IIT BHU ने विकसित की अपशिष्ट जल शोधन की नई तकनीक, बनाया 'रासायनिक स्पंज'
प्रो. चंदन उपाध्याय ने बताया कि, खतरनाक प्रदूषकों को 85 प्रतिशत से 99 प्रतिशत तक हटाने में सक्षम.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 9:31 PM IST
वाराणसी : भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. संस्थान के वैज्ञानिकों ने औद्योगिक अपशिष्ट जल से विषैले रासायनिक रंगों को प्रभावी रूप से हटाने के लिए एक अत्यंत दक्ष, टिकाऊ एवं कम लागत वाला एडसोर्बेंट (शोषक पदार्थ) विकसित किया है.
शोध टीम ने लेयर्ड डबल हाइड्रॉक्साइड्स (LDH) आधारित एक उन्नत शोषक पदार्थ विकसित किया है, जो रासायनिक स्पंज की तरह कार्य करता है. यह नवाचार एक प्रभावी औद्योगिक समाधान के रूप में विकसित होने की प्रबल क्षमता रखता है.
आईआईटी, बीएचयू की शोध टीम ने लेयर्ड डबल हाइड्रॉक्साइड्स (LDH) आधारित एक उन्नत शोषक पदार्थ विकसित किया है, जो रासायनिक स्पंज की तरह कार्य करता है. एडसोर्प्शन विधि को जल शोधन के लिए कम लागत वाला समाधान माना जाता है, लेकिन अब तक उपलब्ध सामग्रियों में या तो दक्षता कम थी या उनका निर्माण अत्यधिक महंगा था. यह नई तकनीक इन दोनों चुनौतियों का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती है. इस अनुसंधान का नेतृत्व प्रो. चंदन उपाध्याय और अमित बार, स्कूल ऑफ मटीरियल्स साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने किया, जबकि डॉ. राम शरण सिंह (रसायन अभियांत्रिकी विभाग) ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया.
प्रो. चंदन उपाध्याय ने बताया कि, शोध टीम ने इस सामग्री के निर्माण के लिये एक सरल एवं व्यावहारिक विधि विकसित की है, जिसमें पूर्व प्रचलित तकनीकों की तरह महंगे और विशेष उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती. सामान्य धातु नाइट्रेट्स एवं नियंत्रित ताप प्रक्रिया के उपयोग से यह तकनीक आर्थिक रूप से किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनती है.
उन्होंने बताया कि पेटेंट दस्तावेज के अनुसार, इस सामग्री का उच्च सतह क्षेत्रफल, गैर-विषाक्त प्रकृति एवं स्थायित्व इसे अपशिष्ट जल शोधन उद्योग के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाते हैं. भारत सरकार द्वारा IIT-BHU को इस एडसोर्बेंट सामग्री तथा इसकी निर्माण विधि दोनों के लिए पेटेंट प्रदान किया गया है.
उन्होंने बताया कि यह स्वच्छ एवं किफायती औद्योगिक जल प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह शोध वस्त्र, प्रिंटिंग एवं औषधि उद्योगों से निकलने वाले अनुपचारित रासायनिक रंगों के जल स्रोतों में बड़े पैमाने पर निर्वहन जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है.
उन्होंने बताया कि वस्त्र उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है, लेकिन इससे प्रतिवर्ष अरबों लीटर ऐसा अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है, जिसमें खतरनाक एजो डाई पाई जाती हैं. ये रसायन न केवल हटाने में कठिन होते हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य एवं जलीय जीवन के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं. ऐसे में यह पदार्थ बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग के लिए अत्यंत किफायती बन जाती है.
प्रो. चंदन उपाध्याय ने बताया कि, नया पेटेंट प्राप्त एडसोर्बेंट अपनी उच्च स्थायित्व क्षमता एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है. यह उन्नत सामग्री कॉन्गो-रेड और मिथाइल-ऑरेंज जैसे खतरनाक प्रदूषकों को 85 प्रतिशत से 99 प्रतिशत तक प्रभावी रूप से हटाने में सक्षम है.
उन्होंने बताया कि वर्तमान में उपयोग होने वाले कई फिल्टरों के विपरीत, जिन्हें कुछ ही उपयोगों के बाद छोड़ना पड़ता है, यह एडसोर्बेंट “कैल्सिनेशन” (तापन प्रक्रिया) के माध्यम से 14 चक्रों तक अपनी प्रभावशीलता बनाए रखता है. निकिल अथवा जिंक आधारित विशिष्ट धातु संयोजन के अनुसार, यह एडसोर्बेंट प्रति ग्राम सामग्री 869.5 मिलीग्राम तक रंग सोखने की क्षमता रखता है. वहीं, इस तकनीक से अपशिष्ट जल उपचार की अनुमानित लागत मात्र 9 पैसे प्रति लीटर है.
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि, IIT-BHU वैश्विक और स्थानीय दोनों प्रकार की चुनौतियों के समाधान के लिए निरंतर प्रयासरत है. वस्त्र उद्योग से निकलने वाले रासायनिक रंगों का अनुपचारित निर्वहन न केवल वैश्विक वस्त्र उद्योग की समस्या है, बल्कि वाराणसी क्षेत्र के स्थानीय कालीन उद्योग से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है. यह नवाचार एक प्रभावी औद्योगिक समाधान के रूप में विकसित होने की प्रबल क्षमता रखता है. इसी उद्देश्य से इस तकनीक को आगे विकसित करने के लिये शोध टीम को ‘चैलेंज ग्रांट’ के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्रदान की गई है.

