SRS रिपोर्ट: भारत में प्रजनन दर घटकर 1.9 हुई, राजस्थान के गांवों में आंकड़ा अब भी ऊपर
भारत की कुल प्रजनन दर पहली बार 1.9 पर आ गई है. वहीं, राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों में TFR अभी भी 2.4 है.

Published : May 31, 2026 at 6:19 PM IST
जयपुर: भारत की जनसंख्या वृद्धि अब धीमी पड़ने लगी है. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS)-2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.9 रह गई है. यह पहली बार है जब राष्ट्रीय स्तर पर प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे पहुंच गई है. विशेषज्ञ इसे देश के जनसांख्यिकीय बदलाव का बड़ा संकेत मान रहे हैं, हालांकि राजस्थान समेत छह राज्य अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल से ऊपर बने हुए हैं, जहां आबादी वृद्धि की रफ्तार राष्ट्रीय औसत से अधिक है. वहीं, रिपोर्ट में संस्थागत प्रसव के आंकड़ों में तेजी से सुधार ने राहत दी है, हालांकि शिशु मृत्यु दर और लिंगानुपात के बढ़ते आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं.
ग्रामीण राजस्थामन में अब भी बड़े परिवार: रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल प्रजनन दर (TFR) में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन कुछ राज्यों में यह अब भी प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से ऊपर बनी हुई है. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहां प्रजनन दर अपेक्षाकृत अधिक है. विषय विशेषज्ञ डॉ. मीता सिंह कहती हैं कि रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान की स्थिति भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अलग-अलग दिखाई देती है. राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में TFR 2.4 दर्ज की गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 2.1 है. इससे स्पष्ट होता है कि शहरों में शिक्षा, जागरूकता, रोजगार और परिवार नियोजन के बढ़ते प्रभाव के कारण परिवार छोटे हो रहे हैं. दूसरी ओर, ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं, कम जागरूकता और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण बड़े परिवारों की प्रवृत्ति अब भी बनी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से इस अंतर को कम किया जा सकता है. हालांकि कम होती जनसंख्या वृद्धि के आंकड़े सुखद हैं.
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राजस्थान के गांवों में क्यों अधिक है प्रजनन दर?: विशेषज्ञ डॉ. मीता सिंह के अनुसार 2.1 की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट लेवल कहा जाता है. इसका अर्थ है कि एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को संख्या के हिसाब से पूरी तरह प्रतिस्थापित कर देती है. यदि किसी देश या राज्य की TFR लंबे समय तक 2.1 से नीचे बनी रहती है तो भविष्य में जनसंख्या वृद्धि धीमी हो सकती है और युवा आबादी में कमी आने लगती है. राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों की TFR 2.4 होना यह दर्शाता है कि गांवों में अभी भी पारंपरिक पारिवारिक ढांचा मजबूत है. ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह की औसत आयु अपेक्षाकृत कम, संयुक्त परिवार व्यवस्था और सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से बच्चों की संख्या अधिक रहती है. वहीं शिक्षा का बढ़ता स्तर, महिलाओं की रोजगार में भागीदारी, शहरी जीवन शैली और बढ़ती आर्थिक लागत के कारण शहरों में परिवार छोटे होते जा रहे हैं. यही कारण है कि राजस्थान के शहरी क्षेत्रों में TFR 2.1 तक पहुंच चुकी है.

SRS-2024 रिपोर्ट की दो अच्छी बातें: SRS 2024 की रिपोर्ट में राजस्थान के लिए दो प्रमुख बिंदु महत्वपूर्ण हैं जो एक बड़ी राहत की ओर इशारा कर रहे हैं. डॉ. मीता सिंह कहती हैं कि इस रिपोर्ट में संस्थागत प्रसव यानी सरकारी या निजी अस्पताल में महिलाओं की डिलीवरी के आंकड़े काफी राहत देने वाले हैं. 2019 में 88.7 प्रतिशत महिलाओं की डिलीवरी अस्पताल में होती थी. वहीं 11.3 प्रतिशत महिलाओं की डिलीवरी घर में होती थी, लेकिन 2024 के आंकड़ों के अनुसार अब राजस्थान में 99.5 प्रतिशत महिलाओं की डिलीवरी सरकारी या निजी अस्पताल में हो रही है. यह एक जागरूकता का उदाहरण है. लगातार किए गए प्रयास से आज हम इस जगह पहुंच पाए हैं. इसके साथ ही डॉ. मीता सिंह ने टोटल फर्टिलिटी रेट पर बात करते हुए कहा कि राजस्थान में यह अच्छे आंकड़े हैं, जिसमें तेज गति से तो नहीं लेकिन धीरे-धीरे सुधार हो रहा है. प्रति महिला के अगर हम बात करें तो 2019 में 2.5 था, वहीं अब यह घटकर 2.3 हो गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में 2.4 है, जबकि शहरी क्षेत्र में 2.1 हो गया है. शिक्षा के बढ़ते स्तर के कारण यह सब संभव हो पाया है. जागरूकता ही इन आंकड़ों का मुख्य कारण है. उन्होंने कहा कि हालांकि अभी भी काफी सुधार की जरूरत है.

