उत्तराखंड में प्राइमरी स्कूलों में हो रही इंटर कॉलेज की पढ़ाई, जानिए पूरा मामला
उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था के दावों की पोल समय-समय पर खुलती रहती है. ऐसे ही एक और मामला सामने आया है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 19, 2026 at 1:29 PM IST
हरिद्वार/देहरादून: उत्तराखंड में यूं तो शिक्षा विभाग की बदहाली के कई उदाहरण हैं, लेकिन नया मामला कुछ ऐसे विद्यालयों को लेकर सामने आया है, जो इंटर कॉलेज होने के बावजूद प्राइमरी स्कूलों में संचालित हो रहे हैं. इसे दूसरे शब्दों में कहें तो उत्तराखंड के प्राइमरी स्कूलों में इंटर कॉलेज की पढ़ाई कराई जा रही है. हालांकि इसके पीछे भी विभाग अपनी कुछ मजबूरियां बता रहा है.
उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नया मामला सामने आया है, जिसने विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को उजागर कर दिया है. मामला हरिद्वार जनपद का है, जहां इंटर कॉलेज स्तर के विद्यालयों का संचालन प्राइमरी स्कूलों के भवनों में किया जा रहा है.
प्राइमरी स्कूल के भवन में पढ़ने को मजबूर छात्र: सुनने में यह अजीब जरूर लगता है, लेकिन यह पूरी तरह सच है कि जिन विद्यालयों को इंटर कॉलेज का दर्जा मिला हुआ है, वो आज भी अपने भवन के अभाव में प्राथमिक विद्यालयों में संचालित हो रहे हैं. साफ कर दें कि यहां प्राथमिक स्तर की पढ़ाई नहीं कराई जा रही, बल्कि इंटर कॉलेज के छात्र-छात्राएं प्राइमरी स्कूल के भवन में पढ़ने को मजबूर हैं.
इंटर कॉलेजों के पास अपना स्वतंत्र भवन ही नहीं: दरअसल, संबंधित इंटर कॉलेजों के पास अपना स्वतंत्र भवन ही नहीं है. भवन निर्माण के लिए जमीन उपलब्ध न होने के कारण विद्यालय प्रबंधन को अस्थायी तौर पर प्राथमिक विद्यालयों के कमरों में कक्षाएं संचालित करनी पड़ रही हैं.
मैदानी जिले में इस तरह की स्थिति हैरान करने वाली: खास बात यह है कि इनमें एक बालिका इंटर कॉलेज भी शामिल है. यानी छात्राओं को भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में ऐसे वातावरण में पढ़ाई करनी पड़ रही है, जो इंटर स्तर की शिक्षा के अनुरूप नहीं माना जा सकता. हरिद्वार जैसे जिले में जो भौगोलिक और संसाधनों की दृष्टि से अपेक्षाकृत सुलभ माना जाता है, इस तरह की स्थिति सामने आना कई सवाल खड़े करता है.
शिक्षा महानिदेशक का बयान: इस पूरे मामले पर जब ईटीवी भारत ने शिक्षा महानिदेशक दीप्ति सिंह से बातचीत की तो उन्होंने स्वीकार किया कि हरिद्वार जनपद में ऐसे चार इंटर कॉलेज हैं, जो वर्तमान में प्राथमिक विद्यालयों के भवनों में संचालित हो रहे हैं. उन्होंने बताया कि इन विद्यालयों के लिए जमीन की उपलब्धता नहीं हो पाने के कारण भवन निर्माण लंबित है. विभाग अब जिलाधिकारी के साथ समन्वय स्थापित कर इन विद्यालयों के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास कर रहा है.
सिस्टम पर सवाल खड़े होना लाजमी: यहां सवाल केवल जमीन का नहीं, बल्कि प्राथमिकता का भी है. शिक्षा विभाग के लिए हर साल करीब 12 हजार करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया जाता है. इस बजट में वेतन, योजनाएं, आधारभूत ढांचा और अन्य खर्च शामिल होते हैं. बावजूद इसके इंटर कॉलेज स्तर के विद्यालयों को अपना भवन नहीं मिल पा रहा है, तो बजट प्रबंधन और योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
सरकार के दावों का क्या? राज्य सरकार और शिक्षा विभाग लगातार सरकारी विद्यालयों को हाईटेक बनाने के दावे करते रहे हैं. वर्चुअल क्लासेस, स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल बोर्ड और ऑनलाइन शिक्षण सुविधाओं पर जोर दिया जा रहा है. देहरादून में तो केंद्रीयकृत स्टूडियो भी तैयार किया गया है, जहां से विशेषज्ञ शिक्षक लाइव या रिकॉर्डेड माध्यम से छात्रों को पढ़ा सकते हैं. इन पहलों का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाना बताया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जहां एक ओर हाईटेक सुविधाओं की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ विद्यालय अभी तक अपने स्थायी भवन तक से वंचित हैं.
शिक्षा का समुचित वातावरण कैसे तैयार होगा? ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या तकनीकी सुविधाएं बुनियादी ढांचे की कमी की भरपाई कर सकती हैं, जब कक्षाओं के लिए पर्याप्त कमरे, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय या खेल मैदान उपलब्ध न हों, तो इंटर स्तर की शिक्षा का समुचित वातावरण कैसे तैयार होगा?
हरिद्वार जैसे जिले में यह स्थिति चिंताजनक है. यदि यहां इंटर कॉलेजों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में दिक्कत आ रही है, तो पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और चमोली जैसे पहाड़ी और दूरस्थ जिलों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है. इन क्षेत्रों में भौगोलिक चुनौतियां पहले से मौजूद हैं. ऐसे में भवन निर्माण और संसाधन उपलब्ध कराना और भी जटिल हो जाता है.
यह मामला उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में योजनाओं और जमीनी क्रियान्वयन के बीच के अंतर को उजागर करता है. विभाग की मजबूरियां अपनी जगह हो सकती हैं, लेकिन इंटर कॉलेज स्तर के विद्यालयों का सालों तक बिना अपने भवन के संचालन होना एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती को दिखाता है.
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