इंदौर में मोहिनीअट्टम और कथकली नृत्य का रोड शो, देशभर में अपनी संस्कृति प्रमोट कर रहा केरल
इंदौर में मोहिनीअट्टम और कथकली नृत्य का किया गया प्रदर्शन, पर्यटन और सांस्कृतिक विस्तार के लिए देशभर में केरल की नृत्य कला का मंचन.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 21, 2026 at 1:34 PM IST
इंदौर: किसी भी राज्य के विकास के लिए उसकी प्राकृतिक और पर्यटन संपदा के अलावा पारंपरिक और सांस्कृतिक विरासत का भी योगदान होता है. यही वजह है कि पर्यटन गतिविधियों के लिए चर्चित केरल राज्य अब अपनी आर्थिक उन्नति के लिए देश के अलग-अलग महानगरों में अपनी नृत्यकला और शास्त्र कला का प्रदर्शन कर रहा है. जिसे देखकर लोग केरल के पर्यटन के अलावा वहां के तरह-तरह के नृत्य और पहनावे की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू हो रहे हैं.
रोड शो के जरिए संस्कृति को प्रमोट कर रहा केरल
केरल में देवदासियों द्वारा किए जाने वाला मोहिनीअट्टम लोक नृत्य हो या फिर कथकली मयूर नृत्य और शस्त्रकला, इन सभी पारंपरिक नृत्य शैलियों का प्रदर्शन इन दिनो रोड शो के जरिए देश के विभिन्न महानगरों में किया जा रहा है. केरल पर्यटन विभाग ने अपने राज्य की पर्यटन गतिविधियों को प्रमोट करने के लिए इसे रोड शो के जरिए देश भर में प्रदर्शित करने का निर्णय लिया है. जिसमें शास्त्री नृत्य के अलावा केरल के सांस्कृतिक आकर्षण को प्रदर्शित किया जा रहा है.
पर्यटन और सांस्कृतिक विस्तार है उद्देश्य
हाल ही में इस तरह के अनूठे रोड शो चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता और लखनऊ में किए गए. इसके बाद अब इसका आयोजन इंदौर में किया गया है. केरल पर्यटन विभाग के लोक सूचना अधिकारी सजेश कुमार बताते हैं कि "केरल की पारंपरिक नृत्य शैली और सांस्कृतिक विरासत आज भी देश के विभिन्न राज्यों के लिए आकर्षण का केंद्र है. लोग इन्हें देखकर केरल के बारे में जान सकें, इसके लिए पहली बार प्रमुख सांस्कृतिक गतिविधियां रोड शो के जरिए लोगों को दिखाया जा रहा है. जिससे कि राज्य का पर्यटन और सांस्कृतिक विस्तार किया जा सके."
मोहिनीअट्टम
मोहिनीअट्टम नृत्यांगना सपना बताती हैं कि "16वीं शताब्दी में यह लोक नृत्य मंदिरों में देवदासियों की परंपरा से उत्पन्न हुआ. जिसमें देवदासी सुनहरी बॉर्डर वाली सफेद या वाइट साड़ी पहनकर सॉफ्ट मूवमेंट के साथ एक जैसी लय में शालीनता के साथ नृत्य करती थी. जिसमें हाथों की मुद्रा में सांकेतिक भाषाओं का उपयोग होता है, जो केरल कलामंडलम के योगदान से अब देशभर में प्रस्तुत किया जा रहा है."
कथकली नृत्य
400 साल पुराना केरल का यह क्लासिकल डांस रामायण महाभारत और पुराणों की कहानियां को अपने नृत्य में प्रस्तुत करता है. जिसे कथा का नाटक भी कहा जाता है. इसका प्रमुख हिस्सा इसका मेकअप है, जिसमें एक अनूठी भारी भरकम ड्रेस में मुख अभिनय के साथ चेहरे की भाव भंगिमा और आंखों की गति व मुद्रा के जरिए कहानी का प्रदर्शन किया जाता है. इस दौरान केरल के पारंपरिक वाद्य यंत्र चेनडा मद्दलम और चेन्गिला का उपयोग किया जाता है.
मयूर नृत्य या मयिलाट्टम
केरल का मयूर नृत्य या पीकॉक डांस, हिंदू मंदिरों में भगवान सुब्रमण्यम मुरूगन की पूजा के दौरान किया जाता है. जिसमें नर्तक मोर पंखों से सजी अनूठी पोशाक पहनकर नृत्य करते हैं. इस नृत्य शैली में कलाकार मोर की शारीरिक हरकतों और जीवंत चाल की नकल करते हैं. इस कला के दौरान कलाकार लकड़ी की ऊंची गेड़ी या स्टिल्ट्स पर खड़े होकर नृत्य करते हैं.
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दुनिया का सबसे पुराना मार्शल आर्ट कलारीपयट्टू
कलारीपयट्टू केरल की सबसे प्राचीन युद्ध कला है. जिसे पुराने दौर का मार्शल आर्ट भी कहा जाता है. 3000 साल पुरानी इस युद्ध कला को अखाड़े में सिखाया जाता है. जिसमें आत्मरक्षा तकनीक के साथ योग ध्यान और शारीरिक संतुलन पर विशेष ध्यान दिया जाता है.