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कुछ चिंताजनक आंकड़े भी: डॉ. मीता सिंह ने शिशु मृत्यु दर पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि देशभर में 1000 बच्चों पर 24 बच्चे ऐसे हैं जो अपना जीवन का पहला साल भी पूरा नहीं कर पाते और मौत के काल में समा जाते हैं. सबसे अच्छे आंकड़े केरल के हैं, जहां पर सिंगल डिजिट यानी सिर्फ 1000 पर 8 बच्चों की ही मौत हो रही है, जबकि सबसे डराने वाले आंकड़े छत्तीसगढ़ के हैं, जहां पर हर 1000 बच्चे पर 36 बच्चों की मौत हो रही है. राजस्थान की बात करें तो थोड़ा सुधार हुआ है. 2019 में यह 35 था जो घटकर अब 28 हो गया है. उन्होंने कहा कि अभी भी इसमें काफी कुछ सुधार और काम करने की जरूरत है. हम किस तरह से सिंगल डिजिट में आएं, इस पर काम करने की जरूरत है. डॉ. मीता सिंह ने कहा कि सिंगल डिजिट नहीं बल्कि एक भी बच्चे की मौत क्यों हो, उसी दिशा में काम करने चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने लिंगानुपात के आंकड़ों पर भी चिंता जाहिर की.

उन्होंने कहा कि देशभर में 1000 बच्चों पर 918 बेटियां जन्म ले रही हैं, जिसमें शहरी क्षेत्र में 928 और ग्रामीण क्षेत्र में 914 है. राजस्थान की बात करें तो यह आंकड़ा थोड़ा चिंताजनक है, क्योंकि 2024 में 1000 पर 917 बेटियां ही जन्म ले पा रही हैं. उन्होंने कहा कि 2019 से 2021 में राजस्थान के आंकड़े काफी राहत देने वाले थे. उस समय 920 बेटियां जन्म ले रही थीं. उसके बाद इन आंकड़ों में और सुधार हुआ और 2022 में यह आंकड़ा 924 तक पहुंचा, लेकिन 2023 में गिरकर 919 पर आ गया. वहीं 2024 में और गिरावट आई और 917 पर आ गया. डॉ. मीता सिंह कहती हैं कि इसका सीधा कारण यह भी हो सकता है कि सरकार और सामाजिक स्तर पर जो प्रयास किए जा रहे थे वह कहीं ना कहीं कम हो गए हैं. एक बार फिर से बड़े अभियान के जरिए इस दिशा में काम करने की जरूरत है. राजस्थान पहले ही बेटियों के जन्म के मामले में काफी बदनाम रहा है. यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इस दिशा में फिर से प्रयास करें.

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बढ़ रही है कामकाजी आबादी: रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भारत की कामकाजी आबादी से जुड़ा है. वर्तमान में 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग के लोग देश की कुल आबादी का 66.4 प्रतिशत हिस्सा हैं. वर्ष 2014 में यह आंकड़ा 64 प्रतिशत था. विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के लिए “डेमोग्राफिक डिविडेंड” का दौर है, जब काम करने योग्य आबादी सबसे अधिक होती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है. हालांकि, यह अवसर हमेशा नहीं रहेगा. यदि आने वाले वर्षों में प्रजनन दर लगातार कम होती रही तो कामकाजी आबादी का अनुपात भी प्रभावित हो सकता है.
बुजुर्ग आबादी भी तेजी से बढ़ रही: एक ओर जन्म दर घट रही है, वहीं दूसरी ओर बुजुर्ग आबादी का अनुपात लगातार बढ़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी पिछले दशक में 8.6 प्रतिशत से बढ़कर 9.7 प्रतिशत हो गई है. केरल में बुजुर्गों की आबादी सबसे अधिक 15 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि तमिलनाडु में वृद्ध आबादी की वृद्धि दर सबसे तेज रही है. सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. मीता सिंह का मानना है कि आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है. डॉ. मीता सिंह का कहना है कि प्रजनन दर में गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण युवाओं की बदलती सोच है. अब युवा विवाह और मातृत्व-पितृत्व दोनों में देरी कर रहे हैं. बड़ी संख्या में दंपती केवल एक बच्चा ही रखना चाहते हैं. उनके अनुसार जीवनशैली में बदलाव, करियर प्राथमिकताएं, आर्थिक दबाव, महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ती भागीदारी भी इसके प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा PCOS, एंडोमेट्रियोसिस जैसी स्वास्थ्य समस्याएं और पुरुषों एवं महिलाओं की घटती प्रजनन क्षमता भी फर्टिलिटी को प्रभावित कर रही हैं.
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