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प्रेम की पुण्यधरा पर प्रणय का पर्व भगोरिया, यहां होली पर चुने जाते हैं दूल्हा-दुल्हन

मध्य प्रदेश में आदिवासियों की अनोखी परंपरा, होली के मौके पर भगोरिया मेला में रंग लगाकर युवक और युवती जीतते हैं एक दूजे का दिल.

INDORE BHAGORIYA HOLI 2026
प्रेम की पुण्यधरा पर प्रणय का पर्व भगोरिया (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : February 28, 2026 at 10:34 PM IST

4 Min Read
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इंदौर: मध्य प्रदेश सहित देशभर में प्रणय पर्व के रूप में चर्चित भगोरिया होली के आगमन के साथ बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है. प्रदेश के आदिवासी अंचल में भगोरिया उत्साह और मस्ती के जितने रंग समेटे हुए हैं, उससे कहीं ज्यादा रोचक भी है. इस लोक त्यौहार में नव युगल जोड़े भगोरिया मेले की मस्ती में रंगकर जीवनसाथी चुनते हैं, वहीं बुजुर्ग एक दूसरे को होली की बधाई देते हैं.

भगोरिया नृत्य से लूटते हैं समा

भगोरिया मेला होली के 7 दिन पहले शुरू होता है और होलिका दहन तक जारी रहता है. प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार और बड़वानी सहित खरगोन जिले के विभिन्न ग्रामीण अंचलों में धूमधाम से मनाया जाता है. भगोरिया होली के अवसर पर साप्ताहिक हाट- बाजार मेले में तब्दील हो जाते हैं. इस दौरान आदिवासी अंचल के लोग अपनी परंपरागत वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ अलग-अलग झुंड में पहुंचते हैं. जो मेले के मुख्य आयोजन स्थल पर भगोरिया नृत्य करते हैं.

आदिवासी इलाकों में भगोरिया की धूम (ETV Bharat)

जीवनसाथी को तलाशने की परंपरा

इस दौरान बुजुर्ग जहां एक दूसरे को होली की शुभकामनाएं देते हैं. वहीं युवाओं की टोली अपने मनपसंद जीवनसाथी को तलाशती है. इसके लिए आदिवासी लड़के और लड़कियां बाकायदा मेले में सज-धज कर पहुंचती हैं और बड़ी संख्या में युवा भगोरिया नृत्य में झूमते हैं. इस दौरान वे अपनी जीवनसाथी को भी तलाशते हैं.

TRIBALS TRADITIONS FESTIVALS
भगोरिया मेले में चुने जाते हैं दूल्हा और दुल्हन (ETV Bharat)

पान खिलाकर संबंधों की औपचारिकता पूरी

इस दौरान अगर किसी युवा को युवती पसंद आ जाती है तो वह अपने परिजन को बोलकर शादी की बात चलाते हैं. जब युवती के परिजन भी इस पर सहमति दे देते हैं तो दापा (वधु मूल्य) की राशि तय की जाती है. उसके बाद दोनों ही पक्ष एक दूसरे को पान खिलाकर संबंधों की औपचारिकता पूरा करते हैं. इसके बाद परंपरागत तरीके से शादी संपन्न की जाती है.

अधिकतर शादी भगोरिया के मेले में होती है तय

तिरला के जनपद सदस्य गजराज सिंह बताया, "मैंने भी अपने जीवनसाथी को भगोरिया के मेले में ही चुना था. इसके बाद दोनों परिवारों के रिश्ते की बात चलाई और पान खिलाने की रस्म के साथ संबंध तय हुआ. आज भी आदिवासी समाज में 60% शादियां भगोरिया मेले में ही तय होती हैं."

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मध्य प्रदेश में आदिवासियों की अनोखी परंपरा (ETV Bharat)

लाखों रुपए चुकानी होती है दापा की राशि

आदिवासी समाज सेवी दयाराम ने बताया, "भील, भिलाला और अन्य आदिवासी समाज में लड़के-लड़कियों की शादी की चर्चा भगोरिया से शुरु होती है. अखिर में दोनों परिवार की सहमति के बाद शादी होती है. आजकल लड़की पक्ष द्वारा ली जाने वाली दापा (वधु मूल्य) की राशि न्यूनतम 2 से 3 लाख है जो आदिवासी परिवारों में वर पक्ष के लिए चुकाना मुश्किल होता है. इसके अलावा शादियों में शराब और डीजे का खर्चा लड़के वालों के लिए बहुत भारी पड़ता है जो आदिवासी परिवारों की एक बड़ी समस्या है."

भगोरिया से भाग जाने की बात मिथक

मेले में आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधि बताते हैं कि भगोरिया मेले में प्रणय निवेदन स्वीकारने के बाद लड़के-लड़की के भाग जाने की बात गलत है. क्योंकि भागने वाले तो कहीं से भी भाग सकते हैं. मेले में लड़के और लड़कियां एक दूसरे को पसंद करते हैं. यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है.

शादी खर्चे में कटौती की बैठक जल्द

आदिवासी बुजुर्ग किश्वर डाबर ने बताया, "बेरोजगारी और गरीबी के चलते लड़के पक्ष को शादियां भारी पड़ रही हैं. मांडू में ही मार्च महीने में आदिवासी समाज की एक बड़ी बैठक आयोजित की जा रही है. जिसमें शादियों में शराब बंदी और लगातार बढ़ती दापे की रकम को सीमित रखने पर चर्चा की जाएगी."

यह है भगोरिया का इतिहास

भगोरिया मेले के आयोजन की परंपरा 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है. झाबुआ जिले के भगोर गांव के राजा कुसमल डामोर ने फसल उत्सव के रूप में इस पर्व को मनाने की शुरुआत की थी, इसे शुरुआती दिनों में छोटे-छोटे मेलों के रूप में मनाया जाता था, जिसमें खाने-पीने की वस्तुओं और दैनिक उपयोग की वस्तुओं के व्यापार के साथ झूले टेंट और मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था होती थी. इन मेलों में आसपास के गांव के सभी आदिवासी परिवार और उनके रिश्तेदार समाजजन मिलते-जुलते थे. धीरे-धीरे समय बदला और भगोरिया के मेले में वर्तमान रूप ले लिया. जिनकी परंपरा आज भी आदिवासी संस्कृति की अमूल्य देन बनी हुई है.