पति से तलाक के साथ मेंटेनेंस पाने झूठे शपथ पत्र दाखिल कर रहीं महिलाएं, फैमिली कोर्ट से चौंकाने वाली सच्चाई
इंदौर फैमिली कोर्ट में खुद को हाउस वाइफ और आर्थिक रूप से कमजोर बता रही महिलाएं, बैंक अकाउंट से खुल रही पोल.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 26, 2026 at 4:26 PM IST
रिपोर्ट : सिद्धार्थ माछीवाल
इंदौर : देशभर में तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इन मामलों में तलाक लेने वाली महिलाओं की एक अजीबोगरीब सच्चाई भी सामने आई है. विभिन्न कारणों से तलाक चाहने वाली महिलाएं पति से मनमाना मेंटेनेंस हासिल करने फैमिली कोर्ट को भ्रमित कर रही हैं. इंदौर फैमिली कोर्ट के मुताबिक महिलाएं भरण पोषण हासिल करने के लिए झूठ का सहारा ले रही हैं. इसका खुलासा उनके द्वारा प्रस्तुत शपथ पत्र और बैंक अकाउंट की पड़ताल से हो रहा है, जिसके बाद मेंटेनेंस के ऐसे मामलों को खारिज किया जा रहा है.
कोई डॉक्टर तो कोई इंटीरियर डिजाइनर, मेंटेनेंस के लिए झूठ का सहारा
शादी के बाद कोर्ट में पति के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाली कई महिलाएं खुद को आर्थिक रूप से कमजोर गृहिणी बताते हुए अधिक से अधिक भरण पोषण की राशि लेना चाहती हैं. इसके लिए फैमिली कोर्ट में भरण पोषण यानी मेंटेनेंस के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले शपथ पत्र में भी वे बाकायदा झूठ का सहारा ले रही हैं. दरअसल, इंदौर फैमिली कोर्ट में हाल ही में कई मामले सामने आए, जिसमें डॉक्टर, इंजीनियर, स्पोर्ट्स पर्सन और इंटीरियर डिजाइनर आदि पेशे से जुड़ी कई महिलाओं ने भरण पोषण के अधिकार के लिए फैमिली कोर्ट में झूठ बताया. इन महिलाओं ने प्रस्तुत एफिडेविट में खुद को हाउस वाइफ बताते हुए पति से बड़ी रकम के मेंटेनेंस का दावा प्रस्तुत किया था.
बैंक अकाउंट्स ने खोली पोल, कोर्ट ने दावे किए खारिज
ऐसे कई मामलो में जब कोर्ट ने दावा करने वाली महिलाओं के बैंक अकाउंट और अन्य आर्थिक स्रोतों की जानकारी मांगी, तो सच्चाई इसके ठीक उलट थी. दावा करने वाली महिलाएं हर मामले में सक्षम और आर्थिक रूप से मजबूर पाई गईं. कई मामलों में खुद को हाउस वाइफ बताने वाली पत्नियां पति से ज्यादा सक्षम थीं और अच्छी खासी सैलरी कमा रही थीं, लिहाजा फैमिली कोर्ट ने इनके द्वारा प्रस्तुत भरण पोषण प्रकरण को तत्काल खारिज कर दिया.

ऐसे मामलों में पारदर्शिता बरत रह फैमिली कोर्ट
फैमिली कोर्ट की वरिष्ठ वकील एडवोकेट प्रीति मेहना बताती हैं, '' फैमिली कोर्ट में ऐसे एक नहीं कई मामले सामने आए हैं, जिसमें कोर्ट ने ऐसे तमाम प्रकरणों को पूरी पारदर्शिता के साथ खारिज किया है. ऐसी स्थिति में अब ऐसे दावे करने वाले पक्ष को भी कोर्ट के कड़े रुख के बाद लगातार निराशा हाथ लगी है.'' उन्होंने बताया ऐसे तमाम मामलों में अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा रजनीश विरुद्ध नेहा केस में जो व्यवस्था दी है, उसके तहत फैमिली कोर्ट में मेंटेनेंस के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले प्रकरणों में अब दोनों ही पक्षों को झूठे शपथ पत्रों का लाभ मिलना मुश्किल रहेगा.
दोनों पक्षों की इनकम, लोन की रिपोर्ट देना अनिवार्य
कॉन्टेस्टेड तलाक के ऐसे मामलों में अब दावा प्रस्तुत करने के दौरान पत्नी अथवा पति पक्ष दोनों को अपनी मासिक आय, कुल संपत्ति, देनदारी, बैंक लोन की डिटेल और अपने बैंक स्टेटमेंट कोर्ट में प्रस्तुत करने होंगे. इसके लिए बाकायदा दोनों ही पक्षों को अपनी ओर से अपनी आय को दर्शाने वाला शपथ पत्र प्रस्तुत करना होगा.
जानिए क्या है रजनीश नेहा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
दरअसल, रजनीश बनाम नेहा मामले (2020) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसमें विवाह विच्छेद अथवा तलाक के प्रकरणों में मेंटेनेंस के अधिकार के तहत भरण पोषण कानून के लिए पति एवं पत्नी दोनों को अपनी आय संपत्ति और देनदारी का विस्तृत शपथ पत्र फैमिली कोर्ट में दाखिल करना जरूरी किया गया है. जिससे कि पारदर्शी अथवा निष्पक्ष भरण पोषण की राशि तय की जा सके. इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण पोषण की याचिकाओं में दोनों पक्षों को अपनी आय और संपत्तियों का अपने स्तर पर रिकॉर्ड कोर्ट में प्रस्तुत करना होगा. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक इस आदेश में शपथ पत्र में झूठ प्रस्तुत करने की स्थिति में न्यायालय की अवमानना व आपराधिक केस दर्ज करने का कोर्ट को अधिकार रहेगा.
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तलाक या विवाह विच्छेद के बाद इस वजह से है मेंटेनेंस का प्रावधान
तलाक अथवा विवाह विच्छेद के मामलों में भरण पोषण का अधिकार हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के और सीआरपीसी के अंतर्गत अक्षम व पीड़ित महिलाओं के लिए निर्धारित है. इसमें विवाह के बाद से पति पर आश्रित रहने वाली महिलाओं को विवाह विच्छेद के बाद वित्तीय संकट का सामना न करना पड़े इसलिए सम्मानजनक भरण पोषण राशि पति से प्राप्त करने का अधिकार है, जिसके लिए उन्हें फैमिली कोर्ट में दावा प्रस्तुत करना होता है. हालांकि, सक्षम महिलाओं द्वारा गलत दावा प्रस्तुत कर इसका गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसपर अब कोर्ट सख्त रुख अपनाने लगे हैं.

