इतिहास का जीवित गवाह! बिहार में मिला 700 साल पुराना बरगद, वैज्ञानिकों को भी चौंकाया
बुलंदशहर और कोलकाता के बरगद को पीछे छोड़ मुंगेर का वटवृक्ष बना देश में नंबर वन बन गया. वैज्ञानिकों ने कार्बन डेटिंग से प्रमाणित किया.

Published : June 3, 2026 at 8:44 PM IST
बिहार: बिहार के मुंगेर स्थित आईटीसी परिसर में खड़ा एक विशाल बरगद का पेड़ भारत के सबसे पुराने बरगद के रूप में पहचान बना चुका है. वैज्ञानिक शोध और कार्बन डेटिंग से यह खुलासा हुआ है कि इस वटवृक्ष की उम्र 700 वर्ष से भी अधिक है. यानि ये पेड़ मुगल साम्राज्य के उत्थान-पतन, अंग्रेजी शासन से लेकर भारत की आजादी तक के न जाने कितने ही घटनाक्रमों का गवाह है.
बुजुर्गों का दावा: सदियों से स्थानीय लोगों के बीच यह पेड़ आकर्षण, आस्था और रहस्य का केंद्र बना हुआ था. इसकी विशाल शाखाएं, दूर-दूर तक फैली जटाएं और अनेक तनों में परिवर्तित हो चुकी जड़ें हमेशा लोगों को आश्चर्यचकित करती रही हैं. ग्रामीणों का कहना था कि उनके दादा-परदादा के समय में भी यह पेड़ इसी तरह विशाल स्वरूप में मौजूद था. अब विज्ञान ने भी इस लोकविश्वास को प्रमाणित कर दिया है.
वन विभाग की पहल: इस ऐतिहासिक पेड़ की वास्तविक आयु का पता लगाने के लिए 2022 में बिहार वन विभाग ने एक विशेष अध्ययन शुरू कराया. इस महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) की वैज्ञानिक डॉ. त्रिणा बोस और शोधार्थी अवनीश मिश्रा को सौंपी गई.
वैज्ञानिकों की चुनौती: शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बरगद के पेड़ में सामान्य वृक्षों की तरह वार्षिक वृत्त (एनुअल रिंग्स) नहीं बनते, जिनके आधार पर पेड़ की उम्र का अनुमान लगाया जाता है. ऐसे में वैज्ञानिकों ने पेड़ को बिना किसी नुकसान पहुंचाए उसकी एक सूखी जटा और मोटे तने के हिस्से का नमूना एकत्र किया.
तीन साल की रिसर्च: नमूनों पर करीब तीन वर्षों तक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया गया. आधुनिक कार्बन डेटिंग तकनीक के माध्यम से जब परीक्षण पूरा हुआ तो सामने आए परिणाम ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया.रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि इस बरगद की आयु 700 वर्ष से अधिक है.
"भारत में इससे पुराने वटवृक्ष का कोई रिकॉर्ड नहीं है, 300-400 साल पुराने वृक्षों का डॉक्यूमेंटेशन है पर 700 साल पुराना वृक्ष कहीं नहीं है. ये बहुत बड़ी बात है, ये वर्ल्ड हेरिटेज की बात है." - अवधेश कुंवर, वकील व इतिहासकार

इतिहास का प्रत्यक्षदर्शी: विशेषज्ञों के मुताबिक इसका अर्थ ये है कि यह वटवृक्ष दिल्ली सल्तनत के अंतिम दौर, मुगल साम्राज्य के उदय, अंग्रेजी शासन, स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्र भारत के पूरे इतिहास का प्रत्यक्ष साक्षी रहा है. यह अपने आप में ऐतिहासिक घटना है.
जीवंत धरोहर: वैज्ञानिकों का मानना है कि इस वृक्ष की वास्तविक आयु इससे भी अधिक हो सकती है. क्योंकि परीक्षण केवल पेड़ के एक हिस्से पर किया गया था. विशेषज्ञों के अनुसार यह बरगद सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि एक जीवित ऐतिहासिक धरोहर है. इसकी जटाएं जमीन में पहुंचकर नए तनों का रूप ले चुकी हैं, जिससे इसका फैलाव लगातार बढ़ता रहा है.
मौसम की मार: यही कारण है कि यह वृक्ष समय की मार, आंधी-तूफान और मौसम की कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए आज भी मजबूती से खड़ा है. वरिष्ठ वकील एवं पत्रकार अवधेश कुंवर ने बताया कि वैज्ञानिक प्रमाणों के बाद यह पेड़ विशेष पहचान प्राप्त कर चुका है और मुंगेर के लिए गौरव का विषय बन गया है.
मुंगेर शीर्ष स्थान पर: इसी के साथ भारत के सबसे पुराने बरगदों में पहले स्थान पर मुंगेर के इस बरगद के पेड़ का नाम आ गया है. उपलब्ध शोध और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर देश के सबसे पुराने बरगदों की सूची में अब मुंगेर का यह वटवृक्ष शीर्ष स्थान पर माना जा रहा है.
यूपी व बंगाल को पछाड़ा: इसके बाद उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर स्थित सिद्धबाड़ी बरगद का नाम आता है. इस प्रसिद्ध पेड़ की अनुमानित आयु लगभग 500 वर्ष बताई जाती है. वहीं कोलकाता का प्रसिद्ध ग्रेट बनयान ट्री तीसरे स्थान पर है. इसकी उम्र करीब 350 वर्ष पुरानी मानी जाती है. बिहार की नई पहचान बना यह ऐतिहासिक वटवृक्ष आज एक बड़ी मिसाल है.
प्रकृति का संदेश: यह वटवृक्ष आज बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गौरव और पहचान का प्रतीक बन चुका है. यह वृक्ष आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति की शक्ति, धैर्य और संरक्षण का संदेश देता है. सात शताब्दियों से अधिक समय तक जीवित रहकर यह साबित करता है कि प्रकृति की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, उसका अस्तित्व उतना ही अमर और मजबूत होता है.
वैश्विक पर्यटन पर पहचान: वरिष्ठ पत्रकार कुमार कृष्णन के अनुसार यह बरगद इतिहास, विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत उदाहरण है. यह दुनिया भर के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है और भविष्य में मुंगेर को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिला सकता है.
धैर्यपूर्ण निरंतरता: 700 वर्षों से समय के हर दौर का गवाह बना यह विशाल वटवृक्ष आज भी अडिग खड़ा है. यह मानव सभ्यता को यह संदेश दे रहा है कि प्रकृति की सबसे बड़ी ताकत उसकी धैर्यपूर्ण निरंतरता में छिपी होती है.
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