रोटी के संदेश से शुरू हुई थी 1857 की क्रांति, अंग्रेज मानते रहे जादू-टोना और हो गया था काम
रोटी के संदेश से शुरू हुई थी आजादी की क्रांति, क्रांतिकारियों ने अपनाया था अनोखा तरीका. अंग्रेज नहीं समझ पाए रणनीति. ब्रिजेन्द्र पटैरिया की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : August 14, 2026 at 9:55 PM IST
|Updated : August 24, 2026 at 10:48 AM IST
भोपाल: भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई रोचक और रौंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य समय-समय पर सामने आते रहे हैं. ऐसा ही एक तथय देश के पहले स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने का संदेश एक दूसरे तक पहुंचाने के रोचक तरीके से जुड़ा है. आज कोई इंटरनेट के जरिए मिनटों में सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाती है, लेकिन उस दौर में गांव-गांव में क्रांति की अलख जगाने और एकजुट होने ऐसा तरीका अपनाया गया, जिसे अंग्रेज समझ ही नहीं पाए. वे इसे जादू-टोना और महामारी से मुक्ति का तरीका मानते रहे और क्रांति का संदेश गांव-गांव तक पहुंच गया. इससे जुड़ा एक दुर्लभ पत्र सामने आया है.
क्रांतिकारियों ने अपनाया अनोखा तरीका
इतिहास शोध केन्द्र के सीनियर प्रोफेसर डॉ. अनिल दुबे बताते हैं कि "अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की योजना बेहद अदभुत तरीके से बनाई गई थी. उस दौर में रोटी और कमल के जरिए क्रांति का संदेश गांव-गांव भेजा गया. देश में पहली क्रांति की आधिकारिक शुरूआत 29 मार्च 1857 को बैरकपुर पश्चिम बंगाल में मंगल पांडे के विद्रोह से मानी जाती है. बाद में 10 मई 1857 को मेरठ में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिए. माना जाता है कि क्रांति की आग को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए चपाती आंदोलन और कमल आंदोलन को महत्वपूर्ण माना जाता है.
चपाती आंदोलन के तहत एक गांव का चौकीदार दूसरे गांव में रोटी लेकर पहुंचता था और गांव के चौकीदार को देकर आता था. यह इतनी तेजी से फैला कि अंग्रेज इसे समझ ही नहीं पाए. गांवों में चपातियां बांटी जा रही थी और भारतीय सैनिकों के बीच कमल के फूल, यह दोनों क्रांति के प्रतीक बन गए. हालांकि इसे किसने शुरू किया, इसका कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं है, लेकिन माना जाता है कि नाना साहिब पेशवा द्वारा इसे शुरू कराया गया, लेकिन इस मुहिम ने गांव-गांव को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए मानसिक रूप से तैयार कर दिया."
अंग्रेज रणनीति समझ ही नहीं आए
क्रांति की इस लहर को अंग्रेज समझ ही नहीं पाए. इससे जुड़ा एक दुर्लभ पत्र सामने आया है. राज्य पुरातत्व संग्रहालय में यह पत्र दुर्लभ पत्र मौजूद है. संग्रहालय के क्यूरेटर बालकृष्ण लोखंडे बताते हैं कि "इन दुर्लभ पत्रों को अलग-अलग स्थानों से कलेक्ट किया गया था, जो यहां प्रदर्शित किए गए हैं. यह पत्र 21 मार्च 1857 को अंग्रेज अफसर नागोद के अधीक्षक सीआर कोल्स एक्क्वायर ने जबलपुर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मेजर डब्ल्यू सी. एर्स्किन को भेजा था. अंग्रेजी में लिखे गए इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि...
गांव के चौकीदारों द्वारा रोटियां बांटे जाने का ध्यान आकर्षित हुआ है, इस संबंध में मुझे जितनी भी जानकारी मिल सकती है, उसे आपके समक्ष प्रस्तुत करने का सम्मान प्राप्त कर रहा हूं. यह रोटियां करीबन एक महीने पहले पूरे जिले में अलग-अलग जगह से एक साथ एक ही समय पर आई. इसके संबंध में कुछ चौकीदारों से पूछताछ की गई, लेकिन ऐसा लगता है, वे इसके असली कारण के बारे में कुछ नहीं जानते. चौकीदारों का बयान है कि यह रोटियां उन्हें सौंपी गई हैं और निर्देश दिया गया है कि वह इसी तरह की रोटियां बनाकर आगे के गांवों के चौकीदारों को बांटे. उन्हें यह भी कहा गया है कि इस संदेश को आगे बढ़ाएं और रोटियों को सरकार का हुक्म के तहत खाया जाना चाहिए.

