दिया. कई बार पढ़ाई करने के कारण उन्हें डांट और मार भी सहनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.
"दसवीं पास करने के बाद परिवार ने मेरी शादी एक ऐसे युवक से तय कर दी, जो मजदूरी करता था. पता चला कि युवक नशे का आदी है और उसका व्यवहार भी ठीक नहीं है. परिवार को भी इसकी जानकारी थी, लेकिन गरीबी और सामाजिक दबाव के कारण शादी कराने की तैयारी जारी थी. इसी दौरान गांव में बच्चों का आधार कार्ड बनाने के लिए अभियान चलाया गया. अभियान के दौरान बाल मित्र संस्था से जुड़े मनीष कुमार घर पहुंचे तो मैंने उनसे अपनी समस्या साझा की और बताया कि वह शादी नहीं करना चाहतीं."- सीमा कुमारी, स्नातक छात्रा
बाद बाल मित्र संस्था ने की मदद: बाद बाल मित्र संस्था और मनीष कुमार ने सीमा के परिवार को समझाया. परिवार का कहना था कि वे आगे की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते. ऐसे में संस्था ने उनकी पढ़ाई की जिम्मेदारी ली. उनके 10 महीने के बकाया ट्यूशन फीस का भुगतान किया गया और आगे की पढ़ाई में भी सहयोग मिला. सीमा ने महज चार महीने की नियमित कोचिंग और कड़ी मेहनत के बल पर इस वर्ष इंटरमीडिएट कला संकाय में 74 प्रतिशत अंक हासिल किए. वह अपने गांव और बस्ती की पहली लड़की बनीं जिसने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की.
सीमा की कामयाबी ने सोच बदली: सीमा की सफलता ने पूरे इलाके की सोच बदल दी है. परीक्षा परिणाम आने के बाद उन्हें कई मंचों पर सम्मानित किया गया. समाज के वे लोग जो कभी उनकी पढ़ाई का मजाक उड़ाते थे, आज उनकी तारीफ करते हैं. बीते दिनों पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से भी सम्मान मिला. सीमा बताती हैं कि अब आसपास के परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे हैं. वह स्वयं छोटे बच्चों का आंगनबाड़ी और सरकारी स्कूलों में नामांकन करवाने में मदद करती हैं. इतना ही नहीं, आसपास के 30 से 40 घरों के बच्चों को वह मुफ्त में पढ़ाती भी हैं.

आसपास में बच्चियां पढ़ने लगी: सीमा कहती हैं कि आज भी कई परिवार ऐसे हैं जो बेटियों को पढ़ने नहीं देते और कम उम्र में शादी कर देते हैं. उनकी अपनी बड़ी बहन की भी कम उम्र में शादी हुई थी लेकिन अब जब भी आसपास कहीं बाल विवाह की जानकारी मिलती है तो वह उसे रुकवाने की कोशिश करती हैं. जरूरत पड़ने पर बाल मित्र संस्था को सूचना देती हैं और कई मामलों में विवाह रुकवाने में सफलता भी मिली है. हालांकि कुछ घटनाएं अब भी होती हैं.
शिक्षक बनना चाहती है सीमा: भविष्य को लेकर सीमा के सपने भी बड़े हैं. वह उच्च शिक्षा प्राप्त कर सरकारी शिक्षक बनना चाहती हैं. उनका मानना है कि शिक्षा की कमी ही उनके समाज में बाल विवाह जैसी कुरीतियों की सबसे बड़ी वजह है. मजदूरी करने वाले पिता की बेटी सीमा पांच भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर हैं. उन्होंने इस वर्ष सीयूईटी की परीक्षा भी दी है. पहली बार कंप्यूटर आधारित परीक्षा देने के अनुभव को वह अपने जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव मानती हैं.
साथ ही उन्होंने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में नामांकन के लिए आवेदन भी किया है. संस्था की मदद से वह कंप्यूटर सीख रही हैं और सिलाई-कढ़ाई का काम भी जानती हैं. इतना ही नहीं, वह अपनी मां और आसपास की महिलाओं को भी साक्षर बनाने की कोशिश कर रही हैं.

क्या बोली मां?: सीमा की मां विमला देवी स्वीकार करती हैं कि आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने बेटी की शादी तय कर दी थी. उन्होंने यह भी कहा कि वह जानती थी कि लड़के को नशे की लत है. पढ़ाई के खर्च और समाज के दबाव के बीच उन्हें यही रास्ता सही लगा था. यहां तक कि शादी के लिए कर्ज लेने की भी तैयारी हो गई थी लेकिन संस्था के हस्तक्षेप और समझाइश के बाद उनकी सोच बदली.
"बेटी पहले आत्मनिर्भर बनेगी और उसके बाद ही उसकी शादी होगी. अब वह उसकी किताब कॉपी को अच्छे से रखती हैं, जबकि पहले उसके पुस्तकों को फाड़ देती थी. हालांकि, अब भी जब बेटी पढ़ने जाती है तो समाज के कुछ लोग उन्हें कमेंट करते हैं लेकिन वह उसे अनसुना कर देती हैं."- विमला देवी, सीमा की मां
बाल मित्र संस्था की पहल का असर: वहीं, बाल मित्र संस्था से जुड़े मनीष कुमार बताते हैं कि सिविल कोर्ट की संस्था सालसा के निर्देश पर बच्चों को आधार कार्ड से जोड़ने के अभियान के दौरान उन्हें महादलित बस्तियों में कई ऐसे मामले मिले, जहां बच्चियां बाल विवाह का शिकार होने वाली थीं. संस्था ने हस्तक्षेप कर कई बच्चियों की पढ़ाई जारी रखने में मदद की.

"सीमा और राधा जैसी बेटियों की सफलता ने पूरे इलाके में सकारात्मक बदलाव की नींव रखी है. आज जिस बस्ती में शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता था, वहां बच्चे स्कूलों में नामांकन करा रहे हैं और परिवार पढ़ाई के महत्व को समझने लगे हैं."- मनीष कुमार, संयोजक, बाल मित्र संस्था
मनीष कुमार कहते हैं, 'आज हम अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस मना रहे हैं और भारत में शिक्षा का अधिकार कानून है. इसके तहत 15 वर्ष तक के बच्चे को स्कूल शिक्षा अनिवार्य है यानी की दसवीं तक की शिक्षा हर बच्चे के लिए जरूरी है लेकिन आज भी महादलित बस्तियों में बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से दूर हैं. जब तक यह बच्चे शिक्षा से जुड़ेंगे नहीं, हमारा राष्ट्र सशक्त राष्ट्र नहीं बन पाएगा.'
आज अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस: आज अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस है. इस अवसर पर बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और अधिकार को लेकर चर्चा होती है लेकिन आज भी ग्रामीण इलाकों में खासकर महादलित समाज में पढ़ाई पहली प्राथमिकता नहीं है. बेटियों की शिक्षा को लेकर बहुत कम माता-पिता गंभीर नजर आते हैं. एनएफएचएस 6 की हालिया रिपोर्ट के अनुसार बिहार में अभी भी बाल विवाह जैसी कुरीति है. शहरी क्षेत्र में जहां 20% वहीं ग्रामीण क्षेत्र में 36.3% बाल विवाह होते हैं.
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