इंदौर में करोड़ों की लागत से बनेगा पहला यूजलेस ब्रिज! कंस्ट्रक्शन रोकने हाईकोर्ट पहुंचे इंजीनियर
इंदौर में 600 करोड़ की लागत से बनेगा 9.7 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड ब्रिज. सीनियर इंजीनियर और प्लानर ने हाईकोर्ट में लगाई रोक की गुहार.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 24, 2026 at 10:03 PM IST
|Updated : February 24, 2026 at 10:17 PM IST
इंदौर: मध्य प्रदेश के इंदौर में सरकारी पैसे के दुरुपयोग का एक अजीबो गरीब मामला सामने आया है. आरोप है कि शहर में 600 करोड़ से ज्यादा की लागत से बन रहा एलिवेटेड ब्रिज का उपयोग 20 प्रतिशत भी नहीं होगा. जिसके चलते इसे शहर का पहला यूजलेस एलिवेटेड ब्रिज कहा जा रहा है. सीनियर इंजीनियर ने इंदौर हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर निर्माण पर रोक लगाने की मांग की है.
इंजीनियर ने खटखटाया हाई कोर्ट का दरवाजा
साल 2018 में पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से शहर में ब्रिज निर्माण की मांग की थी. जिसके बाद गडकरी ने केंद्रीय सड़क निधि योजना से एलिवेटेड ब्रिज बनाने के लिए 250 करोड रुपए स्वीकृत किए गए थे. हालांकि, अब इसकी लागत बढ़कर 650 करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है. इस ब्रिज को शहर के विजयनगर चौराहे से लेकर भवर कुआं चौराहे तक बनाने का प्रस्ताव है. इसमें तीन रोटरी का निर्माण भी शामिल है, लेकिन इसके बावजूद जानकार इसके उपयोग नहीं होने की आशंका जता रहे हैं.
इंदौर विकास प्राधिकरण के सर्वे में चौकाने वाले खुलासे
इसके निर्माण के लिए टेंडर 2020-21 में बुलाए गए थे. तब निर्माण के बाद इसकी उपयोगिता करीब 3 प्रतिशत ही बताई गई थी. इसके बाद ब्रिज के दोनों और से गुजरने वाले रास्तों को मिलाकर ब्रिज की भुजा नीचे उतरने पर इसकी उपयोगिता बढ़कर 8% हो गई थी, जिसके बाद इंदौर जिला प्रशासन ने इसे निरस्त कर दिया. इसके स्थान पर शहर में छोटे-छोटे ब्रिज बनाने के सर्वे किया गया. इसके लिए इंदौर विकास प्राधिकरण ने 72 लख रुपए खर्च कर दिए. लेकिन अब एक बार फिर एलिवेटेड ब्रिज बनाने की तैयारी हो गई है. इसके खिलाफ शहर के सीनियर इंजीनियर और प्लानर अतुल सेठ ने इंदौर हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है. उन्होंने याचिका दायर कर जनता के पैसों से अनुपयोगी ब्रिज के निर्माण पर रोक लगाने की मांग की है. जिसमें कोर्ट का फैसला आना बाकी है.
चौराहों की उपयोगिता 42%
इंदौर के वरिष्ठ स्ट्रक्चर इंजीनियर और प्लानर अतुल सेठ ने बताया, "एलिवेटेड ब्रिज बनाने की जगह शहर के विभिन्न स्थानों पर पुल बना दिए जाएं तो निर्माण की लंबाई करीब 4 किलोमीटर रहेगी. जबकि एलिवेटेड ब्रिज 9.7 किलोमीटर बनाना पड़ेगा. इस ब्रिज की उपयोगिता करीब 18.1% है, जबकि अलग-अलग चौराहों पर ब्रिज बनाने पर उपयोगिता 42% रहेगी. चौराहों पर अलग-अलग ब्रिज बनाने से ब्रिज की लंबाई घट जाएगी और लागत 4.50 करोड़ रहेगी. जबकि एलिवेटेड ब्रिज में निर्माण लागत के अलावा बिजली, पानी और ड्रेनेज लाइन शिफ्टिंग में अलग से करीब सवा 200 करोड रुपए खर्च होंगे. चौराहों पर छोटा-छोटा ब्रिज बनाने से ढाई साल में निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा. वहीं एलिवेटेड ब्रिज का काम पूरा होने में कम से कम 5 साल लगेगा. जिसमें आम जनता को भारी तकलीफ होगी."
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उन्होंने आगे बताया, "वहीं अलग-अलग ब्रिज बनाने से पर्यावरण और ट्रैफिक की रुकावट बहुत कम होगी. इसके उलट एलिवेटेड ब्रिज में रोटरी के कलम और पिलर बनने से यातायात में रुकावट होगी. जबकि अलग-अलग ब्रिज बनने से ऐसा नहीं हो पाएगा."