मुझे बताया गया कि कुछ समय पहले बनारस में भी ऐसा ही वितरण हुआ था, तब बताया गया कि इस प्रथा की शुरूआत शास्त्रों से हुई. नागौद में पूछताछ में बताया जा रहा है कि जब भी गांव में कोई संकट या महामारी की आशंका होती है तो एक चौकीदार दूसरे गांव की सीमा में जाकर रोटियां फेंक देता है, ताकि बीमारी दूसरे गांव चली जाए. यह वितरण बिना किसी सरकारी आदेश के इतनी आसानी से और गति से फैल गया है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसकी शुरूआत किसी चतुर व्यक्ति द्वारा की गई है. जिसने सरकार का हुक्म जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है और बाद में सरकार शब्द को हटा दिया और केवल हुक्म शब्द आगे बढ़ाया जा रहा है.
जहां तक हमने अब तक देखा है, इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, लेकिन जब तक इस वितरण का असली कारण और उद्देश्य पूरी तरह साफ नहीं हो जाता, इस मामले की जांच जारी रखना ही ठीक होगा.

इसके साथ झांसी के कैप्टन ए.स्किन को सूचित किया गया कि हर गांव का चौकीदार दूसरे गांव को केक, टिकिया या पूरियां बांट रहा है. हर किसी को यह मिला और आगे बढ़ा दिया. इस तरह की प्रथा का कारण ज्ञात नहीं है, लेकिन यह प्रथा झांसी से आई और व्यापक रूप से फैल गई."
भोपाल से भी जुड़े चपाती आंदोलन के सूत्र
ऐसा ही एक दुर्लभ पत्र 3 मार्च 1857 का भी है. यह पत्र जालौन के कार्यवाहक कमिश्नर जीडब्ल्यू फ्रीलिंग ने झांसी के अधीक्षक कैप्टन ए स्कीन को लिखा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि..."मैं निम्नलिखित परिस्थितियों को आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं, हालांकि संभावना है कि आपने इसके बारे में झांसी में सुना होगा. मेरा मानना है कि वहां भी इसकी जांच की जा रही है. करीब एक महीने पहले मुझे ज्ञात हुआ है कि इस जिले के चौकीदार केक वितरित कर रहे हैं, जिसे वे चपातियां कहते हें. इससे यह सिद्ध होता है कि कोई नियमित संदेश था, जिसके तहत इसे आगे बढ़ाया जा रहा था. इसके पीछे कोई कारण नहीं बताया गया. सिवाए इसके कि यह प्रथा जालौन से आई है.
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इसकी रिपोर्ट हर तरफ से आई है और मैंने इसके जांच के आदेश दिए हैं. अभी जांच लंबित है, लेकिन मुझे पता चला कि डिप्टी मजिस्ट्रेट ने इसके सूत्रों का पीछ किया है जो भोपाल तक जाते हैं. यह बहुत अजीब लगता है कि यह प्रथा सिर्फ एक ही वर्ग चौकीदार और ग्रामीणों के बीच इतनी तेजी से फैल रही है ओर वे इसके बारे में बताने को तैयार नहीं है. इसका कोई न कोई कारण अवश्य होगा. यह बिलकुल नया है और स्पष्ट रूप से बहुत व्यापक रूप से फैल चुका है. यदि कोई और बात आती है तो मैं आपको अवश्य अवगत कराऊंगा, क्योंकि यह मामला बेहद अजीब लगता है.
राज्य पुरातत्व संग्रहालय में यह पत्र दुर्लभ पत्र मौजूद हैं. संग्रहालय के क्यूरेटर बालकृष्ण लोखंडे बताते हैं कि "इन दुर्लभ पत्रों अलग-अलग स्थानों से कलेक्ट किया गया था, जो यहा प्रदर्शित किए गए हैं."

